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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 549 में से

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पृष्ठ 60

४६ कव रामायण

इसके पश्चात् ताड़का अपने अति प्रचण्ड पुत्रों से अलग होकर, इस वन में आकर रहने लगी. तपस्वी अगस्त्य के क्रोध का स्मरण करके उसका मन अग्नि के समान धधकता रहता है और इस वन के प्रान्तो में अग्नि की ज्वालाएँ फैली रहती हैं।

चाहे भारी धरती को उखाड़ फेंकना हो, चाहे सभी समुद्रों के जल को पी लेना हो, या गगन को दाह देना हो—यह ताड़का सबमें समर्थ है. वह जो चाहे कर सकती है, उसके लिए कोई भी कार्य असम्भव नहीं वह ऐसी लगती है, मानो सख्या और परिमाणहीन पाप ही इस स्त्री का रूप धारण करके आ गये हों।

यदि कोई चलने-फिरनेवाला ऐसा समुद्र हो, जिसके पास दो बड़े पर्वत हों, जिससे विष निकल रहा हो जिसमे वज्रध्वनि से भी अधिक भीषण गर्जन हो, जिसके पास प्रलय-काल की अग्नि एवं दो अर्ध-चन्द्र¹ हों, तो उस स्त्री के भीषण शरीर से उसकी उपमा हो सकती है।

जिन सुन्दर भुजाओ को देखकर पुरुष भी स्त्रीत्व की कामना करते हैं. (जिससे कि उन भुजाओ का आलिगन प्राप्त कर सकें) ऐसी भुजा-विशिष्ट (हे राम)! काले नाग को कङ्कण के रूप मे पहननेवाली हाथ में शूलायुध धारण करनेवाली और अरण्य मे निवास करनेवाली उस कठोर स्त्री का नाम है—ताड़का।

लोभ नामक एकमात्र दुर्गुण यदि किसी के मन में जमकर बैठ जाय, तो वह असख्य सद्गुणो को मिटा देता है, उसी प्रकार अकथनीय अत्याचार करनेवाली उस राक्षसी ने इस विशाल भू-प्रदेश का विध्वस कर डाला है, जहाँ पहले शस्य और वृक्षो की विस्तृत सपत्ति भरी पड़ी थी।

हे पुष्प-मालाओं से सुशोभित मेघ-सदृश (राम)! यह ताडका लङ्केश्वर (रावण) की आज्ञा के अधीन रहती है, उसके दोनों पुत्र पर्वत के समान बलशाली होने के कारण मेरे लिए बड़ी बाधा बन गये हैं और मेरा यज्ञ अपवित्र कर देते हैं। यह (ताडका) सभी प्राणियो को उनके कुल-समेत मिटाती हुई अगदेश-भर में विचरण करती रहती है।

विश्वामित्र ने कहा—हे पुरातन लोकों की रक्षा करते हुए सन्मार्ग पर चलनेवाले, सभी जन को अपने प्राण-समान समझनेवाले मत्स्यकृतिवान् चक्रवर्ती (दशरथ) के पुत्र! अब उसके विषय में अधिक क्या कहूँ? वह कुछ ही दिनो में यहाँ के सभी प्राणियो को अपने उदर में समा लेगी।

विश्वामित्र की बात सुनकर पाञ्चजन्य (शख) धारण करनेवाले, (वाम) हस्त मे धनुष धारण किये हुए (श्रीरामचन्द्र) ने सुगधित पुष्पो से शोभायमान अपने सिर को हिला-कर पूछा—इस प्रकार का अत्याचार करनेवाली यह (राक्षसी) कहाँ रहती है?

पचेन्द्रियो को अपने वश में रखनेवाले (विश्वामित्र) ने पर्वत, हाथी तथा ऋषभ-सदृश (रामचन्द्र) के वचन सुने और उत्तर दिया कि हे तात! यहाँ से निकट ही वह रहती है। उनके इतना कहने के पूर्व ही वह (ताड़का) स्वय वहाँ आ उपस्थित हुई, मानो अग्नि-ज्वालाओ से भरा हुआ कोई अग्निमय पर्वत ही आ उपस्थित हुआ हो।


¹ ताड़का के मुख से बाहर निकले हुए दो दाँत दोनों अर्धचन्द्र के समान हैं।