कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 76, कुल 549 में से
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कंब रामायण
सब के द्वारा प्रशंसित (रामचन्द्र) । उस निष्कलंक मुनिके वचन सुनकर अंशुमान् ने आदर के साथ उनकी वंदना की और अश्व लेकर लौट आया । सगर ने यज्ञ पूर्ण किया । कुछ समय उपरांत अंशुमान् को राज्य सौंपकर चक्रवर्त्ती दिवंगत हो गये ।
सगर-पुत्रों के द्वारा खोदे जाने से मकर-मत्स्यों से पूरित समुद्र ही 'सागर' कहलाया । अंशुमान् अप्रतिम पराक्रम के साथ भूमि का शासन करता रहा । उसके दीर्घवंश में भगीरथ नामक कुमार अवतरित हुआ ।
वे चक्रवर्त्ती भगीरथ समस्त धरती पर अपना एकमात्र शासन-चक्र चलाते रहे । एक बार उन्होंने वसिष्ठ से अपने पूर्वज सगर-कुमारों की मृत्यु का वृत्तान्त सुना । तब उन्होंने वसिष्ठ के चरणतल को सिर से लगाकर प्रणाम किया और निवेदन किया—
कपिल की कठोर कोपाग्नि में मेरे पूर्वज दग्ध हुए और दीर्घकाल से निरय (नरक) में पड़े हैं । मैं उनके उद्धार के लिए तपस्या करना चाहता हूँ । कृपया आप तपस्या का क्रम मुझे बतला दें । मुनिवर ने कहा—
हे भूमि-पालकों के प्रभु ! तुम ब्रह्मा को लक्ष्य करके अपने प्रपितामहो के उद्धार के निमित्त निरंतर कई दिनों तक अश्रान्त तपस्या करो ।
तब भगीरथ सारी पृथ्वी का भार अपने मंत्री सुमंत्र को सौंपकर हिमालय के अंक में जा पहुँचे । जब उन्होंने दस सहस्र वर्ष तक कठिन तपस्या की, तब आदिकमल से उद्भूत ब्रह्मा प्रकट हुए ।
ब्रह्मा ने भगीरथ से कहा—तुम्हारी इस बड़ी तपस्या से मैं संतुष्ट हुआ । महान् तपस्वी कपिल के क्रोध से तुम्हारे पूर्वपुरुष जल गये थे । यदि उनके भस्मावशेष आकाश-गंगा के प्रवाह से सिंचित हों, तो वे सद्गति को प्राप्त होंगे ।
विशाल गगन में बहनेवाली गंगा नदी यदि भूमि पर उतर आयगी, तो उसके वेग को त्रिनेत्र के अतिरिक्त और कोई वहन नही कर सकता, अतः शिवजी को लक्ष्य कर तुम तपस्या करो । यह कहकर विश्व के निर्माता ब्रह्मदेव अदृश्य हुए ।
फिर, भगीरथ ने शिवजी का ध्यान करते हुए पूर्वोक्त समय तक ही (दस सहस्र वर्ष) तप किया । अग्नि-समान कान्तियुक्त देव (शिवजी) वहाँ पहुँचे और यह कहकर अदृश्य हो गये कि हम तुम्हारी इच्छा पूर्ण करेंगे । उसके पश्चात् पाँच सहस्र वर्ष तक गंगा देवी को लक्ष्य कर भगीरथ ने तप किया ।
नदियों में श्रेष्ठतम (गंगा) नदी, तरुण नारी का रूप धारण कर भगीरथ के सम्मुख प्रकट हुई और उससे कहा—तुम किस प्रयोजन के निमित्त यह कठोर तप कर रहे हो ? उत्तुंग तरंग-भरित (गंगा) प्रवाह यदि स्वर्ग से भूमि पर उतर आयगा, तो उसका वेग कौन सह सकेगा ? शिव ने जो वचन कहा है, वह विनोद-मात्र है, उससे कुछ नही होगा । दुबारा तुम शिवजी की तपस्या करो और ठीक ढंग से यह जान लो कि शिव गंगा के वेग को सहने के लिए सन्नद्ध हैं या नहीं ।
गंगा के वचन सुनकर वह (भगीरथ) खिन्नमन हो गया और फिर जाकर दो सहस्र वर्ष तक स्वर्णमय जटावाले एवं अग्नि-ज्वाला-स्वरूप (शिवजी) को लक्ष्य करके तप किया ।