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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

बालकाण्ड ३६

उस सिंहवली दशरथ के सामने एकाएक बड़े क्रोधी विश्वामित्र ऋषि आ उपस्थित हुए, जिन्होंने कभी सभी प्राणियों और लोकों का अलग सर्जन करके नये देवगण तथा नये ब्रह्मा की भी सृष्टि करने का उपक्रम किया था।

मुनि के आते ही, दशरथ झट अपने आसन से उठकर उनके चरणों में नत हुए, जैसे कमलासन (ब्रह्मा) के आगमन पर इंद्र उठ खड़ा हुआ हो. तब दशरथ के वक्ष पर (उनके उठने के साथ) हार भी हिलडुलकर यों किरण फेंकने लगे, जिससे सूर्य की कांति भी परास्त हो जाती थी।

(दशरथ ने मुनि को) प्रणाम कर उन्हें रत्नों से जड़े हुए स्वर्णासन पर बड़े प्रेम से बिठाया और उनके चरणकमल-युगल की अर्चना करके, हाथ जोड़कर कहा कि (आपके आगमन से) मेरे प्रारब्ध कर्म की परंपरा अभी टूट गई। (अर्थात्, मैं कर्म-बंधन से मुक्त हो गया।

हे महात्मन् ! आप इस नगर में सुलभता से पधारे और मैं आपकी परिक्रमा करके आपको प्रणाम कर सका, इस सौभाग्य का कारण यदि इस देश का किया हुआ तप मानें, तो वह नहीं है या मेरे किये अच्छे कर्म मानें, तो वह भी नहीं है : हाँ इसका कारण मेरे पूर्वजों के द्वारा किया हुआ तप ही हो सकता है। जब दशरथ ने इस प्रकार कहा. तब विश्वामित्र ने उत्तर दिया—

शत्रुओं का वध करके उनके मांस से युक्त भाला धारण करनेवाले, हे (दशरथ) ! मुझ जैसे मुनियों और देवताओं पर यदि कोई विपदा आ पड़े, तो सभी पर्वतों का उपहास करनेवाला धवल हिमाचल, क्षीरसागर, कमलासन के नगर (सत्य लोक) तथा कल्पवृक्ष से सुशोभित अमरावती के सदृश सुन्दर अट्टालिकाओं से विभूषित अयोध्या नगरी को छोड़, शरण देनेवाला स्थान क्या अन्य कोई हो सकता है ?

हे चक्रवर्त्ती ! मनोहर कल्पवृक्ष कि छाया में, जहाँ सुगंधित मधु यत्र-तत्र बिखरा रहता है, बैठकर शासन करनेवाला इंद्र जब राज्य से वंचित होकर तुम्हारे श्वेतच्छत्र की छाया में शरणागत हुआ था और अपने कष्ट बताकर सहायता की अभ्यर्थना करते हुए तुम्हारे सम्मुख आया था, तब तुमने ही तो उसपर कृपादृष्टि फेरकर कुलपर्वत-समान भुजाओं से युक्त ‘शंबर’ नामक असुर का समूल नाश करके इंद्र को उसका राज्य दिलवाया था: इन्द्र आज जो राज्य कर रहा है, वह तुम्हारा दिया हुआ ही तो है।

जब विश्वामित्र महर्षि ने इस प्रकार कहा, तब दशरथ के हृदय में आनन्द का एक समुद्र-सा उमड़ पड़ा, जिसका अंत कोई देख नहीं सकता था; उन्होंने हाथ जोड़कर मुनि से विनती की कि राज्यभार प्राप्त करने का जो फल हो सकता है, वह (आपके दर्शनों से) मुझे प्राप्त हो चुका, अब मुझे जो करना हो, उसकी आज्ञा दें तब विश्वामित्र ने उत्तर दिया--

मैं एक यज्ञ करना चाहता हूँ; उस यज्ञ की रक्षा उन राक्षसों से करनी है, जो उसमें विघ्न डालने आयेंगे, जिस प्रकार काम, क्रोध आदि दुर्गुण, मुनियों को डराते हुए उनके पास आ पहुँचते हैं तुम अपने चार पुत्रों में श्यामल (श्रीरामचन्द्र) को, युद्ध में अडिग रहकर उन राक्षसों से मेरे यज्ञ की रक्षा करने का आदेश देकर मेरे साथ भेज दो।

२० कंब रामायण

इस प्रकार विश्वामित्र ने दशरथ के मन में पीडा उत्पन्न करते हुए कहा; मानो यम ही प्राणों की याचना कर रहा हो।

अपरिमेय तपस्या-सम्पन्न विश्वामित्र के वचन (दशरथ को) ऐसे लगे, मानों शत्रु-प्रयुक्त भाले से उत्पन्न मर्मस्थान के घाव में लूक घुस गया हो। अंतर की पीडा से निकाले जानेवाले उनके प्राण डोलायमान हो उठे, जिससे उन्हें ऐसी वेदना हुई कि कोई जन्म का अंधा आँखें पाकर फिर खो बैठा हो।

निरंतर बहनेवाले मधु के छत्ते के समान मधुस्रावी मालाओं से सुशोभित उन चक्रवर्ती ने किसी प्रकार अपनी पीडा को दबाकर मुनि से निवेदन किया—हे महात्मन् ! यह राम तो अभी छोटा है. शस्त्र चलाने का अभ्यास भी इसे नहीं है; यदि राक्षसों का वध ही आपका उद्देश्य हो; तो अपनी जटा के एक ओर से गंगा को प्रवाहित करनेवाला शिव, चतुर्मुख ब्रह्मा अथवा पुरंदर भी आकर विघ्नकारी बनें; तो उन विघ्नों का भी विघ्न बनकर मैं आपके यज्ञ की रक्षा करूँगा। आप यज्ञ करने के लिए प्रस्तुत हो जायें।

दशरथ के इस प्रकार कहते ही मुनि, जो किसी समय अपर सृष्टि करने के लिए उद्यत हो गये थे; क्रोध से उबल पड़े : देवता यह आशंका करने लगे कि सृष्टि का अन्तकाल आ गया है : आकाश में चमकनेवाला सूर्य भी अदृश्य हो गया ॰ जहाँ-तहाँ स्थावर वस्तुएँ भी घूर्णायित होने लगीं ; (मुनि की) भौंहों के घने कोने (उनके) उठे हुए ललाट पर फैल गये : नयन रक्त वर्ण हो गये ; सभी दिशाओं में अँधेरा छा गया।

मुनि (विश्वामित्र) को क्रुद्ध जानकर (वसिष्ठ ने) उनसे प्रार्थना की कि हे मुनि, क्षमा करें : और (दशरथ से) कहा—जब तुम्हारे पुत्र को अप्राप्य हित स्वयं आकर प्राप्त हो रहा है, तब क्या उसका अवरोध करना उचित है ?

हे राजन् ! आज वह समय आया है, जब तुम्हारे पुत्र श्रीराम को अनन्त विद्याएँ उसी प्रकार प्राप्त हो रही हैं, जिस प्रकार वर्षा से बढ़ी हुई नदी की धाराएँ (स्वयं) सागर से जा मिलती हैं। (वसिष्ठ के) ये वचन सुनकर—

और गुरु की आज्ञा मानकर जयशील नरपति ने (अपने सेवकों को) आज्ञा दी कि तुम लोग जाकर राम को यहाँ ले आओ, सेवकों ने जाकर राम से निवेदन किया कि चक्रवर्ती आपको बुला रहे हैं : समाचार पाकर ज्ञानातीत श्रीरामचन्द्र अपने पिता के निकट आये।

दशरथजी ने रामचन्द्र को तथा उनके साथ आये हुए भाई लक्ष्मण को, आगे वेदों में निणात विश्वामित्र को दिखाकर कहा—प्रभो ! इनके ललिता आप ही हैं, अनुपम माता आप ही हैं; मैंने इन्हें आपके सुपुर्द कर दिया, इनके अनुकूल जो भी कार्य हों, इनसे लीजिए। यों कहकर मुनिवर को अपने पुत्र सौंप दिये।

कुमारों को प्राप्त करके (कामादि) दुर्गुणों से रहित विश्वामित्र का क्रोध शान्त हो गया। इन्होंने (दशरथ को) आशीर्वाद दिया। फिर कुमारों से कहा—चलो अब हम जाकर यज्ञ सम्पन्न करेंगे। तीनों वहाँ से चलने को उद्यत हुए।

सभी लोगों की रक्षा करनेवाले (राम) ने विजयप्रद खड्ग अपनी कटि से बाँधा

वालकाण्ड ४१

सत्य के समान ही दो अक्षय तूणीर अपनी पर्वत-जैसी दोनो ऊँची भुजाओ मे बाँधे और (वाम कर मे) विजय देनेवाला धनुष धारण किया ।

(रामचन्द्र) अपने अनुज के साथ सभी प्रकार मे (आयुधो से) सन्नद्ध हो. विश्वामित्र की छाया के समान उनका अनुमरण करते हुए, अयोध्या का ऊँचा स्वर्णमय प्राचीर पारकर यों चले, मानो पिता दशरथ के प्राण शरीर छोड़कर जा रहे हो ।

(वे तीनो) अयोध्या नगरी को, जिसकी समानता करने मे देवताओ की अमरावती भी असमर्थ थी, पारकर सरयू नदी पर पहुँचे, जिममे हंसो का कल्लोल नृत्यशाला मे नर्त्तकियो के मजीरो की ध्वनि-सा प्रतीत होता था ।

(वे लोग) एक उपवन मे ठहर गये, जिसके चारो तरफ के खेतो में ईख के डठलों के परस्पर संघर्ष से निकला हुआ मधुरस खेत की मेड़ो को पारकर बह रहा था और जहाँ के भ्रमर कुड्मल-समान स्तनोवाली रमणियो के केशपाश-जैसे दीखने थे।

जब सात सुनहले घोड़ो के रथ पर सवार होनेवाला सूर्य, अपने शिखरो पर ठहरे हुए मेघो के कारण, मुखपट्टधारी गज के जैसे शोभायमान दीखनेवाले उदयाचल की दृढ चोटी पर पहुँचा, तब वे (तीनो) सरयू के पार पहुँच गये।

श्रीराम ने एक वन को देखा, जहाँ ऐसे यज्ञ होते थे, जिनमे देवता स्वयं आकर अपनी इच्छा से आहुति ग्रहण करते थे; जहाँ का सारा वन धुएँ से भरा हुआ था, चरम तत्त्वो के ज्ञाता भगवान् श्रीरामचन्द्र ने दिव्य और महातपस्वी विश्वामित्र को प्रणाम करके पूछा कि यह कौन-सा वन है ? (१-२४)


अध्याय ७

ताड़का-वध पटल

(विश्वामित्र ने कहा-) यह वही स्थान है, जहाँ मन्मथ ने चंद्रशेखर शिव पर पुष्प-बाण चलाये थे और शिव के ललाट-नेत्र की क्रोधाग्नि ने उसे जलाकर भस्म कर दिया था । उसी समय से वह (मन्मथ) अपने कुसुम-समान अंग के दग्ध हो जाने से अनग बन गया ।

हे देवो के अधिष्ठाता ! जब हस्तिचर्म धारण करनेवाले (शिवजी) ने उस मन्मथ को जलाकर भस्म कर दिया, तब उसका शरीर राख बनकर इस स्थान मे बिखर गया । इसी-लिए इस प्रान्त को अनंग देश कहते हैं और इसी कारण से इस आश्रम का नाम 'कामाश्म' पड़ गया है ।

आसक्ति, इच्छा आदि का समूल नाश करके आत्मज्ञान के इच्छुक (भक्त लोग) जन्म-मरण के चक्कर से मुक्ति पाने के लिए जिस (शिव) का ध्यान करते हैं, उन्ही (शिवजी) ने स्वयं इस स्थान पर रहकर तपस्या की थी फिर इस स्थान की पवित्रता का क्या कहना है ?

४२ कंब रामायण

विश्वामित्र की बात सुनकर राम और लक्ष्मण आश्चर्य मे पड़ गये, फिर तीनो उस स्थान में पहुँचे, वहाँ पहुँचकर उन्होंने, उनके स्वागत के लिए आये हुए सन्मार्गधन मुनियो की सत्संगति मे पूरा दिन व्यतीत किया और (दूसरे दिन) जब विस्तृत किरणो से प्रकाशमान सूर्य उदयाचल के शिखर पर चढ़ने लगा, तब (वे वहाँ से प्रस्थान करके) एक मरुस्थल में पहुँचे, जो (धूप मे) तप रहा था।

उस मरुस्थल में ग्रीष्म ऋतु को छोड़कर अन्य कोई ऋतु नही होती थी, वहाँ सूर्यदेव भूमि का समस्त सार पीने के लिए विजय-ध्वजा फहराते हुए संचरण करते थे, गरमी के ताप के कारण वह स्थान ऐसा हो गया था कि यदि अग्निदेव भी उसका स्मरण करें, तो उनका मन भी कुम्हला उठे और उसकी ओर देखें, तो उनके नेत्र भी झुलस जायें।

यदि कोई उस मरुभूमि की उष्णता का वर्णन करना चाहे, तो वर्णन करनेवाले की जिह्वा झुलस जाय, वहाँ पहुँचकर (सारी सृष्टि को) आवृत कर फैलनेवाला अंधकार तथा अंतरिक्ष-रूपी आवरण भी झुलस जायें, वहाँ उदय होने पर सूर्य भी झुलस जाय, मेघ झुलस जायें, बिजली और वज्र भी झुलस जायें, ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो वहाँ पहुँचकर झुलस न जाय ?

वह वालुकामय प्रदेश उन योद्धाओ के हृदय के समान ही सर्वदा तपता रहता था और कभी ठंडा नही होता था, जो लड़ने की शक्ति खोकर, बाणो एवं भालों की वर्षा को सहते हुए युद्ध-क्षेत्र में पड़े हो और जो वंचक शत्रुओ के दुष्कृत्यो के कारण अपना मान-रूपी श्रेष्ठ रत्न खो बैठे हो।

उस बीहड़ प्रदेश में कही सूखे हुए सेंहुड, अगुरु आदि के वृक्ष खड़े थे, जिनके तनो को चीरकर भूत के जैसा काला अगुरु निकल रहा था, कही पत्तो से रहित बाँस के फट जाने से श्वेत मोती बिखर रहे थे, कही विषैले नागो के मुख से गिरे माणिक्य विकीर्ण हो रहे थे।

भू-माता उस स्थान से हट नही सकती थी, क्योकि वह अचला हैं, (उस स्थान की अधिष्ठात्री देवी) कालिका भी वहाँ से हट नही सकती थी, क्योकि उन्हे अपना स्थान नही छोड़ना चाहिए, उस स्थान के ऊपर सूर्य का रथ भी दौड़ नही पाता था, वहाँ के आकाश मे मेघ भी नही जा सकते थे, न वहाँ वायु का संचरण हो सकता था।

वहाँ (दर्शको के) नेत्रों को झुलसानेवाली विषाग्नि उगलनेवाला आदिशेष, आकाश को चीरनेवाली बिजली के समान चमकदार माणिक्य बिखेरता था। जब धरती की छाती को विदीर्ण करनेवाली सूर्य की प्रचण्ड किरणे उन माणिक्यो पर पडती थीं, तब ऐसा लगता था, मानो भू-देवी के शरीर मे खुले हुए घावो से रक्त निकल रहा हो।

व्याकुल करनेवाली क्षुधा से बेचैन होकर बड़ा अजगर जीव-जंतुओ को निगलने के लिए अपना मुँह खोलकर वहाँ पड़ा रहता था, गर्जन करनेवाला बलवान् हाथी गगन पर जलनेवाले सूर्य की उष्ण किरणो से रक्षा पाने के लिए छाया की खोज मे इधर-उधर भागता था और सामने अजगर के खुले मुख को देखकर उसके भीतर शीघ्रता से प्रवेश कर जाता था।

उस वालुका-भूमि में जहाँ अग्निदेव अपनी अतुलनीय उष्णता के साथ शासन

बालकाण्ड ४३

करते थे, कौए ओर हाथी भी झुलसकर काले हो जाते थे और यत्र-तत्र पड़े रहत थे , जिन्हें देखने से ऐसा लगता था, मानो उस मरुभूमि से उठकर सारे गगन मे छा जानेवाली उष्णता के कारण मेघ-समूह जल-भुनकर जहाँ-तहाँ गिरे पडे हो ।

उस स्थान मे जो मृग-मरीचिका सचरण करती थी, उसे देखने से भ्रम होता था कि वरुणदेव ही यह सोचकर वहाँ आ पहुँचे हों कि (उस मरुभूमि की) उष्णता कही बढकर गगन को भी न छू ले और कही देवलोक भी न जल जाय । (अर्थात्) देवताओ पर अनुग्रह करके ही वे वहाँ आ पहुँचे थे ।

उस संतप्त भूमि पर जो ग्रीष्म-रूपी राजा राज्य करता था, उसके बैठने के लिए बनाये गये सुनहले पैरवाले स्फटिक-सिंहासन के समान ही, वह मृग-मरीचिका ऊपर उठी हुई दिखाई देती थी ।

वह धरती इस प्रकार शुष्क थी, जिस प्रकार उन आत्मज्ञानियो का हृदय (शुष्क) होता है, जो (पुण्य और पाप-रूपी) दु ख-दायक विविध कर्मों को मिटाकर तथा दुर्निवार्य काम, क्रोध और मोह-रूपी बाधाजनक तीनो मोर्चों को पार कर, भक्ति-मार्ग पर चलते हैं; अथवा उन नारियो के मन के समान (शुष्क) था, जो सुवर्ण के लिए अपना शरीर बेच देती हैं।

तपानेवाली गरमी में झुलसे हुए छोटे-छोट कंकड़ वहाँ बिखरे पड़े थे, (गरमी के कारण) धरती मे जो दरारें पड़ गई थी, वे पाताल-लोक तक चली गई थी; इस प्रकार लंबी राह मिल जाने के कारण जगत् को तपानेवाली सूर्य-किरणे श्रेष्ठ माणिक्य से विभूषित सर्पराज के लोक में भी अनायास ही पहुँच जाती थी ।

जब इस प्रकार जलनेवाली बालुकामय उस भूमि में तीनो पहुँचे, तब विश्वामित्रने सोचा कि यद्यपि राम और लक्ष्मण अपार शक्ति-संपन्न हैं, तथापि वे पुष्प से भी अधिक कोमल हैं; अतः (इस मरुभूमि मे चलने में) उन्हे किंचित् कष्ट हो सकता है ।

(यह सोचकर) विश्वामित्र ने उनके मुखों की ओर दृष्टि डाली । इंगित को सहज ही जाननेवाले वे कुमार भी अपनी और देखनेवाले विश्वामित्र के चरणो के निकट जा पहुँचे । तब विश्वामित्र ने उन्हे ब्रह्मा द्वारा आविष्कृत दो विद्याएँ (बला तथा अतिबला) सिखाईं । दोनो ने उन मंत्रो का जप किया ।

जब वे उन मंत्रो का जप करते हुए चलने लगे, तब प्रलयाग्नि को भी पराजित करनेवाली भीषण अग्नि से उत्तप्त उस प्रदेश में यात्रा करना उसी प्रकार सरल हो गया, जैसे स्वच्छ तथा शीतल जल मे चलना होता है । उस समय भक्तो की इच्छा पूरी करनेवाले (श्रीराम) ने विश्वामित्र को प्रणाम करके पूछा—

'हे ज्ञानशिरोमणे! क्या यह प्रदेश, भँवरो से भरी हुई गंगा को पुष्पमाला के रूप मे अपनी जटा में धारण करनेवाले (शिव) की ललाट-दृष्टि पड़ने से इस प्रकार जल गया है, अथवा कोई और कारण है? क्या कारण है कि यह प्रदेश किसी निन्दनीय अत्याचारी नरेश के राज्य से भी अधिक उजड़ा हुआ पड़ा है?

(राम के) यह प्रश्न पूछने पर विश्वामित्र ने उत्तर दिया—एक ऐसी स्त्री का

४४ | कम्ब रामायण

वृत्तान्त तुम्हे सुनाता हूँ, जो अच्छे-अच्छे प्राणियो को मारकर खा जाती है, जिसका रूप यमराज के जैसा भयंकर है और जिसमे हजार मदमत्त हाथियो का बल है ।

यक्षो के कुल मे सुकेतु नामक निर्मल स्वभाववाला एक व्यक्ति उत्पन्न हुआ था, जो अपने बल से सारे ससार को चकित कर देता था, जिसका क्रोध अग्नि के समान जलानेवाला था; जो मोह से रहित था और जो हाथी जैसा बलवान् होने पर भी बडा कृपालु था ।

सुकेतु के कोई सतान नही थी, इसलिए वह बहुत चिन्तित रहता था । उसने (सतान-प्राप्ति के लिए) एक लंबी अवधि तक कमल-पुष्प पर आसीन ब्रह्मदेव के निमित्त कडी तपस्या की ।

हे सूक्ष्म ज्ञानयुक्त (रामचन्द्र) ! (सुकेतु के तपस्या करते समय) वेदो के आश्रय ब्रह्मदेव उसके सम्मुख प्रकट हुए और पूछा कि तुम्हारा अभीष्ट क्या है ? सुकेतु ने प्रार्थना की कि मेरे कोई पुत्र नही, इसलिए मै दुःखी हूँ । पुत्र-प्राप्ति का वर दीजिए । ब्रह्मा ने उत्तर दिया—तुम्हारे कोई पुत्र नही होगा; एक पुत्री ही होगी।

तुम्हारे एक ऐसी पुत्री होगी, जो कमल-पुष्प पर निवास करनेवाली सरस्वती के सदृश नित्य-यौवना, मयूर-जैसी सुन्दर, लक्ष्मी की समता करनेवाली तथा एक हजार मत्त हाथियो के बल से युक्त होगी । तुम चिन्ता छोडकर अपने घर जाओ ।

ब्रह्मदेव के वरदान के अनुसार उसके एक पुत्री हुई । जब वह पुत्री कमल-पुष्प-वासिनी सुन्दर लक्ष्मी के सदृश युवती हुई, तब सुकेतु ने सोचा कि इसके अनुकूल पति कौन हो सकता है ? अत मे अपनी ही जाति के अधिपति सुद नामक यक्ष से उसका विवाह कर दिया ।

सुद और उसकी पत्नी ताडका, रात-दिन आनन्द सागर मे डूबे रहते । उनके सुख की कोई सीमा नही रही ।

बहुत दिन बीतने पर, लक्ष्मी-समान उस ताडका के गर्भ से पर्वत-सदृश भुजाओवाला मारीच एव मल्ल-युद्ध मे निपुण सुबाहु उत्पन्न हुए, जिनके जन्म से सारा ससार भय से काँप गया ।

ये दोनो कुमार माया म, वचना मे और अपार बल मे इस प्रकार उन्नति करते गये कि उन्होने अपनी माँ से भी बढकर इन कलाओ का अभ्यास कर लिया और उससे भी आगे बढ गये । उनका पिता सुद, जिसका क्रोध जलानेवाला होता था, आनन्द की अधिकता के कारण—

दुर्गुणो से भरे असुरो का अत्याचार मिटानेवाले तथा विक्षुब्ध सागर को एक ही चुल्लू मे भरकर पी जानेवाले महातपस्वी (अगस्त्य) के आश्रम में पहुँचकर ऊँचे वृक्षो को जड से उखाडकर फेंकने लगा ।

अधिक स्पृहणीय तपस्या करनेवाले मुनि जिस आश्रम में रहते थे, वहाँ के कृष्णसार. रुरु. ऋष्य आदि (जातियो के) हिरणो को मारकर खा लिया और ऊँचे 'सुरपुन्ना' आदि वृक्षो को तोड दिया । इसपर महातपस्वी (अगस्त्य) ने क्रोध से अपनी अग्निमय दृष्टि फेरकर देखा तो वह जलकर भस्म हो गया ।

बालकाण्ड ४५

स्वर्ण-कंकण धारण करनेवाली उस ताडका ने जब सुन्द की मृत्यु का समाचार सुना, तब वह भयंकर अग्नि के समान क्रोध से भर गई ओर यह कहते हुए कि उस मुनि का समूल नाश कर दूँगी, अपने दोनो पुत्रो के साथ अगस्त्य के आश्रम मे जा पहुँची।

वे तीनो बड़ा भीषण गर्जन करते हुए ओर चिल्ला-चिल्लाकर अगस्त्य मुनि को पुकारते हुए (आश्रम में) जा पहुँचे। (उन्हें देखकर) वज्र, प्रलयाग्नि और युगान्तकाल के पवन भी भयत्रस्त हो उठे; देवता (भय के कारण) कान्तिहीन हो गये; सूर्य तथा चन्द्र भीत हो गये, विद्युत्-युक्त मेघ भी थरथराने लगे ओर ब्रह्माण्ड टूटने-सा लगा।

तमिल-भाषा-रूपी अपरिमेय समुद्र को लानेवाले ¹ उस मुनि (अगस्त्य) ने अपने नेत्रो से क्रोधाग्नि बरसाते हुए हुकार भरा और वज्र से भी कठोर ध्वनि मे उन्हे शाप दिया कि विनाश का कार्य करने के कारण तुम लोग तुरन्त राक्षस बनकर पतित हो जाओ।

तुरन्त (वे तीनो) ऐसे राक्षस बन गये, जिनके नेत्रो से पिघले हुए ताँवे के समान क्रोधाग्नि निकल रही थी, जो इस ससार तथा देवलोक के निवासियो को मारकर खाते हुए तथा उन्हे भयभीत करते हुए संसार में विचरने लगे।

उस समय उस मुनि के क्रोध तथा उनके दिये हुए अभिशाप का प्रतिकार करने मे असमर्थ होने के कारण वे वहाँ से हट गये और सुमाली ² नामक राक्षसराज के पास आ पहुँचे; सुबाहु और मारीच ने सुमाली से निवेदन किया कि हम आपके पुत्र के समान आपकी सेवा में रहेंगे।

उस पातकी ताडका के पुत्र, एक लबी अवधि तक छिपे रहे। जब रावण ने उत्पन्न होकर तपस्या के द्वारा महान् बल प्राप्त किया और उन दोनो को मामा कहकर सबोधित किया। तब, वे बाहर निकल आये और सभी लोको का विध्वंस करते हुए प्रलय-काल के प्रभंजन के समान विचरने लगे।


१. दक्षिण मे यह कथा प्रसिद्ध कि है संस्कृत-भाषा कीअभिवृद्धि करने के लिए काशी मे ऋषियो का एक संघ स्थापित हुआ था। अगस्त्य भी उस संघ के सदस्य थे। एक बार अन्य ऋषियो के साथ अगस्त्य का विकट मतभेद हो गया। इस पर अगस्त्य उस संघ से पृथक् हो गये और उन ऋषियों का गर्व चूर करने का निश्चय किया। उन्होने शिवजी के निकट पहुँचकर अपना अभीष्ट सूचित किया। उसी समय, जिस मडप में अगस्त्य शिवजी के साथ बार्तालाप कर रहे थे, वहाँ एक दिव्य सुगन्ध फैल गई। अगस्त्य ने जब उसके सबंध मे शिवजी से पूछा, तो शिवजी उन्हें उस मडप के एक कोने मे ले गये, जहाँ तालपत्रो का एक ढेर लगा हुआ था। उस ढेर को देखते ही अगस्त्य के मुँह से 'तमिल' शब्द निकल पड़ा, जिसका अर्थ होता है मधुर। उन तालपत्रो पर जो भाषा लिखी हुई थी, उसका नाम उसी समय से तमिल हो गया। अगस्त्य ने शिवजी से तमिल-भाषा का उपदेश प्राप्त किया और दक्षिण दिशा में चले आये। वहाँ पहुँचकर उन्होने 'पोदियमलै' की पहाड़ी पर अपना आश्रम स्थापित किया और तमिल-भाषा के दो व्याकरण लिखे - १ पेरबगत्तियम (बड़ा अगस्तीयम्) और २ शिरुअगत्तियम (लघु अगस्तीयम्)। फिर, उन्होने अपने बारह शिष्यो को उस व्याकरण का उपदेश दिया। इस प्रकार, उन्होने तमिल की अभिवृद्धि की। उपर्युक्त पद्य में इसी कथा की ओर संकेत है। -अनु०
२. सुमाली रावण की माता केदशी का पिता था, जो पाताल में रहता था।

४६ कव रामायण

इसके पश्चात् ताड़का अपने अति प्रचण्ड पुत्रों से अलग होकर, इस वन में आकर रहने लगी. तपस्वी अगस्त्य के क्रोध का स्मरण करके उसका मन अग्नि के समान धधकता रहता है और इस वन के प्रान्तो में अग्नि की ज्वालाएँ फैली रहती हैं।

चाहे भारी धरती को उखाड़ फेंकना हो, चाहे सभी समुद्रों के जल को पी लेना हो, या गगन को दाह देना हो—यह ताड़का सबमें समर्थ है. वह जो चाहे कर सकती है, उसके लिए कोई भी कार्य असम्भव नहीं वह ऐसी लगती है, मानो सख्या और परिमाणहीन पाप ही इस स्त्री का रूप धारण करके आ गये हों।

यदि कोई चलने-फिरनेवाला ऐसा समुद्र हो, जिसके पास दो बड़े पर्वत हों, जिससे विष निकल रहा हो जिसमे वज्रध्वनि से भी अधिक भीषण गर्जन हो, जिसके पास प्रलय-काल की अग्नि एवं दो अर्ध-चन्द्र¹ हों, तो उस स्त्री के भीषण शरीर से उसकी उपमा हो सकती है।

जिन सुन्दर भुजाओ को देखकर पुरुष भी स्त्रीत्व की कामना करते हैं. (जिससे कि उन भुजाओ का आलिगन प्राप्त कर सकें) ऐसी भुजा-विशिष्ट (हे राम)! काले नाग को कङ्कण के रूप मे पहननेवाली हाथ में शूलायुध धारण करनेवाली और अरण्य मे निवास करनेवाली उस कठोर स्त्री का नाम है—ताड़का।

लोभ नामक एकमात्र दुर्गुण यदि किसी के मन में जमकर बैठ जाय, तो वह असख्य सद्गुणो को मिटा देता है, उसी प्रकार अकथनीय अत्याचार करनेवाली उस राक्षसी ने इस विशाल भू-प्रदेश का विध्वस कर डाला है, जहाँ पहले शस्य और वृक्षो की विस्तृत सपत्ति भरी पड़ी थी।

हे पुष्प-मालाओं से सुशोभित मेघ-सदृश (राम)! यह ताडका लङ्केश्वर (रावण) की आज्ञा के अधीन रहती है, उसके दोनों पुत्र पर्वत के समान बलशाली होने के कारण मेरे लिए बड़ी बाधा बन गये हैं और मेरा यज्ञ अपवित्र कर देते हैं। यह (ताडका) सभी प्राणियो को उनके कुल-समेत मिटाती हुई अगदेश-भर में विचरण करती रहती है।

विश्वामित्र ने कहा—हे पुरातन लोकों की रक्षा करते हुए सन्मार्ग पर चलनेवाले, सभी जन को अपने प्राण-समान समझनेवाले मत्स्यकृतिवान् चक्रवर्ती (दशरथ) के पुत्र! अब उसके विषय में अधिक क्या कहूँ? वह कुछ ही दिनो में यहाँ के सभी प्राणियो को अपने उदर में समा लेगी।

विश्वामित्र की बात सुनकर पाञ्चजन्य (शख) धारण करनेवाले, (वाम) हस्त मे धनुष धारण किये हुए (श्रीरामचन्द्र) ने सुगधित पुष्पो से शोभायमान अपने सिर को हिला-कर पूछा—इस प्रकार का अत्याचार करनेवाली यह (राक्षसी) कहाँ रहती है?

पचेन्द्रियो को अपने वश में रखनेवाले (विश्वामित्र) ने पर्वत, हाथी तथा ऋषभ-सदृश (रामचन्द्र) के वचन सुने और उत्तर दिया कि हे तात! यहाँ से निकट ही वह रहती है। उनके इतना कहने के पूर्व ही वह (ताड़का) स्वय वहाँ आ उपस्थित हुई, मानो अग्नि-ज्वालाओ से भरा हुआ कोई अग्निमय पर्वत ही आ उपस्थित हुआ हो।


¹ ताड़का के मुख से बाहर निकले हुए दो दाँत दोनों अर्धचन्द्र के समान हैं।

बालकाण्ड ४७

जब वह (ताड़का) चली आ रही थी; तब उसके नूपुर-अलंकृत पैरो के नीचे दब- कर पर्वत धरती के भीतर धँस रहे थे, जिससे धरती के तल में अस्त-व्यस्तता उत्पन्न हो रही थी और पहाड़ी के धँस जाने से बने गड्ढों में समुद्र का जल भर रहा था। अग्नि के समान तथा निर्भीक यमराज भी उससे डरकर बिल के अन्दर जा छिपा था और अचल कहे जाने- वाले पर्वत भी (उसकी गति के वेग से उखड़-उखड़कर) उसके पीछे-पीछे उड़ते हुए आ रहे थे।

वेदो की विरोधिनी उस ताड़का की भौंहों के कोने कुछ कंपित हो रहे थे. उसका गुहा-सदृश मुँह बँट था, उसके मुँह के दोनों छोरों पर दो लंबे दाँत, दो अर्धचंद्रों के समान, बाहर निकले हुए दिखाई दे रहे थे।

उसने मदजल वहानेवाले बड़े-बड़े हाथियो को लेकर तथा उनकी सूँड़ो को एक दूसरे से बाँधकर उनका हार बनाकर अपने गले में पहन रखा था, अतः (चलते समय) उसकी कमर लचक रही थी। जब उसने भयंकर गर्जन किया, तब देवलोक, दसो दिशाएँ, सातो लोक—सभी भयभीत होकर थरथराने लगे. (उसका) गर्जन सुनकर स्वयं वज्र-ध्वनि भी डर गई।

गरजनेवाले मेघो के सदृश वह ताड़का उन तीनो (राम, लक्ष्मण और विश्वा- मित्र) को देखकर अट्टहास कर उठी; फिर अपने तीन पैनी नोकोवाले, यम के समान भयकर त्रिशूल पर दृष्टि रखती हुई और दाँतो को पीसती हुई, खुली हुई गुफ़ा के समान अपना मुँह खोलकर कहने लगी—

मुझ दुर्दम बलशालिनी के शासन में रहनेवाले इस वन के सभी प्राणियो को मैने खा डाला है, अब मेरे लिए स्वादिष्ट भोजन दुर्लभ हो गया है. क्या इसी कारण से विधि से प्रेरित होकर मरने के लिए तुम लोग यहाँ आये हो, बताओ।

(यह कहते हुए) जब उसने अपनी आँखे खोलकर देखा, तब मेघ चूर-चूर होकर नीचे गिर पड़े, जब उसने क्रोध से भरकर अपना पैर पटका; तब गगनस्पर्शी पर्वत भी टूट- फूट गये, चन्द्रमा के सदृश नुकीले छोरों के सदृश बढे दाँतों को पीसती हुई वह क्रोध से यह कहकर दौड़ी कि इस भाले से इनकी छाती फाड़ दूँगी।

महात्मा (विश्वामित्र) चाहते थे कि उस ताड़का का वध किया जाय, तथापि सद्गुण-सपन्न (राम) ने उसको मारने के लिए अपने तीखे शिरों का प्रयोग नही किया. (क्योंकि) यद्यपि वह उसके प्राण हरने के लिए उद्यत थी, तथापि उस महाभाग ने अपने मन में सोचा कि यह स्त्री है।

घने, मटमैले केशों और श्वेत दाँतोवाली (ताड़का) शूल फेंककर मारने के लिए उद्यत थी; फिर भी मालाओ से विभूषित (राम) उसका वध करने की इच्छा न करते हुए चुपचाप खड़े रहे। उनके मनोभाव को समझकर चतुर्वेदज्ञ कौशिक ने कहा -

हे रत्नविभूषित (श्रीराम)! जितने पापकृत्य हो सकते हैं, वे सब यह कर चुकी है : इसने हम तपस्वियों को इसलिए बिना खाये छोड़ दिया है कि हमारे शरीर सार- रहित, फीके और ढठल-मात्र हैं। क्या इस अत्याचारिणी को भी स्त्री समझना उचित है ?

४८कंब रामायण

लज्जाशील स्त्री का वध करना उपहास का कारण हो सकता है, (परन्तु) इस (ताड़का) का नाम लेने मात्र से पौरुषयुक्त बलवानों का सारा भुजबल नष्ट हो जाता है। फिर, पौरुष नामक गुण (इस ताड़का के अतिरिक्त) अन्यत्र कहाँ स्थित है ?

इंद्र इससे हार गया, असुर तथा स्वर्गवासी देवता इससे अपनी सेना के पराजित होने पर हारकर भाग गये ; यदि इसकी भुजाएँ मंदर पर्वत की तुलना करती हैं, तो पौरुष में, पुरुष और इसमें क्या अंतर है ?

राजाधिराज के प्रिय पुत्र (राम) । और एक वृत्तान्त तुमको सुनाना बाकी है, उसे भी सुन लो । प्राचीन काल में कभी ऐसा हुआ, इस प्रकार अनन्त तपस्यायुक्त विश्वामित्र कहने लगे --

भृगु नामक तपस्वी की मीन जैसे सुन्दर नयनोंवाली पत्नी ख्याति ने, बलवान् असुरों पर दया करके उन्हें छिपा रखा था और (उन्हें मारने के लिए दौड़कर उनके पीछे आनेवाले) चक्रपाणि विष्णु से उन्हें बचाया था, तब विष्णु ने उस नारी का वध किया था ।

देवाधिराज इंद्र ने अपने वज्रायुध से कुमति नामक स्त्री का वध किया था, जो देव-लोक तथा भू-लोक के सभी निवासियों को अपना आहार बनाती थी ।

स्त्री-हत्या के उस कार्य से विष्णु तथा इन्द्र को इतनी कीर्ति प्राप्त हुई, जिसका वर्णन हम नहीं कर सकते । उन्हें क्या किसी तरह का अपवाद मिला था ? हे पुष्पों की घनी माला पहने हुए (राम) ! तुम्हीं बताओ ।

अपने अत्यंत बलशाली शासन-चक्र से समस्त पृथ्वी पर राज्य करनेवाले सूर्यवंश में उत्पन्न गरिमामय (रामचंद्र) ! जिसने महात्माओं से विरोध किया, जिसने इस धरती के सहस्रों प्राणियों का वध किया और दृढ़तापूर्वक धर्म का विनाश किया, क्या उस ताड़का के लिए पौरुष (पुरुषत्व) गुण भी आवश्यक है ? (अर्थात् , इससे बढ़कर पुरुष कौन हो सकता है ?)

हे यम के समान भयंकर शूलधारी (राम) ! यम तो यह विचार करके ही कि प्राणियों का विधि-विहित जीवन-काल समाप्त हुआ या नहीं, उनके पुण्य कर्मों का भी खयाल करके, उन्हें अमरलोक में ले जाता है , परन्तु यह ताड़का तो प्राणियों की गंध पाते ही उन्हें खा डालने की इच्छा रखती है , भला क्या, इससे बढ़कर भी कोई दूसरा यम हो सकता है ?

हे प्रभो ! अनेक जीवित प्राणियों को एक साथ अपने मुँह में डालकर चबा जाने से बढ़कर अधम तथा कठोर कृत्य और क्या हो सकता है ? इस ताड़का को जूड़ा बाँधने-योग्य केशोंवाली तथा भोली-भाली स्त्री मानने से हमारी निर्बलता ही प्रकट होगी ।

शाश्वत धर्म का विचार करके ही मैंने तुम से (यह सब) कहा है, ऐसा मत समझो कि इस ताड़का के साथ द्वेष-भाव रखने के कारण मैं ऐसा कह रहा हूँ । तुम जो इस पर क्रोधरहित हो रहे हो, यह धर्म नहीं है । इस राक्षसी का संहार करो । —इस प्रकार मुनि ने (राम से) कहा ।

उन्होंने विश्वामित्र के ये वचन सुनकर कहा—हे सत्यस्वरूप ! यदि धर्म-विरुद्ध

बालकाण्ड ४६

कार्य भी करना आवश्यक हो जाय और आप उसे करने का आदेश दे, तो आपका वचन वेद-वाक्य मानकर करना ही मेरे लिए परम धर्म है।

स्त्री-रूप में भी अग्नि के समान भयंकर उस ताड़का ने, गंगा ( सरयू १ ) के मधुर प्रवाह से शोभित कोशल देश के राजकुमार ( रामचंद्र ) का मनोभाव जान लिया और ( अपने ) कठोर नयनों में क्रोधाग्नि प्रज्वलित करते हुए, अपने रक्तवर्ण हाथ के शूलाग्नि-रूपी तीक्ष्णाग्नि को ( रामचंद्र के ऊपर ) फेंका।

नवीन यम-स्वरूपिणी उस ताड़का ने जाज्वल्यमान तीन फलोवाले त्रिशूल-रूपी प्रलयंकर अग्नि को फेंका; वह त्रिशूल ( रामचंद्र की ओर ) इस प्रकार बढ़ा, मानो पूर्णचंद्र को ग्रसने के लिए राहु आ रहा हो।

उस क्षण विष्णु के अवतारभूत ( राम ) ने किस तरह तीर उठाकर उसका प्रयोग किया और कब अपने धनुष को झुकाया, यह किसी ने नहीं देखा। सबने इतना ही देखा कि ताड़का ने यम के हाथों से छीनकर जिस शूल को राम पर फेंका था, वह शूल दो टुकड़े होकर नीचे पड़ा है।

( इसके पश्चात् ) अंधकार तथा मेघों की समता करनेवाली, काले रंगवाली, उस ताड़का ने बड़े-बड़े पत्थरों को अपने हाथों से उठा-उठाकर इतना बरसाया कि समुद्र भी उन पत्थरों से पट जाय। पर, वीर ( राम ) ने पत्थरों की उस वर्षा को अपने धनुष से की गई शर-वर्षा से एकदम रोक दिया।

नीलवर्ण ( श्रीराम ) ने मुनि के शाप के समान अत्यन्त तीक्ष्ण तथा जलानेवाले एक शर को उस अंधकार-रूपिणी ताड़का के ऊपर ज्यों ही प्रयोग किया, त्यों ही वह तीर ताड़का के वज्र-पर्वत के समान कठोर छाती में घुसकर उसी प्रकार दूसरी ओर निकल गया; जिस प्रकार सज्जनों का उपदेश मूर्ख-जनों के हृदय को पार कर निकल जाता है।

अत्यन्त उत्तुंग स्वर्णमय मेरु पर्वत के समान गंभीर ( रामचंद्र ) के तीक्ष्ण अनी-वाले बाणों का प्रलयंकारी प्रभंजन ज्यों ही उठा, त्यों ही ताड़का इस प्रकार ( मृत हो ) गिर पड़ी, जिस प्रकार गगन में गरजते हुए तथा पत्थरों की वर्षा करते हुए प्रलयकालिक मेघ, प्रभंजन से आहत हो, अपनी बिजली के साथ पृथ्वी पर आ गिरा हो।

जब गुफा-जैसा अपना मुँह खोलकर ताड़का, जिसके बड़े-बड़े दाँतों में कई प्राणियों के मांस लगे हुए थे, नीचे गिरी, तब उसके शरीर से जो रक्त प्रवाहित हुआ, उससे वहाँ की धूल-भरी बीहड़ मरुभूमि भी सिंचित हो गई; उसका गिरना क्या था, दस सिरों पर मुकुट धारण करनेवाले ( रावण ) को उसके सर्वनाश की सूचना ही थी, मानो उस दिन उस ( रावण ) की विजय-पताका ही टूटकर धरती पर गिर गई हो।

ताड़का के कठोर वक्षःस्थल में तीर लगने से जो रक्त-प्रवाह हुआ, उससे वह सारा वन अपना रूप बदलकर समुद्र बन गया। उस वन में फैली हुई रक्त की बाढ़ देखने से ऐसा प्रतीत हुआ, मानो संध्याकालिक लालिमायुक्त गगन आधारहीन हो पृथ्वी पर गिर पड़ा हो।

सुगंधित कमल-पुष्प पर बैठनेवाले ब्रह्मा के समान मुनि ( विश्वामित्र ) की आज्ञा

५० | कंब रामायण

का पालन करके रत्नमय स्वर्णाभरण पहननेवाले काकुत्स्थ (रामचंद्र) ने जो प्रथम युद्ध किया, उसमें यम को, जो अबतक राक्षसों का रक्त पीने की अभिलाषा रखते हुए भी खड्गादि आयुधधारी राक्षसों से भयभीत होकर रहता था, राक्षसों के रक्त का थोड़ा सा स्वाद मिला।

तब देवताओं ने मुनि (विश्वामित्र) के निकट आकर कहा कि आज हमने अपना आश्रय-स्थान वापस पा लिया है, आपको भी अब कोई बाधा नहीं रही; इसलिए अब आप चक्रवर्ती के कुमारों को दिव्य अस्त्र प्रदान करें। फिर, उन्होंने धनुर्धारी काल-मेघ सदृश (श्रीराम) पर पुष्पों की वर्षा की और उन्हें बधाइयों देकर वहाँ से विदा किया।
(१-७६)

अध्याय ८

यज्ञ पटल

जब देवताओं की पुष्पवर्षा से वह उष्ण मरुप्रदेश शीतल हो गया, तब दूसरों के लिए दुर्लभ तपस्या से संपन्न विश्वामित्र ने (राम-लक्ष्मण के साथ) बड़ी सरलता से उसे पार कर लिया, फिर उन्होंने उस महानुभाव (रामचन्द्र) को ऐसे अस्त्र दिये, जो तिरुवेण्णैयनल्लूर के निवासी तथा महान् दानी शडैयप्पवल्लल के^१ भूलोकवासियों के दारिद्र्य-रोग को दूर करनेवाले औषध-स्वरूप, वचन के समान अमोघ थे।

संयमी और त्रिकालज्ञ मुनिवर ने जो-जो अस्त्र, उनके मंत्रों को बताकर, महानुभाव (राम) को दिये, वे सब बड़ी उमंग के साथ वैसे ही उनके पास आ पहुँचे, जैसे शुद्ध मन से किये गये सत्कर्मों के फल दूसरे जन्म में स्वयं अपने कर्त्ताओं को प्राप्त हो जाते हैं।

(देवास्त्रों ने श्रीरामचन्द्र से निवेदन किया कि) हे वीर ! हम आपके आश्रय में आ पहुँचे हैं, अब आपको छोड़कर अन्यत्र नहीं जायेंगे; आप विधि के अनुसार जो भी आदेश हमें देंगे, हम उसका पालन आपके भाई लक्ष्मण के समान करेंगे। उन्होंने भी यह वचन सुनकर अपनी स्वीकृति दे दी। तब से वे देवास्त्र नीलकमल-तुल्य (श्रीराम) की सेवा में निरत हुए।

इन घटनाओं के पश्चात् वे लोग दो कोस आगे चले, वहाँ एक बड़ा शोर सुनाई पड़ा, जो क्रमशः उनके निकट आने लगा। तब उन्होंने मुनि से पूछा कि 'हे महात्मन् ! यह ध्वनि कैसी है?' तपस्या से अपने कर्मों को मिटा देनेवाले मुनि (विश्वामित्र) ने उत्तर दिया—


१ तिरुवेण्णैयनल्लूर के शडैयप्पवल्लल कवि के आश्रयदाता थे और समय-समय पर धन देकर उनकी सहायता करते थे। कवि ने स्थान-स्थान पर उनका स्मरण करके उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की है।—अनु०

बालकाण्ड ५१

'मानस (मानस-सरोवर) से निकलनेवाली (और इसीलिए) सरयू' कहलाने-वाली, देवताओं से भी प्रशंस्यमान नदी यहाँ बहती है, जिसमें गोमती नामक नदी आकर मिलती है; उन दोनों के मिलने से ही यह ध्वनि उत्पन्न होती है।' उनके (विश्वामित्र के) यह कहने पर तीनों आगे बढे और भवसागर से पार उतारनेवाली एक पवित्र नदी के पास पहुँचे।

उस महानुभाव ने विश्वामित्र से पूछा कि हे देवगण से स्तुत्य मुनि ! यह बड़ी पावन नदी कौन-सी है ? वे बोले—"कमलासन ब्रह्मा ने प्राचीन काल में कुश नामक एक प्रतापी तथा गुणशील राजा को जन्म दिया था। उसके अपनी धर्मपत्नी से चार पुत्र हुए। उनके नाम थे—कुश, कुशनाभ, सद्गुणविशिष्ट आधूर्त्त और जयशील वसु। इनमें से कुश कौशांबी नगर में, कुशनाभ महोदय नामक नगर में, आधूर्त्त दोषहीन धर्मवन नामक नगर में और वसु गिरिव्रज नामक नगर में राज करते थे।

उनमें से कुशनाभ के एक सौ लड़कियाँ उत्पन्न हुईं, जो मिष्टभाषी, सुन्दर होठो-वाली और सद्गुणो मे विभूषित थी। वे जब सयानी हुईं, तब एक दिन अपनी सखियो के साथ क्रीडा करती हुई एक उपवन मे जा पहुँची। उसी समय वायुदेव वहाँ आये और उनके सौन्दर्य पर मुग्ध होकर उन कन्याओ से कहा --

'हे आम की फाँक के समान नुकीले नयनयुक्त कन्याओ! मैं मकरकेतु (मन्मथ) के झुके हुए धनुष से निकले हुए पुष्प-बाणो से विद्ध हो गया हूँ, (अतः) तुमलोग मुझसे विवाह कर लो।' तब उन कन्याओं ने उत्तर दिया कि आप जाकर हमारे पिता से यह बात कहें, यदि वे कन्यादान करके हमे आपकी पत्नी बनायेंगे, तो हम आपके संग जा सकती हैं। यह सुनकर वायुदेव बहुत क्रुद्ध हुए और उनकी पीठों को तोड़कर उन्हे कूबड बना दिया, जिससे सुन्दर प्रकाशमान कंकण पहनी हुई वे कन्याएँ धरती पर गिर पड़ीं।

जब वायुदेव चले गये, तब वे कन्याएँ किसी प्रकार घिसटती हुई अपने पिता के पास पहुँची और करुणा-भरी वाणी में सारा वृत्तात कह सुनाया, राजा ने उन दीर्घ केशोंवाली अपनी कन्याओ को आश्वासन दिया और महान् तपस्वी चूलि के पुत्र ज्ञानी ब्रह्मदत्त से उनका विवाह कर दिया।

उस ब्रह्मदत्त के कर-कमल का स्पर्श पाते ही उनका कूबड़ मिट गया और उन्होने अपना पूर्व सौन्दर्य प्राप्त कर लिया। पूरी पृथ्वी पर शासन करनेवाले कुशनाभ ने अपुत्र होने के कारण मुनियो की सहायता से एक यज्ञ किया। उस यज्ञकुण्ड के मध्य से गाधि नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसकी तीव्रगामी अश्वसेना (प्रसिद्ध) हुई।

कुशनाभ गाधि को राज्य देकर स्वर्ग सिधारा, प्रसिद्ध महोदय नगर मे राज्य करनेवाले गाधि के मै और मुझसे पहले कौशिकी नामक एक कन्या उत्पन्न हुई। राजाओ के राजा गाधि ने कौशिकी का विवाह भृगु महर्षि के पुत्र ऋचीक के साथ कर दिया, जिनकी तपस्या की समानता स्वयं उनके पिता भी नही कर सकते थे। वह वेदज्ञ कुछ समय तक धर्म, अर्थ और काम को सम्पन्न कर फिर बड़ी तपस्या करके ब्रह्मलोक को प्राप्त हुए।

जब कौशिकी का प्रिय पति उसको छोड़कर स्वर्ग चला गया, तब वह पति-

५२कंब रामायण

वियोग नही सह सकी। वह भी नदी का रूप धारण कर पति की अनुगामिनी हुई। तपस्वियो में प्रधान ऋचीक मुनि ने उसे देखकर आशीर्वाद दिया कि तुम इसी भूतल पर रहो, जिससे भूतलवासी तुमसे (तुममें स्नान करके) अपने दुःख मिटा सकें और ब्रह्मलोक प्राप्त कर सके।

मेरी ही ज्येष्ठ वहन कौशिकी इस महान् नदी के रूप में भूतल पर रह रही है।" विश्वामित्र से यह कथा सुनकर वह उत्तम कुमार (राम) तथा उनके अनुज लक्ष्मण आश्चर्य में पड़ गये। कुछ दूर आगे जाने पर उन्हें एक उपवन दिखाई दिया, जहाँ मेघ आकर विश्राम करते थे; उनके पूछने पर कि यह कौन-सा उपवन है ? महान् तपस्वी विश्वामित्र कहने लगे—

यह उपवन उतना ही विशुद्ध है, जितना उन नारियो का मुख होता है, जो अपने पति के अतिरिक्त अन्य किमी दैव या तपस्या को नही मानती। और सुनो, अरुण-नयनों-वाले श्रीविष्णु, जिनका स्वरूप चार वेदो, देवताओ तथा मुनियो के लिए भी अज्ञेय है, कभी इस स्थान मे रहकर तपस्या करते थे।

भूलोक तथा देवलोक के निवासी बधनो से मुक्त होने के लिए जिसका नाम जपते हैं और जिनकी माया के रहस्य को कोई भी नही जान पाता, वही प्रसिद्ध अमल मूत्तिं (विष्णु) ने इस स्थान पर एक सौ कल्प तक घोर तपस्या की थी।

जिस समय वे इस उपवन में तप कर रहे थे, उस समय महावलि नामक एक राजा ने स्वर्ग और भूलोक दोनो को अपने अधीन कर लिया। वह महाबलि उस महावराह के समान बलवान् था, जिसने इस भूतल को अपने एक वक्र दन्त पर अनायास ही उठा लिया था।

'ससार में उसको कोई भी पराजित कर सकेगा', ऐसी शका से मुक्त होकर, तपस्या में निरत उस चक्रवर्त्ती ने ऐसा एक महायज्ञ सपन्न करने का निश्चय किया, जो देवताओ के लिए भी असाध्य हो और जो घृत आदि होम-द्रव्यों से सपूर्ण हो। उसने निश्चय किया कि वह उस यज्ञ मे अपनी भूमि तथा अन्य सभी सपत्ति ब्राह्मणो को दे देगा।

देवो ने जब इस यज्ञ का समाचार सुना, तब इस उपवन मे आये। यहाँ तपस्या में निरत विष्णु को प्रणाम करके प्रार्थना की कि हे भगवन्! आप उस अत्याचारी महावलि के दुष्कृत्यो को रोकिए। विष्णु ने भी ऐसा करने की सम्मति दे दी।

नीलवर्ण तथा सद्गुणो मे विभूषित विष्णु, त्रिकालज्ञ कश्यप और अदिति के पुत्र के रूप मे अवतरित हुए। वे वामन-रूप मे थे, जसे एक बड़े वटवृक्ष को अपने भीतर छिपाये हुए एक छोटा-सा बीज हो।

अद्भुत गुणो एव कार्यों से युक्त (विष्णु), हाथ में अग्नि लिये हुए एक वामन का रूप धारण करके चले। इसका तत्त्व केवल ज्ञानी ही जानते हैं, उनकी यह आकृति ब्रह्मा के ज्ञान-स्वरूप ही थी।

सभी लोकों को जीतनेवाले महावलि ने जब यह समाचार सुना कि एक वामन मूत्तिं उसके यहाँ आये हैं, तब वह आश्चर्य-चकित हो गया; उसने उठकर उनका स्वागत किया और कहा—हे परिपूर्ण। आपसे श्रेष्ठ ब्राह्मण समार में दूसरा नही है, आपके दर्शन पाकर मैं कृतार्थ हो गया।

बालकाण्ड ५३

पौरुषवान् महावलि की बात सुनकर सर्वज्ञ वामन ने कहा—तुमने याचकों की इच्छा से भी अधिक दान दिये हैं। (इसलिए) हे दीर्घ करवाले ! अब याचक बनकर तुम्हारे समीप जो आये, वही महान् है और जो न आये, वह कैसे महान् हो सकता है ?

यह सुनकर महावलि आनन्दित हुआ और उत्तर में उसने पूछा—कहिए अब, आपके लिए मैं क्या करूँ ? महावलि के इतना कहते ही वामन ने कहा—यदि दे सको, तो तीन पग भूमि-मात्र मुझे दो । वामन के 'दो' कहने के पूर्व ही बलि ने कहा—'दिया ।' इतने में शुक्राचार्य ने उसे रोका ।

(शुक्र ने कहा ) राजन् ! जिस वामन-रूप को हम मागने देख रहे हैं, यह छल-मात्र है । यह मत सोचो कि जल-भरे मेघ-सदृश नीलवर्णवाला यह वामन साधारण मनुष्य है । यह वह पुरुष है, जिसने कभी सभी अंडो को तथा ( उनमें रहनेवाले ) सभी वस्तु-समूह को निगल लिया था। इस मर्म को समझो ।

(बलि ने कहा) आप यह नहीं देख रहे हैं कि मेरा कर दान देने के लिए ऊपर उठा हुआ है और मेरे सम्मुख जलसमृद्ध मेघ जैसे विष्णु का कर दान लेने के लिए नीचे फैला हुआ है, जो उनकी महत्ता के अनुकूल नहीं है । अब इससे बढ़कर मेरा गौरव और क्या हो सकता है ?

आदर-योग्य, सन्मार्ग बतानेवाले धर्मशास्त्रों के ज्ञाता (दान देते समय ) यह नहीं सोचते कि यह (दान माँगनेवाला ) अपना है या पराया, वे तो यह कहते हैं कि मेरे इस दान को कोई उत्तम व्यक्ति आगे बढ़कर ग्रहण करे । इस वामन के समान योग्य व्यक्ति और कौन हो सकता है ?

आप वेल्ली¹ कहलाते हैं, इसलिए आपने इस प्रकार कहा । उत्तम नर याचकों के सभी अभीष्टों को पूर्ण करते हैं । यदि कोई उनके प्राण भी माँगे, भले ही किसी याचक के लिए ऐसा दान माँगना अनुचित है, तो वे अपने प्राणों का भी दान कर देते हैं।

हे पितृ-तुल्य ! संसार में प्राण-रहित लोग (वास्तव में ) मृत नहीं हैं; परन्तु जो प्राणों का त्याग न करते हुए भी दूसरों से याचना करते हैं, वे ही मृत हैं । जो शरीर त्याग कर मृत कहलाते हैं, वे मृत होने पर भी यदि दानी हों, तो अमर बन जाते हैं । ऐसे दानियों के सिवा संसार में कौन जीवित रहने योग्य हैं ?

वे (वास्तव में) शत्रु नहीं होते, जो उत्तरोत्तर बढ़नेवाली हानि उत्पन्न कर देते हैं । दानियों के सच्चे शत्रु वे ही होते हैं, जो दान देते समय उनको रोकते हैं। वे दूसरों की ही नहीं, प्रत्युत अपनी भी हानि करते हैं। दाता को दान देने से रोकने के समान पापकृत्य दूसरा नहीं है।

(धर्मशास्त्रों के ) वचनों के अनुसार जब संपत्ति अपने वश में रहती है, तब दान देना चाहिए और इस लोक में यश तथा उस धर्म का फल—पुण्य भी प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रकार प्रयत्न करनेवालों के अंतरंग शत्रु वे लोग ही होते हैं जो यह कहकर उन्हें दान देने से मना करते हैं कि 'लोभ-गुण का त्याग मत करो।'


१ तमिल में वेल्ली का अर्थ 'शुक्र' तथा 'अज्ञान' दोनों होते हैं।

५४

कम्ब रामायण

हे सद्गुणहीन शुक्र, दान देते समय बाधा डालनेवाले निष्ठुर ! किसी याचक को देने के पूर्व 'मत दो' कहकर किसी दाता को रोकना क्या तुम्हे शोभा देता है ? तुम्हारे इस कार्य से तुम्हारे बन्धु भी वस्त्र और अन्न से वंचित हो जायेंगे।

इस प्रकार कहकर महाबलि ने शुक्राचार्य के सभी वचनो को यह समझकर कि मन्त्री कठोर हृदयवाला है, अस्वीकार कर दिया और (वामन से) यह कहते हुए कि तुम्हीं तीन पग (भूमि) नापकर ले लो, उस वामन के छोटे-से हाथ में जल दे दिया।

सरोवर का स्वच्छ जल ज्यो ही वामन के हाथ में गिरा, त्यो ही वह वामन-मूर्ति, जिसका बौनापन उसके माता-पिता की भी घृणा का विषय हो सकता था, इस प्रकार गगन तक ऊँचा चढ गया कि सामने खडे रहकर उसे देखनेवाले लोग विस्मय और भय मे डूब गये। वह उसी प्रकार बढता चला गया जिस प्रकार उत्तम पात्र को दिये गये दान का फल बढता चला जाता है।

उस बौने का जो पग धरती पर रहा, वह समस्त विश्व पर छा गया और धरती के छोटी होने के कारण और आगे नही फैल सका। दूसरा पग जो गगन-भर मे छाकर स्वर्गलोक को भी पार कर गया था, आगे बढने के लिए और स्थान न पाने के कारण लौट पडा।

समस्त भूतल और गगन-मडल को अपने दो पगो के अन्तर्गत कर लेने के कारण तीसरे पग के लिए स्थान ही बाकी न रहा। उस तीसरे पग के लिए भक्त महाबलि का सिर ही स्थान बना। हे धनुष-शोभित भुजावाले (रामचन्द्र) ! तुलसी-माला से विभूषित सिर-वाले विष्णु (सचमुच) बहुत छोटे हैं।¹

यज्ञरूप विष्णु ने तीनो लोको का राज्य इन्द्र का स्वत्व कहकर उसे दे दिया और स्वयं क्षीरसागर मे जाकर शयन करने लगे, जहाँ उनके भुवनव्यापी चरण लक्ष्मी देवी के कर-स्पर्श से लाल दिखाई देते हैं।

कर्मबन्धनो को समूल नष्ट करनेवाले (रामचन्द्र) ! इस उपवन मे विष्णु भगवान् ने तपस्या की थी, अत. जो भक्ति-श्रद्धा के साथ इस प्रदेश के दर्शन करते हैं, वे फिर जन्म नही ग्रहण करेगे। वेदोक्त विधि से यज्ञ करने के निमित्त मेरे लिए इस आश्रम से बढकर अन्य कोई उचित स्थान नही है।

इसी स्थान में रहकर मैं अपना यज्ञ करूँगा, यह कहकर विश्वामित्र उस सुन्दर उपवन में पहुँचे और यज्ञ के उपकरण एकत्र करके, रमणीय रूप-विशिष्ट राम तथा लक्ष्मण को रक्षा के लिए नियुक्त करके, अपना यज्ञ करने लगे।

देवताओं को उद्दिष्ट करके विश्वामित्र ने छह दिनो तक ऐसा यज्ञ किया, जो दूसरो के लिए दुष्कर था भूमि की रक्षा करनेवाले दशरथ चक्रवर्ती के उन दोनो कुमारो ने उस यज्ञ की रक्षा इस प्रकार की, जैसे पलकें नेत्रों की रक्षा करती हैं।

यज्ञ की रक्षा करते हुए वृषभ-समान बली उन दोनों कुमारों में से ज्येष्ठ ने सर्वज्ञ


¹ भाव यह है कि भगवान के चरण संसार के लिए बहुत बड़ा होने पर भी भक्तों के सिर के सामने बहुत छोटा बन जाता है।

बालकाण्ड ५५

मुनिवर के निकट जाकर पूछा—'हे अवर्णनीय गुण-विभूषित मुने ! आपने जिन अत्याचारी राक्षसों के सम्बन्ध में कहा था, वे कब आयेंगे ?'

विश्वामित्र मौन व्रत धारण किये हुए थे, इसलिए कुछ उत्तर नहीं दिया। युद्ध-निपुण कुमार उन्हें प्रणाम करके यज्ञशाला से बाहर आये और आकाश की ओर देखा। वहाँ (आकाश में) राक्षस लोग वर्षाकाल के काले मेघों के समान गर्जन कर रहे थे, जिसे सुनकर वज्र भी डर जाय।

उन राक्षसों ने बाण चलाये, भाले फेंके, आग और पानी बरसाये, बड़े-बड़े पहाड़ उखाड़कर फेंके, निन्दा-वचन कहे, डराया, धमकाया; कुठार, परशु आदि आयुधों का प्रयोग किया; एक नहीं, ऐसे अनेक माया-कृत्य किये।

(राक्षसों द्वारा) क्रोध के साथ फेंके हुए आयुधों से, जिनमें (मारे गये) प्राणियों के मांस लगे हुए थे, प्रलय-काल की वर्षा के समान सारा वन-प्रदेश ढक गया। चारों ओर से राक्षस-सेना घिर आई और आकाश पर छा गई। (यह दृश्य ऐसा था) मानो मछलियों से भरे हुए लहराते समुद्र ने ही गगन को ढक लिया हो।

राक्षस-सेनाएँ, जिनमें बाण एवं चमकनेवाले खड्ग बहुत ही घने दिखाई दे रहे थे, मारू बाजा बजाती हुई संचरण कर रही थीं, मानो वे प्रलय-काल में उठी हुई तथा गर्जन करनेवाली अनुपम घटा ही हों।

राक्षसों के मुँह के दोनों ओर वराहदन्त निकले हुए थे, वे क्रोध से ओठ चबा रहे थे, उनके बाल रक्तवर्ण थे और नेत्रों से चिनगारियाँ निकल रही थीं। इस प्रकार के उन राक्षसों की ओर संकेत करके रामचन्द्र ने लक्ष्मण से कहा—'जटाधारी मुनि ने जिन राक्षसों के विषय में कहा था, वे ये ही हैं।

उन राक्षसों के आते ही क्रोध से अग्नि-ज्वाला बिखेरते हुए लक्ष्मण ने आँखों के कोरों से गगन की ओर देखा और फिर अपने धनुष की ओर देखा, फिर राम को प्रणाम करके कहा—'अभी इसी स्थान पर आप इन राक्षसों को टुकड़े-टुकड़े होकर गिरते हुए देखेंगे।

धूम्रवर्ण एवं शूलधारी राक्षस कहीं होमकुण्ड की अग्नि में मांस और रक्त न डाल दें, यह सोचकर कमललोचन (राम) ने अपने शरों से उस मुनि-श्रेष्ठ के निवास के ऊपर एक दूसरी छत-सी बना डाली।

क्षीरसागर के मथते समय उसमें से हलाहल विष निकलकर जब सृष्टि का विनाश करने लगा था, तब देवता लोग जिस प्रकार भयभीत हो चन्द्रचूड़ (शिव) की शरण में गये थे, उसी प्रकार महा तपस्वी मुनि भी वञ्चकराक्षसों से भयभीत हो रामचन्द्र से बोले—'हे अंजनवर्ण ! हम आपकी शरण में हैं, हमें अभय दान दीजिए।'

तब कमललोचन (राम) ने यह कहकर कि आपलोग व्याकुल मत होइए—उन्हें अपनी भुजाओं की छाया में ले लिया और अपने धनुष की दिव्य प्रत्यचा को अपने कान तक खींचकर मारे भूतल को (उन राक्षसों के) रक्त का समुद्र बनाया और उनके सिरों के पहाड़ बनाये।

५६ | कंब रामायण

लक्ष्मी के प्रियतम (श्रीराम) के दिव्य अस्त्रों ने भयंकर ताड़का से उत्पन्न दोनों वीरों में प्रथम मारीच को समुद्र में फेंक दिया और दूसरे सुबाहु को यमलोक में पहुँचा दिया।

पुष्पगुच्छों की मालाओं से सुशोभित (रामचन्द्र) ने जो बाण बरसाये, उन बाणों से क्षण-भर में मार्ग अन्तरिक्ष भर गया। (बचे हुए राक्षस) यह सोचकर कि ये दोनों राघववीर अब लाशों के पर्वत पर चढ़कर हमें (जीवित) पकड़ लेंगे, अहमहमिका से (आपस में चढ़ा-ऊपरी करते हुए) वहाँ से भाग चले।

वज्र के समान भयंकर राम के बाण भागते हुए राक्षसों का पीछा करते हुए चले, तब उन राक्षसों की शिरोहीन धड़ें तड़प-तड़पकर नाचने लगीं, भूत-पिशाच भी, जो शव-भक्षण करने आये थे, मेरे (लेखक के) प्रभु (रामचन्द्र) का यश गाने लगे, मांसभक्षी पक्षियों का एक चंदोवा-सा वहाँ तन गया।

(देवताओं से की गई) पुष्पवर्षा (उन पक्षियों के) चंदोवे को चीरती हुई नीचे बरस पड़ी, गगन में मेघों के समान दुंदुभि गरज उठी, इन्द्रादि देवता एकत्र हो गये और सुन्दर धनुर्धारी (रामचन्द्र) की जय-जयकार करने लगे।

पावन तपस्वियों ने आशीष-रूपी पुष्पों की वर्षा की तथा उस कानन के वृक्षों ने भी पुष्पों की वर्षा की। विश्वामित्र ने उसी समय अपना यज्ञ यथाविधि समाप्त किया और मुदित मन से (रामचन्द्र से) ये बातें कहीं—

सभी भुवनों का सर्जन करनेवाले तथा (प्रलय के समय) उन्हें अपने उदर में रख-कर उनकी रक्षा करनेवाले तुम्हीं हो। आज तुमने मेरे इस छोटे-से यज्ञ की रक्षा की। मैं यही मानता हूँ कि यह सब मेरे पुण्यों का फल है, नहीं तो इस छोटे-से यज्ञ की रक्षा तुम्हारे लिए कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं है।

(दूसरे दिन प्रातःकाल) पुष्पों से भरे उस वन में, अपूर्व तपस्याशील अनेक ऋषियों के साथ निवास करनेवाले, पर्वत-समान सद्गुणों से पूर्ण विश्वामित्र के सम्मुख कौसल्या-पुत्र उपस्थित हुए और प्रणाम करके पूछा—'आज मैं आपकी क्या सेवा करूँ? आज्ञा दीजिए।'

'हे पुत्र, यदि मैं किन्हीं कार्यों को दुःसाध्य समझकर तुम से करने के लिए कहता भी हूँ, तो वे तुम्हारे लिए दुःसाध्य नहीं होते। अभी (कुछ) बड़े कार्य करने बाकी हैं, जिन्हें बाद में किया जा सकता है। अभी हम विशाल और जल-सम्पन्न खेतों से घिरे हुए मिथिला नगर में जायेंगे और वहाँ जाकर महाराज जनक से किये जानेवाले यज्ञ का संदर्शन करेंगे। चलो।' विश्वामित्र के यह कहते ही तीनों चल पड़े। (१—५६)

अध्याय ९

अहल्या पटल

वे तीनो ( महर्षि विश्वामित्र एव राम-लक्ष्मण ) शोण ( सोन १ ) नदी-रूपी नारी के निकट जा पहुँचे । विविध रत्नो ( से सुशोभित ) तथा चंदन, अगरु आदि सुगंध-द्रव्यो से सुरभित सिकता-राशि ही उस शोण-रमणी के स्तन थे, सुकोमल लताएँ उसकी कटि थी, ( भ्रमर-कुल से ) गुंजरित नव विकसित पुष्प-पंक्तियाँ उसकी मेखला बनी थी उस स्थान मे फैली हुई काली मिट्टी उसके केशपाश थी ; निकटस्थ पर्वतो की परिक्रमा करती हुई उसकी जो नहरे बह रही थी, वे उसके नूपुर थे । इस प्रकार, वह नदी-नारी शोभायमान थी ।

ज्यो ही वे तीनो शोण नदी के तट पर पहुँचे, त्यो ही सूर्य भी अस्त हो गया, मानो वह अगले दिन प्रातःकाल उदित होते समय उन तीनो को शीतलता पहुँचाना चाहता हो और अपनी स्वाभाविक उष्णता को शात करने के लिए, अरुण ¹ के नयनो से भी तीव्र गति से जानेवाले अपने घोड़ो-सहित, पश्चिम सागर मे डूब गया हो ।

( पक्षियो के ) कलरव से भरे सरोबरो मे सुरभिमय दीर्घ नालवाले बड़े कमल-पुष्प खिले हैं, जो ( प्यासे भ्रमरो को तृप्त करने के कारण ) धर्म के आलय-स्वरूप हैं । वे कमल सूर्यास्त होते ही अपने दल-कपाटो को बंद कर लेते हैं, तो आश्रय की खोज में विलंब से आये हुए मस्त भ्रमर अपनी भ्रमरियो के साथ, उन पुष्पो से लौट जाते हैं ओर शोण नदी के तीरस्थ सुगंधित पुष्प-भरे उद्यानो में विश्राम पाते हैं । वे तीनो रात्रि में विश्राम करने के लिए उसी उद्यान में प्रविष्ट हुए ।

श्रीराघव ने विश्वामित्र से प्रश्न किया—यह कैसा उद्यान है ? तपस्वी एव कर्म-बंधन से विमुक्त ( विश्वामित्र ) महर्षि ने उत्तर दिया—पुरातन काल मे काश्यप महर्षि की पत्नी दिति ने अपने असुर-पुत्रो के शोक मे इसी स्थान में तप किया था ।

[ यहाँ से आगे २५ पद्यों में इस उद्यान का इतिहास वर्णित है । ]

कालमेघ की समता करनेवाले मेरे ( लेखक के ) स्वामी ( महाविष्णु ) इस अडगोल से परे परमपद स्थान मे रहते हैं । एक विद्याधर-स्त्री उस परमधाम मे पहुँच गई और पुडरीक के कोमल आवास मे रहनेवाली लक्ष्मी का स्तवन किया । लक्ष्मी देवी ने प्रसन्न होकर एक पुष्पहार उस विद्याधर-रमणी को दिया, जो पुष्पमधु से पूरित एव भ्रमरो से युक्त थे ।

उस विद्याधर-कन्या ने लक्ष्मी देवी के प्रसाद-भूत उस पुष्पहार को अपनी वीणा मे बाँध लिया और ब्रह्मलोक को लौट आई । इसी समय अतिक्रोधी दुर्वासा मुनि उसके सम्मुख आये । उन्होने उस कन्या को लक्ष्मी देवी की भक्ता जानकर उसके चरणो की वंदना की ।²


१. 'अरुण' सूर्य के सारथी का नाम है ।
२ दक्षिण मे वैष्णव अपने को भगवान तथा भगवान के भक्तो का भी दास मानते हैं । विद्याधरी विष्णु की भक्तिन होने के कारण दुर्वासा के लिए भी वंदनीय थी ।

५८कंब रामायण

उस विद्याधर-कन्या ने दुर्वासा महर्षि से कहा—हे महिमामय महर्षे ! इसे लोँ। यह पुष्पहार श्रीमहालक्ष्मी के मुकुट का भूषण था, जो (लक्ष्मी) सृष्टि तथा स्थिति के कारण-भूत, सारे विश्व को निगलने ओर उगलनेवाले, उस विष्णु भगवान् के विशाल वक्ष पर आसीन रहती ह। मैं तुमको प्रेम से इसे देती हूँ। यह कहकर उसने उस हार को दुर्वासा के हाथ में दे दिया।

दुर्वासा ने सोचा, सभी देवो की स्वामिनी लक्ष्मी देवी ने जो हार अपने मुकुट पर धारण किया था, उसे प्राप्त करने का सौभाग्य मुझे मिला है, न जाने पूर्वजन्म में मैने कौन-सा बड़ा तप किया था; दुर्वासा अत्यन्त आनन्दित होकर नर्त्तन करने लगे, अपने को कर्म-विमुक्त समझने लगे और अन्त मे देवलोक मे जा पहुँचे।

वहाँ इन्द्र अपने समस्त वैभव के साथ ऐरावत हाथी पर सवार होकर स्वर्ग-वीथि मे जा रहा था। उस दृश्य को देखकर दुर्वासा विस्मय तथा आनन्द से भर गये। (वह दृश्य कैसा था ?) मानो कोई रजत-पर्वत हो, जिस पर जलपूर्ण बादल छाये हो, सहस्रो विकसित कमलपुष्प भी फैले हों ओर जिनपर सूर्य की स्वर्णिम किरणो की आभा पड़ रही हो, ऐरावत का वैसा ही भव्य दृश्य था।

रंभा, मेनका, तिलोत्तमा, उर्वशी—ये अप्सराएँ इन्द्र के आगे-आगे नृत्य करती हुई जा रही थी, उनकी वाणी इतनी मधुर थी कि इक्षु-रस भी फीका पड़ गया था; उनके पल्लव-कोमल चरण मन्मथ के पुष्पबाणो से भरे तूणीर जैसे थे, उनके नूपुर मधुर नाद करते थे, तथा साथ-साथ संगीत भी हो रहा था।

इन्द्र के दोनो पाश्र्वों में चामर डुल रहे थे, वह दृश्य ऐसा था, मानो किसी बडे नीलम के पर्वत के दोनो ओर चंद्रकिरणो का पुंज संचरण कर रहा हो, उसके शिर पर भव्य श्वेत छत्र ऐसा शोभित था, जैसे पूर्णचंद्र अपनी ज्योत्स्ना फैलाता हुआ स्थिर खड़ा हो।

भेरी, ताल, शंख आदि वाजे ऐसा नाद उत्पन्न कर रहे थे, जिसमे मंगल-गीत भी डूब जाते थे। चतुर्वेदो का घोष समुद्र गर्जन के समान हो रहा था। इन्द्र का वह मनोहर वीथि-विहार (जुलूस)¹ ऐसा आ रहा था, मानो वह सारे विश्व को (आनन्द मे) डुबो देगा।

उपमा-रहित (दुर्वासा) मुनि इस वैभव को देख हर्षित हुए और विद्याधर-कन्या का दिया हुआ पुष्पहार इन्द्र को उपहार दिया। इन्द्र ने अपने हाथ में रखे अंकुश से उस हार को उठा लिया और उसे ऐरावत के सिर पर डाल दिया। ऐरावत ने अपनी सूँड़ से उसे खींचकर पैरो तले रौंद दिया।

यह देखते ही दुर्वासा मुनि की आँखो से कठोर क्रोधाग्नि की ज्वाला उमड़ पड़ी। सारे अंडगोल जलकर भस्म हो जायेंगे—ऐसी आशंका से भयभीत होकर देवता विखरकर भाग गये, सूर्य-चन्द्र भी अपनी गति रोककर स्थिर खडे हो गये, अष्ट दिशाओ में अँधेरा फैल गया, सारे लोक चक्कर काटने लगे।

उस दुर्वासा महर्षि की साँसो से धुआँ निकलने लगा; वे क्रोध से अट्टहास कर


¹ तमिल मे जुलूस के लिए 'पवनि' शब्द का प्रयोग होता है। यहाँ उसके लिए वीथि-विहार शब्द का प्रयोग किया गया है।—अनु०