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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

बालकाण्ड ६३

तब भगवान् (शिवजी) उनके सम्मुख प्रत्यक्ष हुए और उनकी इच्छा के विषय में पूछा। भगीरथ ने निवेदन किया—मेरे प्रभु ! गंगा नदी ने कहा है कि उनके वेग को रोक लेने का आपका पूर्व वचन केवल विनोद-मात्र है, तो तथ्य क्या है, बतलाइए। यह सुनकर उन्होंने (शंकर ने) उत्तर दिया—डरो नहीं, मैं गंगा को इस प्रकार रोक लूँगा कि उसकी एक बूँद भी नहीं बिखरेगी। और फिर, वे (शिवजी) अदृश्य हो गये। तब उसने (भगीरथ ने) गंगा को लक्ष्य करके ढाई हजार वर्ष तक कड़ी तपस्या की।

उस राजा ने क्रमशः पत्ते, भस्म, जल, पवन, सूर्य-किरण—इनका आहार करते हुए और फिर इनका भी त्याग करके तीस सहस्र वर्ष तक महान् श्रद्धा के साथ तपस्या की।

(भगीरथ की तपस्या पूर्ण होते ही) श्रेष्ठ नदी आकाश से भू-लोक में आकर प्रकट हुई। वह इस प्रकार गर्जन करती हुई उतरी कि ब्रह्मदेव का सत्यलोक और इन्द्रादि देवों का स्वर्गलोक भी काँप उठे। पार्वती के पति (शिवजी) ने अपने विलक्षण जटाजूट में उसे पूर्णरूप से छिपा लिया।

घास की नोक पर पड़ी हुई ओस की बूँद के समान, भगवान् (शंकर) की जटा में उस श्रेष्ठ नदी को छिपे हुए देखकर वह (भगीरथ) अत्यन्त विभ्रम के साथ सिर झुकाये मौन खड़ा रहा। उन्होंने (शंकर ने) उसे धीरज बँधाते हुए कहा कि डरो नहीं, अब गंगा मेरी जटा के मध्य में है, और फिर उसके एक थोड़े-से अंश को बाहर निकलने दिया। गंगा का वह अंश भूमि पर उतर पड़ा।

आगे-आगे राजा चलने लगा और उसके पीछे-पीछे गंगा, मृत सगर-पुत्रों को सद्गति देने की उमंग में, बड़ी तेजी से वह चली, उसने मार्ग में तपोनिरत जह्नु महर्षि के यज्ञ का ध्वंस कर दिया। जह्नु ने क्रोधाविष्ट होकर गंगा-प्रवाह को चुल्लू में भरकर पी लिया।

उस दृश्य को देखकर वेदज्ञ मुनि विस्मित रह गये। उसने (भगीरथ ने) जह्नु को नमस्कार करके गंगा को लाने का सारा वृत्तांत कह सुनाया, तब जह्नु ने द्रवी-भूत होकर कान के मार्ग से गंगा को बाहर निकाल दिया, तब वह मृतक राजपुत्रों की भस्मराशि पर उछलती हुई वह चली।

'निरय' (नामक नरक) में पड़े हुए सगर-कुमार अनन्त मार्ग (स्वर्गलोक) में जा पहुँचे। इस दृश्य को देखकर आनन्दित स्वर्गवासियों (देवों) ने सुगन्धित पुष्पों की वर्षा की। नगाड़े बज उठे। तब, भगीरथ अयोध्यापुरी को लौट आया।

(विश्वामित्र ने रामचन्द्र से कहा)—हे नृपकुमार! इस अण्डगोल से परे विद्यमान, समस्त विश्व को एक ही पग में नापनेवाले (त्रिविक्रम) के कमल-चरण से निस्सृत होकर कमलभव (ब्रह्मा) के कमंडल से जो जल संचित हुआ था, वही भगीरथ की तपस्या से लाया जाकर गंगा नदी के रूप में भूतल पर आया है।

भगीरथ ने अपने पितरों की सद्गति के लिए अनेक सहस्र वर्षों तक तपस्या करके यह जल भूतल पर लाया; अतः यह नदी भागीरथी कहलाई और जह्नु महर्षि के कर्ण-मार्ग से बहने के कारण यह जाह्नवी कहलाई।