कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ५८
उठे, जैसे त्रिपुर-दाह के समय शिवजी हँस रहे हो। उनकी भौहें उनके विशाल भाल पर चढ़ गईं; (उन्होंने अपनी) आँखों से ज्वाला उगलते हुए ऐसा गर्जन किया, जिससे स्वयं वज्र भी डर गया। उन्होंने कहा—हे पापिष्ठ शतमख ! सुन—
पञ्च महाभूतों के नायक, भूमि-वल्लभ एवं अनुपम छन्दों के प्रभु महाविष्णु के वक्ष पर आसीन आदिलक्ष्मी के द्वारा यह हार प्रेम के साथ धारण किया गया था और विद्याधर- कन्या ने उनसे इसे प्राप्त किया था। बड़ी तपस्या की महिमा के कारण मैने उनसे यह हार प्राप्त किया।
तेरे इस वैभव को देखकर मै आनन्दित हुआ और आदर के साथ वह हार तुझे प्रदान किया, किंतु तूने इसका अनादर किया, अतः तेरी सारी निधियाँ और अपार संपत्ति समुद्र में डूब जाये तथा तू महिमाहीन होकर दुःखी बन जा!—क्रोधी मुनि ने इस प्रकार इन्द्र को शाप दिया।
(दुर्वासा के शाप देते ही) रंभा आदि अप्सराएँ, कल्पवृक्ष, नौ निधियाँ, सुरभि पशु, श्वेत अश्व, पर्वताकार मत्तगज (ऐरावत) इत्यादि सभी संपत्तियाँ इन्द्र के पास से हट गईं और उर्मियों से आकुल समुद्र में जाकर छिप गईं।
क्रोधी दुर्वासा मुनि के शाप के कारण स्वर्ग आदि सभी लोकों को दरिद्रता पीडित करने लगी। तब सभी देवगण, अर्धनारीश्वर एवं चतुर्मुख को साथ लेकर श्रीविष्णु भगवान् के समीप पहुँचे, जिनका वक्ष रक्त-कमल पर आसीन महालक्ष्मी तथा श्रीवत्स के चिह्नों से अंकित है।
नवविकसित कमल से उत्पन्न ब्रह्मा तथा शिव प्रभृति अन्य देवों ने दुर्वासा के कठोर शाप की बात बतलाई और प्रार्थना की कि आपके अतिरिक्त अन्य कोई शरण नहीं है, अतएव आप हम सबकी रक्षा करे। तब सभी लोकों को नापनेवाले (उस त्रिविक्रम) ने प्रेम से कहा—'डरो नहीं।—
तुमलोग असुरों को अपने साथ मिलाकर, गर्जन करनेवाले सागर को मथो : मन्दर पर्वत को मथानी बनाओ, वासुकि सर्प को रस्सी बनाओ, शीतल चन्द्रमा को मथानी की टेक बनाओ और ओषधियों से भरकर इस सागर का मंथन करो और उसमें से अमृत को निकालो।
हम भी उस स्थान पर आयेंगे। तुमलोग शीघ्र ही अपना कार्य आरम्भ कर दो।' विष्णु के ये वचन सुनकर देवता उनकी प्रशंसा करने लगे और दरिद्रता से मुक्त होने की बात सोचकर आनन्द से नाचने लगे।
देवता मंदर पर्वत को उखाड़ लाये; उसमें वासुकि नाग को लपेटा; चंद्र को टेक बनाया, ओषधियों से (समुद्र को) भरा और क्षीरसागर को मथने लगे, तो उसमें उथल-पुथल मच गई। भूमि डोल उठी। भूमि के नीचे स्थित आदिशेष भी मरोड़ खाने लगा।
धर्म-रहित व्यक्तियों के मन जिन सद्गुणों को जान भी नहीं सकते ऐसे सद्गुणों से युक्त (विष्णु भगवान्) ने महान् कूर्म का रूप धारण किया. अपने सहस्रों बलिष्ठ अंगों को