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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

४४ | कम्ब रामायण

वृत्तान्त तुम्हे सुनाता हूँ, जो अच्छे-अच्छे प्राणियो को मारकर खा जाती है, जिसका रूप यमराज के जैसा भयंकर है और जिसमे हजार मदमत्त हाथियो का बल है ।

यक्षो के कुल मे सुकेतु नामक निर्मल स्वभाववाला एक व्यक्ति उत्पन्न हुआ था, जो अपने बल से सारे ससार को चकित कर देता था, जिसका क्रोध अग्नि के समान जलानेवाला था; जो मोह से रहित था और जो हाथी जैसा बलवान् होने पर भी बडा कृपालु था ।

सुकेतु के कोई सतान नही थी, इसलिए वह बहुत चिन्तित रहता था । उसने (सतान-प्राप्ति के लिए) एक लंबी अवधि तक कमल-पुष्प पर आसीन ब्रह्मदेव के निमित्त कडी तपस्या की ।

हे सूक्ष्म ज्ञानयुक्त (रामचन्द्र) ! (सुकेतु के तपस्या करते समय) वेदो के आश्रय ब्रह्मदेव उसके सम्मुख प्रकट हुए और पूछा कि तुम्हारा अभीष्ट क्या है ? सुकेतु ने प्रार्थना की कि मेरे कोई पुत्र नही, इसलिए मै दुःखी हूँ । पुत्र-प्राप्ति का वर दीजिए । ब्रह्मा ने उत्तर दिया—तुम्हारे कोई पुत्र नही होगा; एक पुत्री ही होगी।

तुम्हारे एक ऐसी पुत्री होगी, जो कमल-पुष्प पर निवास करनेवाली सरस्वती के सदृश नित्य-यौवना, मयूर-जैसी सुन्दर, लक्ष्मी की समता करनेवाली तथा एक हजार मत्त हाथियो के बल से युक्त होगी । तुम चिन्ता छोडकर अपने घर जाओ ।

ब्रह्मदेव के वरदान के अनुसार उसके एक पुत्री हुई । जब वह पुत्री कमल-पुष्प-वासिनी सुन्दर लक्ष्मी के सदृश युवती हुई, तब सुकेतु ने सोचा कि इसके अनुकूल पति कौन हो सकता है ? अत मे अपनी ही जाति के अधिपति सुद नामक यक्ष से उसका विवाह कर दिया ।

सुद और उसकी पत्नी ताडका, रात-दिन आनन्द सागर मे डूबे रहते । उनके सुख की कोई सीमा नही रही ।

बहुत दिन बीतने पर, लक्ष्मी-समान उस ताडका के गर्भ से पर्वत-सदृश भुजाओवाला मारीच एव मल्ल-युद्ध मे निपुण सुबाहु उत्पन्न हुए, जिनके जन्म से सारा ससार भय से काँप गया ।

ये दोनो कुमार माया म, वचना मे और अपार बल मे इस प्रकार उन्नति करते गये कि उन्होने अपनी माँ से भी बढकर इन कलाओ का अभ्यास कर लिया और उससे भी आगे बढ गये । उनका पिता सुद, जिसका क्रोध जलानेवाला होता था, आनन्द की अधिकता के कारण—

दुर्गुणो से भरे असुरो का अत्याचार मिटानेवाले तथा विक्षुब्ध सागर को एक ही चुल्लू मे भरकर पी जानेवाले महातपस्वी (अगस्त्य) के आश्रम में पहुँचकर ऊँचे वृक्षो को जड से उखाडकर फेंकने लगा ।

अधिक स्पृहणीय तपस्या करनेवाले मुनि जिस आश्रम में रहते थे, वहाँ के कृष्णसार. रुरु. ऋष्य आदि (जातियो के) हिरणो को मारकर खा लिया और ऊँचे 'सुरपुन्ना' आदि वृक्षो को तोड दिया । इसपर महातपस्वी (अगस्त्य) ने क्रोध से अपनी अग्निमय दृष्टि फेरकर देखा तो वह जलकर भस्म हो गया ।