कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 57, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ४३
करते थे, कौए ओर हाथी भी झुलसकर काले हो जाते थे और यत्र-तत्र पड़े रहत थे , जिन्हें देखने से ऐसा लगता था, मानो उस मरुभूमि से उठकर सारे गगन मे छा जानेवाली उष्णता के कारण मेघ-समूह जल-भुनकर जहाँ-तहाँ गिरे पडे हो ।
उस स्थान मे जो मृग-मरीचिका सचरण करती थी, उसे देखने से भ्रम होता था कि वरुणदेव ही यह सोचकर वहाँ आ पहुँचे हों कि (उस मरुभूमि की) उष्णता कही बढकर गगन को भी न छू ले और कही देवलोक भी न जल जाय । (अर्थात्) देवताओ पर अनुग्रह करके ही वे वहाँ आ पहुँचे थे ।
उस संतप्त भूमि पर जो ग्रीष्म-रूपी राजा राज्य करता था, उसके बैठने के लिए बनाये गये सुनहले पैरवाले स्फटिक-सिंहासन के समान ही, वह मृग-मरीचिका ऊपर उठी हुई दिखाई देती थी ।
वह धरती इस प्रकार शुष्क थी, जिस प्रकार उन आत्मज्ञानियो का हृदय (शुष्क) होता है, जो (पुण्य और पाप-रूपी) दु ख-दायक विविध कर्मों को मिटाकर तथा दुर्निवार्य काम, क्रोध और मोह-रूपी बाधाजनक तीनो मोर्चों को पार कर, भक्ति-मार्ग पर चलते हैं; अथवा उन नारियो के मन के समान (शुष्क) था, जो सुवर्ण के लिए अपना शरीर बेच देती हैं।
तपानेवाली गरमी में झुलसे हुए छोटे-छोट कंकड़ वहाँ बिखरे पड़े थे, (गरमी के कारण) धरती मे जो दरारें पड़ गई थी, वे पाताल-लोक तक चली गई थी; इस प्रकार लंबी राह मिल जाने के कारण जगत् को तपानेवाली सूर्य-किरणे श्रेष्ठ माणिक्य से विभूषित सर्पराज के लोक में भी अनायास ही पहुँच जाती थी ।
जब इस प्रकार जलनेवाली बालुकामय उस भूमि में तीनो पहुँचे, तब विश्वामित्रने सोचा कि यद्यपि राम और लक्ष्मण अपार शक्ति-संपन्न हैं, तथापि वे पुष्प से भी अधिक कोमल हैं; अतः (इस मरुभूमि मे चलने में) उन्हे किंचित् कष्ट हो सकता है ।
(यह सोचकर) विश्वामित्र ने उनके मुखों की ओर दृष्टि डाली । इंगित को सहज ही जाननेवाले वे कुमार भी अपनी और देखनेवाले विश्वामित्र के चरणो के निकट जा पहुँचे । तब विश्वामित्र ने उन्हे ब्रह्मा द्वारा आविष्कृत दो विद्याएँ (बला तथा अतिबला) सिखाईं । दोनो ने उन मंत्रो का जप किया ।
जब वे उन मंत्रो का जप करते हुए चलने लगे, तब प्रलयाग्नि को भी पराजित करनेवाली भीषण अग्नि से उत्तप्त उस प्रदेश में यात्रा करना उसी प्रकार सरल हो गया, जैसे स्वच्छ तथा शीतल जल मे चलना होता है । उस समय भक्तो की इच्छा पूरी करनेवाले (श्रीराम) ने विश्वामित्र को प्रणाम करके पूछा—
'हे ज्ञानशिरोमणे! क्या यह प्रदेश, भँवरो से भरी हुई गंगा को पुष्पमाला के रूप मे अपनी जटा में धारण करनेवाले (शिव) की ललाट-दृष्टि पड़ने से इस प्रकार जल गया है, अथवा कोई और कारण है? क्या कारण है कि यह प्रदेश किसी निन्दनीय अत्याचारी नरेश के राज्य से भी अधिक उजड़ा हुआ पड़ा है?
(राम के) यह प्रश्न पूछने पर विश्वामित्र ने उत्तर दिया—एक ऐसी स्त्री का