कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 59, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ४५
स्वर्ण-कंकण धारण करनेवाली उस ताडका ने जब सुन्द की मृत्यु का समाचार सुना, तब वह भयंकर अग्नि के समान क्रोध से भर गई ओर यह कहते हुए कि उस मुनि का समूल नाश कर दूँगी, अपने दोनो पुत्रो के साथ अगस्त्य के आश्रम मे जा पहुँची।
वे तीनो बड़ा भीषण गर्जन करते हुए ओर चिल्ला-चिल्लाकर अगस्त्य मुनि को पुकारते हुए (आश्रम में) जा पहुँचे। (उन्हें देखकर) वज्र, प्रलयाग्नि और युगान्तकाल के पवन भी भयत्रस्त हो उठे; देवता (भय के कारण) कान्तिहीन हो गये; सूर्य तथा चन्द्र भीत हो गये, विद्युत्-युक्त मेघ भी थरथराने लगे ओर ब्रह्माण्ड टूटने-सा लगा।
तमिल-भाषा-रूपी अपरिमेय समुद्र को लानेवाले ¹ उस मुनि (अगस्त्य) ने अपने नेत्रो से क्रोधाग्नि बरसाते हुए हुकार भरा और वज्र से भी कठोर ध्वनि मे उन्हे शाप दिया कि विनाश का कार्य करने के कारण तुम लोग तुरन्त राक्षस बनकर पतित हो जाओ।
तुरन्त (वे तीनो) ऐसे राक्षस बन गये, जिनके नेत्रो से पिघले हुए ताँवे के समान क्रोधाग्नि निकल रही थी, जो इस ससार तथा देवलोक के निवासियो को मारकर खाते हुए तथा उन्हे भयभीत करते हुए संसार में विचरने लगे।
उस समय उस मुनि के क्रोध तथा उनके दिये हुए अभिशाप का प्रतिकार करने मे असमर्थ होने के कारण वे वहाँ से हट गये और सुमाली ² नामक राक्षसराज के पास आ पहुँचे; सुबाहु और मारीच ने सुमाली से निवेदन किया कि हम आपके पुत्र के समान आपकी सेवा में रहेंगे।
उस पातकी ताडका के पुत्र, एक लबी अवधि तक छिपे रहे। जब रावण ने उत्पन्न होकर तपस्या के द्वारा महान् बल प्राप्त किया और उन दोनो को मामा कहकर सबोधित किया। तब, वे बाहर निकल आये और सभी लोको का विध्वंस करते हुए प्रलय-काल के प्रभंजन के समान विचरने लगे।
१. दक्षिण मे यह कथा प्रसिद्ध कि है संस्कृत-भाषा कीअभिवृद्धि करने के लिए काशी मे ऋषियो का एक संघ स्थापित हुआ था। अगस्त्य भी उस संघ के सदस्य थे। एक बार अन्य ऋषियो के साथ अगस्त्य का विकट मतभेद हो गया। इस पर अगस्त्य उस संघ से पृथक् हो गये और उन ऋषियों का गर्व चूर करने का निश्चय किया। उन्होने शिवजी के निकट पहुँचकर अपना अभीष्ट सूचित किया। उसी समय, जिस मडप में अगस्त्य शिवजी के साथ बार्तालाप कर रहे थे, वहाँ एक दिव्य सुगन्ध फैल गई। अगस्त्य ने जब उसके सबंध मे शिवजी से पूछा, तो शिवजी उन्हें उस मडप के एक कोने मे ले गये, जहाँ तालपत्रो का एक ढेर लगा हुआ था। उस ढेर को देखते ही अगस्त्य के मुँह से 'तमिल' शब्द निकल पड़ा, जिसका अर्थ होता है मधुर। उन तालपत्रो पर जो भाषा लिखी हुई थी, उसका नाम उसी समय से तमिल हो गया। अगस्त्य ने शिवजी से तमिल-भाषा का उपदेश प्राप्त किया और दक्षिण दिशा में चले आये। वहाँ पहुँचकर उन्होने 'पोदियमलै' की पहाड़ी पर अपना आश्रम स्थापित किया और तमिल-भाषा के दो व्याकरण लिखे - १ पेरबगत्तियम (बड़ा अगस्तीयम्) और २ शिरुअगत्तियम (लघु अगस्तीयम्)। फिर, उन्होने अपने बारह शिष्यो को उस व्याकरण का उपदेश दिया। इस प्रकार, उन्होने तमिल की अभिवृद्धि की। उपर्युक्त पद्य में इसी कथा की ओर संकेत है। -अनु०
२. सुमाली रावण की माता केदशी का पिता था, जो पाताल में रहता था।