कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 72, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५८ | कंब रामायण |
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उस विद्याधर-कन्या ने दुर्वासा महर्षि से कहा—हे महिमामय महर्षे ! इसे लोँ। यह पुष्पहार श्रीमहालक्ष्मी के मुकुट का भूषण था, जो (लक्ष्मी) सृष्टि तथा स्थिति के कारण-भूत, सारे विश्व को निगलने ओर उगलनेवाले, उस विष्णु भगवान् के विशाल वक्ष पर आसीन रहती ह। मैं तुमको प्रेम से इसे देती हूँ। यह कहकर उसने उस हार को दुर्वासा के हाथ में दे दिया।
दुर्वासा ने सोचा, सभी देवो की स्वामिनी लक्ष्मी देवी ने जो हार अपने मुकुट पर धारण किया था, उसे प्राप्त करने का सौभाग्य मुझे मिला है, न जाने पूर्वजन्म में मैने कौन-सा बड़ा तप किया था; दुर्वासा अत्यन्त आनन्दित होकर नर्त्तन करने लगे, अपने को कर्म-विमुक्त समझने लगे और अन्त मे देवलोक मे जा पहुँचे।
वहाँ इन्द्र अपने समस्त वैभव के साथ ऐरावत हाथी पर सवार होकर स्वर्ग-वीथि मे जा रहा था। उस दृश्य को देखकर दुर्वासा विस्मय तथा आनन्द से भर गये। (वह दृश्य कैसा था ?) मानो कोई रजत-पर्वत हो, जिस पर जलपूर्ण बादल छाये हो, सहस्रो विकसित कमलपुष्प भी फैले हों ओर जिनपर सूर्य की स्वर्णिम किरणो की आभा पड़ रही हो, ऐरावत का वैसा ही भव्य दृश्य था।
रंभा, मेनका, तिलोत्तमा, उर्वशी—ये अप्सराएँ इन्द्र के आगे-आगे नृत्य करती हुई जा रही थी, उनकी वाणी इतनी मधुर थी कि इक्षु-रस भी फीका पड़ गया था; उनके पल्लव-कोमल चरण मन्मथ के पुष्पबाणो से भरे तूणीर जैसे थे, उनके नूपुर मधुर नाद करते थे, तथा साथ-साथ संगीत भी हो रहा था।
इन्द्र के दोनो पाश्र्वों में चामर डुल रहे थे, वह दृश्य ऐसा था, मानो किसी बडे नीलम के पर्वत के दोनो ओर चंद्रकिरणो का पुंज संचरण कर रहा हो, उसके शिर पर भव्य श्वेत छत्र ऐसा शोभित था, जैसे पूर्णचंद्र अपनी ज्योत्स्ना फैलाता हुआ स्थिर खड़ा हो।
भेरी, ताल, शंख आदि वाजे ऐसा नाद उत्पन्न कर रहे थे, जिसमे मंगल-गीत भी डूब जाते थे। चतुर्वेदो का घोष समुद्र गर्जन के समान हो रहा था। इन्द्र का वह मनोहर वीथि-विहार (जुलूस)¹ ऐसा आ रहा था, मानो वह सारे विश्व को (आनन्द मे) डुबो देगा।
उपमा-रहित (दुर्वासा) मुनि इस वैभव को देख हर्षित हुए और विद्याधर-कन्या का दिया हुआ पुष्पहार इन्द्र को उपहार दिया। इन्द्र ने अपने हाथ में रखे अंकुश से उस हार को उठा लिया और उसे ऐरावत के सिर पर डाल दिया। ऐरावत ने अपनी सूँड़ से उसे खींचकर पैरो तले रौंद दिया।
यह देखते ही दुर्वासा मुनि की आँखो से कठोर क्रोधाग्नि की ज्वाला उमड़ पड़ी। सारे अंडगोल जलकर भस्म हो जायेंगे—ऐसी आशंका से भयभीत होकर देवता विखरकर भाग गये, सूर्य-चन्द्र भी अपनी गति रोककर स्थिर खडे हो गये, अष्ट दिशाओ में अँधेरा फैल गया, सारे लोक चक्कर काटने लगे।
उस दुर्वासा महर्षि की साँसो से धुआँ निकलने लगा; वे क्रोध से अट्टहास कर
¹ तमिल मे जुलूस के लिए 'पवनि' शब्द का प्रयोग होता है। यहाँ उसके लिए वीथि-विहार शब्द का प्रयोग किया गया है।—अनु०