कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 74, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें६० | कंब रामायण
फैलाकर दृढ़ खड़े रहे घूमनेवाला मंदर पर्वत उनकी पीठ पर था। इस प्रकार, उन्होंने दुर्वासा के शाप से नष्ट हुई सभी वस्तुओ को पुनः प्राप्त किया।
सभी खोई हुई वस्तुएँ प्रभु (विष्णु भगवान्) की कृपा से पुनः प्रकट हुई। उस समय सुर तथा असुर आपस मे कलह करने लगे। विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर असुरो का विनाश किया और सुरो ने अमृत का पान किया।
श्रीधर मूर्त्ति ने हलाहल विष एवं चंद्रकला वृषभ-वाहन (शकर) को दिया, पञ्चवृक्ष तथा अन्य उत्कृष्ट वस्तुएँ इन्द्र को प्रदान किया, शेष पुष्पक आदि सपत्तियों को अन्यान्य देवो को दिया और लक्ष्मी देवी तथा कौस्तुभमणि को अपने हृदय का हार बनाया।
उस समय, दिति अपने पुत्र असुरो के विनाश से अत्यन्त दुःखित हुई। उसने अपने पति कश्यप ऋषि के निकट पहुँचकर उन्हे प्रणाम किया तथा उनसे प्रार्थना की कि इन्द्रादि देवो के षड्यन्त्र से मेरे पुत्र मारे गये हैं, इसलिए एक ऐसा पुत्र प्रदान करो, जो उन देवों को मिटाने मे समर्थ हो।
कश्यप ने दिति की प्रार्थना सुनकर कहा—तुम्हे पुत्र का वरदान देता हूँ; तुम पृथ्वी पर जाकर एक सहस्र वर्ष तक कड़ी तपस्या करोगी, तो तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी। दिति तपस्या करने लगी।
इन्द्र ने दिति की तपस्या की बात सुनी। वह उसकी परिचर्या मे लग गया। एक बार तपस्या से श्रान्त होकर जब दिति लेटी हुई थी, तब सूक्ष्म रूप धारण करके इन्द्र उसके गर्भ मे प्रविष्ट हुआ और दिति के गर्भस्थ शिशु के सात खंड कर दिये। दिति जगकर रोने लगी, तब इन्द्र ने उन सातो खंडो को सप्त मरुत् बना दिया।
यही वह स्थान है, जो दिति की तपस्या से पवित्र हुआ है। यहाँ का शरवण (सरकंडो का वन) ही उमा ओर शकर के पुत्र सुब्रह्मण्य (कार्तिक) का उद्भव-स्थान हैं, जिन्हे आदिवायु एव गगा देवी भी भरण नही कर सकी थी। इस प्रकार, विश्वामित्र ने श्रीरामचन्द्र को कथा सुनाई।$^१$
फिर सूर्यदेव, यम के सदृश काल अधकार को हटाकर, ससार की रक्षा करते हुए, अपने रथ पर आरूढ होकर, सहस्रो किरणो के साथ नील सागर से उदित हुए, जैसे विष्णु की नाभि से ब्रह्मा को लिये हुए आदिकमल निकला हो।
सूर्योदय होते ही त्रिमूर्त्तियो के सदृश वे तीनो (विश्वामित्र, राम ओर लक्ष्मण) वहाँ से प्रस्थान कर चले ओर दोनो कूलों पर अपनी उमड़ती लहरों से टकराती हुई बहनेवाली सुदर गंगा नदी को देखा, जो रक्त नेत्र तथा वृषभ-वाहन शकर की 'कोष्णी' तथा 'कोण्ड्र' फूलो से अलकृत घने जटाजूट से निकलने के कारण, सुनहली धारा युक्त कावेरी$^२$ नदी के समान है।
राघव ने विश्वामित्र से कहा— पितृ-सदृश ऋषीश्वर ! इस महान् नदी की
$^१$ यह कथा विस्तार के साथ कालिदास-कृत कुमारसभव में वर्णित ह।
$^२$ कावेरी की धारा सुनहली होती है। गगा की धारा भी शिवजी का जटा के फूलो तथा रक्त नेत्रो का छाया पड़ने से सुनहली दीखती है।