कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 75, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ६१
महिमा बताइए। विश्वामित्र कहने लगे—मेरे पालक राजकुमार ! पुराने काल में तुम्हारे श्रेष्ठ सूर्यकुल मे सगर नामक चक्रवर्त्ती उत्पन्न हुए थे, जिन्होने अपनी बलिष्ठ भुजाओ मे अयोध्या नगरी मे रहते हुए सारी पृथ्वी पर शासन किया था।
उस विजयी चक्रवर्त्ती के दो पत्नियाँ थी। विदर्भ देश मे उत्पन्न पत्नी से 'असमंजस' नामक पुत्र हुआ, जिसका पुत्र 'अंशुमान्' था। उनकी दूसरी पत्नी, गरुड की भगिनी सुकुमारी 'सुमति' थी, जिसके धर्मपरायण साठ हजार बलवान् पुत्र हुए।
अत्यंत पराक्रमी सगर चक्रवर्त्ती अपने सभी पुत्रो की सहायता से अश्वमेध यज्ञ करने लगे। देवता लोग इससे असंतुष्ट हो उठे और देवेंद्र से यह समाचार निवेदित किया। इन्द्र ने जाकर यज्ञ के सुन्दर अश्व को पकड़ लिया और उसे ले जाकर पाताल में तपस्या करनेवाले कपिल महर्षि के पीछे छिपा दिया।
तीव्र गति से चलनेवाले उस यज्ञाश्व के पीछे-पीछे अंशुमान् जा रहा था। इन्द्र द्वारा उस अश्व का अपहरण होते ही वह आश्चर्य-चकित हुआ। इन्द्र के द्वारा अपहरण को नही जानने के कारण वह सर्वत्र भू लोक मे उसकी खोज करता रहा; किंतु असफल रहा। अंत मे अपने पितामह सगर के पास आकर सारा वृत्तांत कहा।
अंशुमान् से समाचार पाकर सगर ने अपने साठ हजार पुत्रो से यह समाचार कहा, तो वे वडवाग्नि के समान कोपाग्नि से जल उठे ओर समस्त पृथ्वी पर घोडे की खोज करके अन्त मे (पृथ्वी को) खोदते-खोदते पाताल में उतर पडे।
कहते हैं कि वे साठ सहस्र सगर-पुत्र उत्तर दिशा मे खोदने लगे और शतयोजन चौड़ा और शतयोजन गहरा गर्त्त खोद डाला। पाताल मे पहुँचकर उन्होने महातपस्वी कपिल के पीछे अपना यज्ञाश्व देखा। वे आग की तरह क्रोध से जल उठे और कपिल महर्षि को गाली देने लगे। वे इस प्रकार अहंकार से भरकर उन (महर्षि) के निकट जा पहुँचे।
(उनकी बाते सुनकर) उस मुनि ने अत्यन्त उमड़ते हुए क्रोध के साथ अग्नि-सदृश अपनी आँखें खोलकर उन्हे देखा। तब, परमशिव के मंदहास से जिस प्रकार तीनो पुर जलकर भस्म हो गये थे, उसी प्रकार वे साठ हजार राजकुमार जलकर भस्मावशेष हो गये। चरों ने यह समाचार सगर चक्रवर्त्ती को दिया।
सगर, पुत्र-शोक से अत्यन्त उद्विग्न हो उठे। उन्होने अपने शोक का अन्त न पाने पर भी अपने कर्त्तव्य का स्मरण करते हुए अपने पौत्र अंशुमान् को बुलाया और कहा—वे (पुत्र) तो मिट गये, अब क्या आरंभ किये हुए यज्ञ-कृत्य को रोकना उचित होगा? अंशुमान् अपने पितामह के यज्ञ की पूर्त्ति के निमित्त चल पड़ा और कपिल के निवास-स्थान पाताल में जा पहुँचा।
पाताल मे अपने मृत पितृव्यो (चाचाओ) की भस्मराशियो को देख वह उद्विग्न हो उठा। फिर, कपिल मुनि के चरण-कमलो पर नत होकर खड़ा रहा; तब मुनि ने अश्व को ले जाने की आज्ञा दे दी और अश्व किस प्रकार वहाँ आया था, इसका सारा वृत्तान्त भी कह सुनाया।