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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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बालकाण्ड ४७

जब वह (ताड़का) चली आ रही थी; तब उसके नूपुर-अलंकृत पैरो के नीचे दब- कर पर्वत धरती के भीतर धँस रहे थे, जिससे धरती के तल में अस्त-व्यस्तता उत्पन्न हो रही थी और पहाड़ी के धँस जाने से बने गड्ढों में समुद्र का जल भर रहा था। अग्नि के समान तथा निर्भीक यमराज भी उससे डरकर बिल के अन्दर जा छिपा था और अचल कहे जाने- वाले पर्वत भी (उसकी गति के वेग से उखड़-उखड़कर) उसके पीछे-पीछे उड़ते हुए आ रहे थे।

वेदो की विरोधिनी उस ताड़का की भौंहों के कोने कुछ कंपित हो रहे थे. उसका गुहा-सदृश मुँह बँट था, उसके मुँह के दोनों छोरों पर दो लंबे दाँत, दो अर्धचंद्रों के समान, बाहर निकले हुए दिखाई दे रहे थे।

उसने मदजल वहानेवाले बड़े-बड़े हाथियो को लेकर तथा उनकी सूँड़ो को एक दूसरे से बाँधकर उनका हार बनाकर अपने गले में पहन रखा था, अतः (चलते समय) उसकी कमर लचक रही थी। जब उसने भयंकर गर्जन किया, तब देवलोक, दसो दिशाएँ, सातो लोक—सभी भयभीत होकर थरथराने लगे. (उसका) गर्जन सुनकर स्वयं वज्र-ध्वनि भी डर गई।

गरजनेवाले मेघो के सदृश वह ताड़का उन तीनो (राम, लक्ष्मण और विश्वा- मित्र) को देखकर अट्टहास कर उठी; फिर अपने तीन पैनी नोकोवाले, यम के समान भयकर त्रिशूल पर दृष्टि रखती हुई और दाँतो को पीसती हुई, खुली हुई गुफ़ा के समान अपना मुँह खोलकर कहने लगी—

मुझ दुर्दम बलशालिनी के शासन में रहनेवाले इस वन के सभी प्राणियो को मैने खा डाला है, अब मेरे लिए स्वादिष्ट भोजन दुर्लभ हो गया है. क्या इसी कारण से विधि से प्रेरित होकर मरने के लिए तुम लोग यहाँ आये हो, बताओ।

(यह कहते हुए) जब उसने अपनी आँखे खोलकर देखा, तब मेघ चूर-चूर होकर नीचे गिर पड़े, जब उसने क्रोध से भरकर अपना पैर पटका; तब गगनस्पर्शी पर्वत भी टूट- फूट गये, चन्द्रमा के सदृश नुकीले छोरों के सदृश बढे दाँतों को पीसती हुई वह क्रोध से यह कहकर दौड़ी कि इस भाले से इनकी छाती फाड़ दूँगी।

महात्मा (विश्वामित्र) चाहते थे कि उस ताड़का का वध किया जाय, तथापि सद्गुण-सपन्न (राम) ने उसको मारने के लिए अपने तीखे शिरों का प्रयोग नही किया. (क्योंकि) यद्यपि वह उसके प्राण हरने के लिए उद्यत थी, तथापि उस महाभाग ने अपने मन में सोचा कि यह स्त्री है।

घने, मटमैले केशों और श्वेत दाँतोवाली (ताड़का) शूल फेंककर मारने के लिए उद्यत थी; फिर भी मालाओ से विभूषित (राम) उसका वध करने की इच्छा न करते हुए चुपचाप खड़े रहे। उनके मनोभाव को समझकर चतुर्वेदज्ञ कौशिक ने कहा -

हे रत्नविभूषित (श्रीराम)! जितने पापकृत्य हो सकते हैं, वे सब यह कर चुकी है : इसने हम तपस्वियों को इसलिए बिना खाये छोड़ दिया है कि हमारे शरीर सार- रहित, फीके और ढठल-मात्र हैं। क्या इस अत्याचारिणी को भी स्त्री समझना उचित है ?