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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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कंब रामायण

सब के द्वारा प्रशंसित (रामचन्द्र) । उस निष्कलंक मुनिके वचन सुनकर अंशुमान् ने आदर के साथ उनकी वंदना की और अश्व लेकर लौट आया । सगर ने यज्ञ पूर्ण किया । कुछ समय उपरांत अंशुमान् को राज्य सौंपकर चक्रवर्त्ती दिवंगत हो गये ।

सगर-पुत्रों के द्वारा खोदे जाने से मकर-मत्स्यों से पूरित समुद्र ही 'सागर' कहलाया । अंशुमान् अप्रतिम पराक्रम के साथ भूमि का शासन करता रहा । उसके दीर्घवंश में भगीरथ नामक कुमार अवतरित हुआ ।

वे चक्रवर्त्ती भगीरथ समस्त धरती पर अपना एकमात्र शासन-चक्र चलाते रहे । एक बार उन्होंने वसिष्ठ से अपने पूर्वज सगर-कुमारों की मृत्यु का वृत्तान्त सुना । तब उन्होंने वसिष्ठ के चरणतल को सिर से लगाकर प्रणाम किया और निवेदन किया—

कपिल की कठोर कोपाग्नि में मेरे पूर्वज दग्ध हुए और दीर्घकाल से निरय (नरक) में पड़े हैं । मैं उनके उद्धार के लिए तपस्या करना चाहता हूँ । कृपया आप तपस्या का क्रम मुझे बतला दें । मुनिवर ने कहा—

हे भूमि-पालकों के प्रभु ! तुम ब्रह्मा को लक्ष्य करके अपने प्रपितामहो के उद्धार के निमित्त निरंतर कई दिनों तक अश्रान्त तपस्या करो ।

तब भगीरथ सारी पृथ्वी का भार अपने मंत्री सुमंत्र को सौंपकर हिमालय के अंक में जा पहुँचे । जब उन्होंने दस सहस्र वर्ष तक कठिन तपस्या की, तब आदिकमल से उद्भूत ब्रह्मा प्रकट हुए ।

ब्रह्मा ने भगीरथ से कहा—तुम्हारी इस बड़ी तपस्या से मैं संतुष्ट हुआ । महान् तपस्वी कपिल के क्रोध से तुम्हारे पूर्वपुरुष जल गये थे । यदि उनके भस्मावशेष आकाश-गंगा के प्रवाह से सिंचित हों, तो वे सद्गति को प्राप्त होंगे ।

विशाल गगन में बहनेवाली गंगा नदी यदि भूमि पर उतर आयगी, तो उसके वेग को त्रिनेत्र के अतिरिक्त और कोई वहन नही कर सकता, अतः शिवजी को लक्ष्य कर तुम तपस्या करो । यह कहकर विश्व के निर्माता ब्रह्मदेव अदृश्य हुए ।

फिर, भगीरथ ने शिवजी का ध्यान करते हुए पूर्वोक्त समय तक ही (दस सहस्र वर्ष) तप किया । अग्नि-समान कान्तियुक्त देव (शिवजी) वहाँ पहुँचे और यह कहकर अदृश्य हो गये कि हम तुम्हारी इच्छा पूर्ण करेंगे । उसके पश्चात् पाँच सहस्र वर्ष तक गंगा देवी को लक्ष्य कर भगीरथ ने तप किया ।

नदियों में श्रेष्ठतम (गंगा) नदी, तरुण नारी का रूप धारण कर भगीरथ के सम्मुख प्रकट हुई और उससे कहा—तुम किस प्रयोजन के निमित्त यह कठोर तप कर रहे हो ? उत्तुंग तरंग-भरित (गंगा) प्रवाह यदि स्वर्ग से भूमि पर उतर आयगा, तो उसका वेग कौन सह सकेगा ? शिव ने जो वचन कहा है, वह विनोद-मात्र है, उससे कुछ नही होगा । दुबारा तुम शिवजी की तपस्या करो और ठीक ढंग से यह जान लो कि शिव गंगा के वेग को सहने के लिए सन्नद्ध हैं या नहीं ।

गंगा के वचन सुनकर वह (भगीरथ) खिन्नमन हो गया और फिर जाकर दो सहस्र वर्ष तक स्वर्णमय जटावाले एवं अग्नि-ज्वाला-स्वरूप (शिवजी) को लक्ष्य करके तप किया ।

बालकाण्ड ६३

तब भगवान् (शिवजी) उनके सम्मुख प्रत्यक्ष हुए और उनकी इच्छा के विषय में पूछा। भगीरथ ने निवेदन किया—मेरे प्रभु ! गंगा नदी ने कहा है कि उनके वेग को रोक लेने का आपका पूर्व वचन केवल विनोद-मात्र है, तो तथ्य क्या है, बतलाइए। यह सुनकर उन्होंने (शंकर ने) उत्तर दिया—डरो नहीं, मैं गंगा को इस प्रकार रोक लूँगा कि उसकी एक बूँद भी नहीं बिखरेगी। और फिर, वे (शिवजी) अदृश्य हो गये। तब उसने (भगीरथ ने) गंगा को लक्ष्य करके ढाई हजार वर्ष तक कड़ी तपस्या की।

उस राजा ने क्रमशः पत्ते, भस्म, जल, पवन, सूर्य-किरण—इनका आहार करते हुए और फिर इनका भी त्याग करके तीस सहस्र वर्ष तक महान् श्रद्धा के साथ तपस्या की।

(भगीरथ की तपस्या पूर्ण होते ही) श्रेष्ठ नदी आकाश से भू-लोक में आकर प्रकट हुई। वह इस प्रकार गर्जन करती हुई उतरी कि ब्रह्मदेव का सत्यलोक और इन्द्रादि देवों का स्वर्गलोक भी काँप उठे। पार्वती के पति (शिवजी) ने अपने विलक्षण जटाजूट में उसे पूर्णरूप से छिपा लिया।

घास की नोक पर पड़ी हुई ओस की बूँद के समान, भगवान् (शंकर) की जटा में उस श्रेष्ठ नदी को छिपे हुए देखकर वह (भगीरथ) अत्यन्त विभ्रम के साथ सिर झुकाये मौन खड़ा रहा। उन्होंने (शंकर ने) उसे धीरज बँधाते हुए कहा कि डरो नहीं, अब गंगा मेरी जटा के मध्य में है, और फिर उसके एक थोड़े-से अंश को बाहर निकलने दिया। गंगा का वह अंश भूमि पर उतर पड़ा।

आगे-आगे राजा चलने लगा और उसके पीछे-पीछे गंगा, मृत सगर-पुत्रों को सद्गति देने की उमंग में, बड़ी तेजी से वह चली, उसने मार्ग में तपोनिरत जह्नु महर्षि के यज्ञ का ध्वंस कर दिया। जह्नु ने क्रोधाविष्ट होकर गंगा-प्रवाह को चुल्लू में भरकर पी लिया।

उस दृश्य को देखकर वेदज्ञ मुनि विस्मित रह गये। उसने (भगीरथ ने) जह्नु को नमस्कार करके गंगा को लाने का सारा वृत्तांत कह सुनाया, तब जह्नु ने द्रवी-भूत होकर कान के मार्ग से गंगा को बाहर निकाल दिया, तब वह मृतक राजपुत्रों की भस्मराशि पर उछलती हुई वह चली।

'निरय' (नामक नरक) में पड़े हुए सगर-कुमार अनन्त मार्ग (स्वर्गलोक) में जा पहुँचे। इस दृश्य को देखकर आनन्दित स्वर्गवासियों (देवों) ने सुगन्धित पुष्पों की वर्षा की। नगाड़े बज उठे। तब, भगीरथ अयोध्यापुरी को लौट आया।

(विश्वामित्र ने रामचन्द्र से कहा)—हे नृपकुमार! इस अण्डगोल से परे विद्यमान, समस्त विश्व को एक ही पग में नापनेवाले (त्रिविक्रम) के कमल-चरण से निस्सृत होकर कमलभव (ब्रह्मा) के कमंडल से जो जल संचित हुआ था, वही भगीरथ की तपस्या से लाया जाकर गंगा नदी के रूप में भूतल पर आया है।

भगीरथ ने अपने पितरों की सद्गति के लिए अनेक सहस्र वर्षों तक तपस्या करके यह जल भूतल पर लाया; अतः यह नदी भागीरथी कहलाई और जह्नु महर्षि के कर्ण-मार्ग से बहने के कारण यह जाह्नवी कहलाई।

८० कम्ब रामायण

(विश्वामित्र ने) गंगा की कहानी कह सुनाई तो वे (राम और लक्ष्मण) सुनकर आश्चर्य और आनन्द में डूब गये। फिर, वे गंगा को पार कर विशाला नामक नगर में पहुंचे, जहाँ के पर्वत-सदृश भुजावाले नरेश ने उनका आदर-सहित स्वागत किया और (विश्वामित्र के) चरणों की वन्दना की। तीनों कुछ समय उस स्थान पर ठहरे और (फिर) आगे बढ़ चले।

वे तीनों मिथिला देश में जा पहुंचे जहाँ खेतों में अमरस कमलपुष्प खिल रहे थे। (जहाँ) खेतों की निगरानी में लगी हुई कृषक-नारियों के भाले-सदृश सुन्दर नेत्रों की, चंचल नयनों की परछाईं पानी में पड़ती थी, जिसे देखकर सारस पक्षी भ्रान्ति से उन्हें 'चपल' मीन समझ लेते थे और उन परछाइयों पर अपनी चोंच मारने लगते थे किन्तु मीन न पाकर लज्जित हो जाते थे।

[ नीचे विदेह देश के उद्यानों का वर्णन है। ]

(विदेह देश के) उद्यान कैसे हैं ? बाँध-बाँध अगरुवृक्षों के जलमार्गो से होकर जल बहता है, तो मृदंग-नाद होता है; अग्नि-सदृश अपने नवीन पुष्पों के रूप में उज्ज्वल दीप लिये खड़े हैं; ताड़ के सदृश मधु धारा बहानेवाले पुष्प-भरी लता में भ्रमर संगीत गाते हैं तथा मयूर अपने पंख फैलाकर नाचते हैं।

उद्यानों के खेतों में पदम-पुष्प के मध्य नीलकमल को देखकर कृषक भ्रांति से ... का मुख तथा नयन समझ लेते हैं और (उनसे) आकृष्ट हो उनके समीप जा ... किंतु पदम मणियों के बदले केवल पुष्प का आभास सीख उठते हैं और उन पुष्पों को उखाड़कर फेंक देते हैं। ऐसे उगाये गये पुष्प वहाँ बहुत-से पड़े हुए हैं।

उस प्रदेश की रूपवती स्त्रियाँ सरसोपमा जब मंदगति से चलती हैं, तब प्रवाल के समान उनके पाँवों में बजने वाले नूपुरों की ध्वनि को सुनकर उनके पीछे बक पड़ते हैं, वे समझती हैं कि पक्षी हमारा उपहास करते हैं, तब उनके मुखों का कुंकुम ढिग जल में मिल जाता है और जल-क्रीड़ा में उनके स्तनों के चन्दन का लेप पिघलकर बहकर छितरकर सुगन्धित करता है; तथा उस पानी में उतरने के पश्चात् स्त्रियाँ नीलकमल के समान नेत्रों तथा कमल के समान मुखों को सम्भालती हैं। वे तथा चंचल भँवरें उस समय एक-सी लगती हैं। जल में खिले हुए कमल के बिम्बों में बाल हैं, जिसे देखकर भँवरे उन मुखों को वास्तविक कमल नहीं मानते।

...

बालकाण्ड - ६५

उनके नृत्यों के साथ संगीत तथा मृदंग-ताल की ध्वनियाँ होती रहती है, जिन (शब्दों) से भड़ककर भैंसें भागकर नदियों में जा गिरती हैं, जिनके कारण (पानी में) उथल-पुथल उत्पन्न हो जाती है, जिससे मीन उछल-उछलकर तट पर के नारियल, गुवाक (सुपाड़ी) आदि वृक्षों के पत्तों पर जा गिरते हैं।

वहाँ के सरोवरों में कोमलांगी सुन्दरियाँ (जब) भाले-सदृश अपनी आँखें मीच-कर और जलमग्न होकर ऊपर उठती हैं, तब वे क्षीर-सागर के मथने के समय जल से ऊपर उठती हुई लक्ष्मी देवी का दृश्य उपस्थित करती हैं। उनके करों के श्वेत कंगन वहाँ के जल-पक्षियों के साथ बोल उठते हैं। उन सरोवरों में भ्रमर सुगंधित पुष्प की कलियों को भेदकर भीतर पहुँचते हैं तथा मधुपान करके मत्त रहते हैं।

इस प्रकार के मिथिला देश में वे तीनो जा पहुँचे और प्राचीरों से आवृत, ऊँची ध्वजाओं से अलंकृत उस मिथिला नगर के बाहर आकर ठहरे। वहाँ एक उजड़े हुए स्थान में उन्होंने एक ऊँचा प्रस्तर पड़ा देखा, जो गृहस्थ-धर्म से च्युत होकर अभिशप्त हो पड़ी रहनेवाली गौतम-पत्नी अहल्या का ही रूप था।

उस प्रस्तर पर काकुत्स्थ (श्रीरामचन्द्र) की चरण-धूलि जा लगी, तुरन्त ही वह (अहल्या देवी) प्रस्तर-रूप छोड़कर अपना पूर्व स्वरूप धारण करके उठ खड़ी हुईं, जैसे कोई नर, अविद्या-मोह को मिटानेवाला तत्त्वज्ञान पाने पर मायावृत रूप छोड़ दे और यथार्थ आत्म-स्वरूप को पहचान ले और भगवान् के चरणों को प्राप्त हो जाय। महामुनि (विश्वामित्र) कहने लगे—

गगन से भूतल पर गंगा को ले आनेवाले भगीरथ के वंश में उत्पन्न (रामचन्द्र) ! यह विद्युत्-समान नारी, जो अत्यन्त आनन्द के साथ एक ओर खड़ी है, उस गौतम मुनि की पत्नी अहल्या है, जिस (मुनि) ने पापकर्म करनेवाले देवेन्द्र को सहस्र रक्त-वर्ण नेत्र दिये थे।

सुनहली जटावाले (विश्वामित्र) का कथन सुनकर, पंकज पर विद्युत्-द्युति के साथ आसीन लक्ष्मी के वल्लभ (रामचन्द्र) ने आश्चर्य से कहा—इस संसार की भी कैसी प्रकृति है ? इस प्रकार की घटनाएँ क्यों होती हैं ? क्या ये पूर्वजन्मों के कर्मों का परिणाम हैं अथवा उन कर्मों के अतिरिक्त कोई और भी कारण है ? संसार की माता-सदृश अहल्या की ऐसी दशा क्यों हुई ?

रामचन्द्र की बात सुनकर ज्ञानी (विश्वामित्र) ने कहा—शुभाश्रय ! सुनो, पुराने समय में वज्रधारी इन्द्र कभी दुर्गुण-रहित संयमी गौतम महर्षि की मृग के समान नयनोंवाली पत्नी अहल्या के सौंदर्य पर मुग्ध हुआ और उसके स्तनों का स्पर्श प्राप्त करना चाहा।

अहल्या के नयन-रूपी भाले तथा मन्मथ के बाण इन्द्र को पीड़ित करने लगे। उसने सोचा, किसी भी उपाय से अहल्या की संगति प्राप्त करनी चाहिए ; एक दिन उसने कामांध होकर गौतम मुनि से अहल्या को पृथक् किया और सत्य-स्वरूप गौतम का वेष धारण कर उसके पास जा पहुँचा।

६६ | कंब रामायण

वह अहल्या की संगति में सुगंधित नवमधु का महान् आनन्द पा रहा था, उसी समय अहल्या को अनुभव हुआ कि यह इन्द्र है, तो भी उसने उसे अनुचित कृत्य मानकर दूर नहीं किया उसी समय त्रिनेत्र (शिवजी) के समान सर्व-शक्तिमान् गौतम मुनि भी शीघ्र वहाँ लौट आये।

गौतम धनुर्वाण नहीं चला सकते थे, किन्तु प्रतिकार-रहित शाप देने में अत्यन्त समर्थ थे। उनको देखकर अमिट अपयश पाई हुई (अहल्या) भयभीत हो खड़ी रही, इन्द्र काँपता हुआ बिल्ली के जैसे वहाँ से धीरे-धीरे खिसकने लगा।

सदा तटस्थ दशा में रहनेवाले परिशुद्ध गौतम महर्षि ने अग्नि उगलती हुई आँखों से देखा वे सारी घटनाएँ समझ गये और तुम्हारे (राम के) वाणों के समान तीक्ष्ण वचन (इन्द्र के प्रति) कहे—'तुम्हारे शरीर में एक हजार नारियों के चिह्न-रूप अवयव उत्पन्न हों।' क्षण-मात्र में इन्द्र का शरीर उन अवयवों से भर गया।

इन्द्र सभी का उपहास-पात्र हो गया। अमिट अपयश लेकर वह लज्जित हुआ और वहाँ से चला गया। तब गौतम ने सुकुमारी अहल्या को देखकर कहा–'वारनारी के सदृश आचरण करनेवाली तुम पत्थर बन जाओ।' अहल्या पत्थर बनकर गिरने लगी।

(उस समय) उसने गौतम से प्रार्थना की कि हे अग्निमय रुद्र-समान मुनिवर! (छोटों के) अपराधों को क्षमा करना महान् व्यक्तियों का स्वभाव होता है। अतः, मुझे क्षमा करो और मेरे शाप का अंत कब होगा, बताओ।

तब गौतम ने कहा—भ्रमरों से घिरे पुष्पहार धारण करनेवाले दशरथ-पुत्र (श्रीरामचन्द्र) जब इस स्थान पर आयेंगे तब उनकी पद-रज का स्पर्श होते ही तुम्हारा उद्धार होगा।

शाप से विकृतांग इन्द्र को देखकर सभी देवता ब्रह्मा को अपने साथ लेकर गौतम मुनि के पास आये और उनसे प्रार्थना करने लगे। देवताओं की प्रार्थना सुनकर तपस्वी गौतम शांत हुए और इन्द्र के शरीर पर के सहस्र स्त्री-चिह्नों को सहस्र नयन बना दिये। अहल्या प्रस्तर के रूप में पड़ी रही।

हे मेघ-समान कांतियुक्त (रामचन्द्र)! प्राचीन काल में ऐसी घटना घटी थी। अब जब तुम भूतल पर अवतीर्ण हो गये हो इसलिए आगे सभी प्राणियों का उद्धार होगा, फिर क्या उनकी दुर्गति कभी संभव हो सकती है? कदापि नहीं।' यहाँ अंजन पर्वत की जैसी कान्ति से युक्त, जो युद्ध किया उसमें तुम्हारा हस्त-कौशल कैसा था, उस बाण चलाने वालों का श्रेष्ठ शिरोमणि है।

बालकाण्ड ६७

करुणा उत्पन्न हो। बीच में आये कष्टों को स्मरण करके दुःखी मत होओ। अब तुम अपने पति के आश्रम में जाओ। यों कहकर अहल्या के चरणों की वन्दना की।

आगे चलकर वे सब गौतम मुनि के आश्रम में जा पहुँचे; गौतम उन अतिथियों के आगमन से अत्यन्त हर्षित हुए और आगे बढ़कर आदर के साथ उनका स्वागत किया और सब प्रकार से उनका सत्कार किया। तब गाधिपुत्र ने उन तपस्वियों से कहा --

अंजनवर्ण (रामचन्द्र) की चरण-धूलि लगी नहीं कि अहल्या अपने पूर्व स्वरूप में खड़ी हो गईं; उसने अपने मन से कोई पाप नहीं किया था, अतः अब तुम उसे स्वीकार करो। गाधिपुत्र के ऐसा कहने पर ब्रह्मदेव के समान उन (गौतम) ने अहल्या को स्वीकार कर लिया।

सकल सद्गुणों से पूरित (रामचन्द्र) ने गौतम की परिक्रमा करके उनके चरण-कमलों को प्रणाम किया और अहल्या को उन्हें सौंप दिया। फिर, तपस्वी (विश्वामित्र) के साथ मिथिला नगरी के निकट जा पहुँचे और उसके मणिमय प्राचीर को देखा। (१--८६)


अध्याय १०

मिथिला-दर्शन पटल

प्रहरियों से सुरक्षित वह मिथिला नगरी अपनी ऊँची और मनोहर ध्वजा-रूपी हाथों को ऊँचा उठाये हुए है, मानो उस कमल-नयन (रामचन्द्र) को यह कहकर आह्वान कर रही हो कि 'सुनहली आभावाली लक्ष्मी मेरी तपस्या के प्रभाव से अपना निवास कमल-पुष्प को छोड़कर यहाँ अवतीर्ण हुई हैं, अतः आप शीघ्र आइए।'

उन्होंने देखा कि उस नगर के ऊँचे-ऊँचे प्रासादों पर सुंदर ध्वजाओं की पंक्तियाँ नृत्य कर रही हैं, वे ऐसी लगती हैं, मानो धर्मरूपी दूत से संदेश पाकर, अनुपम सुन्दरी जानकी का पाणिग्रहण करने के लिए योग्य वर (रामचन्द्र) को आते हुए देखकर, गगन-तल में अप्सराएँ आनन्द से नाच रही हों।

उस नगर में कहीं दो मत्त गज आपस में टकरा रहे हैं, जो दो पहाड़ों के जैसे दीखते हैं, जिनके बड़े-बड़े श्वेत दंत वज्र के समान हैं और जिनकी आँखों से कोपाग्नि निकल रही है, मानों प्रेमी दंपति मन्मथ के बाणों से विद्ध होकर (एक दूसरे से) मिलने चले हों और इतने में प्रणय-कलह में लग गये हों।

उन्होंने देखा कि जब सूर्य अस्तंगत होने लगता है, तब वहाँ का आकाश क्षीर-सागर के जैसा दीख पड़ता है, ऊँचे प्रासादों पर उड़नेवाली ध्वजाएँ मेघों का स्पर्श करती हुई गीली होती रहती हैं और साथ-साथ मेघों के समान ही फैले हुए अगरु धूम के स्पर्श से सूखती भी रहती हैं।

मन्मथ सीता देवी का चित्र खींचना चाहता है और अमृत में अपनी लेखनी

६८ कम्ब रामायण

डुबोता है, लेकिन वह बेचारा सीताजी के अवयवों के सौंदर्य को अंकित करने में सर्वथा असमर्थ हो हारकर रह जाता है; ऐसी अनुपम सुंदरी को अपने अंक में पाकर मिथिला नगरी अपने स्वर्णमय प्राचीरों के साथ ऐसी शोभायमान है, जैसे लक्ष्मी का निवासभूत कमल-पुष्प ही हो। ऐसी उस नगरी में वे तीनों प्रविष्ट हुए।

वे तीनों मिथिला की विशाल वीथियों से होकर जाने लगे, जहाँ चन्द्रोपम ललाट-वाली नारियों एवं पुरुषों के रत्नमय आभरण बिखरे पड़े रहते थे (समागम-काल में वे उन आभरणों को बाधाजनक पाकर उतारकर फेंक देते हैं), वे वीथियाँ देखने में ऐसी लगती थी, जैसे तमिल-भाषा के पिता (अगस्त्य) मुनिवर के पी जाने पर रत्नमय समुद्र का तल हो; या रात्रि के समय घने नक्षत्रों से जड़ा हुआ आकाश हो।

वे लोग वहाँ की वीथियों में जाने लगे, जहाँ लोहे के अंकुशों को भी तोड़ देने-वाले पर्वत-सदृश मत्तगज मद जल बहाते थे, जब उस मद-जल की धारा बह चलती थी, तब लगाम में रहनेवाले घोड़ों के मुँह से जो झाग गिरता था, उसके मिलने से उस धारा का रूप बदल जाता था। फिर, रथों के निरंतर दौड़ने से कीचड़ बनता था और अनन्तर (उनके सूखने के बाद) धूल फैल जाती थी। यों उन वीथियों की आकृति क्षण-क्षण में परिवर्तित होती रहती थी।

वे तीनों मिथिला की उन विशाल वीथियों में जाने लगे, जहाँ रति की वेला में मधुरभाषी रमणियों ने अपने पुष्प-हार फेंक दिये थे, जिन से मधु-धारा बह रही थी और जिनपर भ्रमर मँडरा रहे थे। वे मुरझाई हुई पुष्पमालाएँ उन कोमलांगी नारियों की जैसी ही लगती थीं, जो निरंतर तुल्यानुराग-भरे अपने प्रेमियों के साथ काम-समर कर चुकने पर अत्यंत श्रांत हो पड़ी रहती हैं।

उन्होंने मिथिला नगर की स्वर्णमय नृत्यशालाएँ देखीं, जिनमें 'याक्'१ (वीणा के जैसा एक तंत्री वाद्य) के घृत-मधुर तारों के नाद, मधुर कंठ से गाये हुए गीत, उँगली से छेड़े जानेवाली 'मकरवीणा' की ध्वनि — ये सब एक दूसरे में एकश्रुति होकर गुंजित होते थे और जहाँ अस्ति और नास्ति का संदेह उत्पन्न करनेवाली सूक्ष्म-कटि रमणियाँ नृत्य करती थीं, जिनके हाथों के मार्ग पर उनके नयन चलते तथा उनके नयनों के मार्ग पर उनके मन (के भाव) चलते थे।

उन्होंने देखा — मरकत-सदृश गुवाक (सुपारी) के वृक्षों में शुद्ध प्रवाल जैसे फल लगे हैं, उन वृक्षों में झूले लगे हैं, उन में सुन्दर नारियाँ झूल रही हैं, झूले बार-बार इधर से उधर और उधर से इधर आते जाते रहते हैं और यह स्मरण दिलाते हैं कि पापी जन भी इसी प्रकार पुन:-पुन: इस संसार में आते-जाते रहते हैं। उन रमणियों के पुष्पहारों पर से उड़े हुए भ्रमर गुंजार भरते हैं, मानो उनकी लचकती हुई सूक्ष्म कटियों पर दया उत्पन्न होने से वे चिल्ला उठे हों।


१ प्राचीन तमिल-साहित्य में चार प्रकार के याक्-वाद्य प्रसिद्ध हैं। उनके नाम हैं— (१) पेरियाक् (२) कमऱ्याक , (३) गोडयाक , (४) शगोडयाक , जिनमें क्रमश २१, १६, १४ और ७ तन्त्रियाँ होती थीं।—अनु०

बालकाण्ड ६१

उन तीनो ने मिथिला नगर की पण्यवीथि (बाजार) देखी, जहाँ दोनो ओर अपार रत्न, स्वर्ण, मोती, कवरी मृग के केश, अरण्य मे उत्पन्न अगुरु की लकड़ी, मयूर-पंख, हाथी के दाँत—इनके अवार लगे थे। वह हाट ऐसी लगती थी, जैसे कावेरी नदी हो, जिसके दोनों तटो पर कूपको ने मोती, अगुरु आदि एकत्र कर उनकी राशियाँ बना दी हो ।

उस नगर में रमणियाँ नुकीले और छोटे नाखूनवाले अपने कोमल कर-पल्लवों को दुखाती हुई वीणा की खूँटियो को घुमाती थी और प्रवहमाण मधु-धारा सदृश तन्त्रियो को कसती थी , वे अपने हाथ की उँगलियो के साथ मन को भी संलग्न करके. उज्ज्वल मदहास विखेरती हुई विस्पष्ट स्वर-युक्त संगीत-रूपी स्वच्छ मधु को पान कराती थी , उस संगीत का पान करते हुए वे तीनो आनंद से आगे बढ़ चले ।

कही उन्होने अतिवेग से दौड़ने हुए घोड़ो की पंक्ति देखी, जो कुम्हार के द्वारा घुमाये गये चाक के समान वर्त्तुल आकार में दौड़ रही थी। (वह पंक्ति) महा-पुरुषो की मित्रता के ही समान अटूट गतिवाली थी तथा ज्ञानियो की बुद्धि के सदृश एकाग्र थी । वे घोड़े ऐसे दौड़ते थे कि उनका आकार स्पष्ट नही दिखाई पड़ता था।

उन्होने ऊँचे प्रासादों के झरोखो में अनेक उदीयमान पूर्णचंद्र देखे, जो पने भाले-मन्मथ का धनुष, भ्रमर-कुल से संकुल नील केशों का जूड़ा—इनसे शोभायमान थे तथा दीर्घकाल का कलंक भी जिनसे मिट गया था।

उन्होने अनेक मनोहर कमल भी देखे, जो स्फटिक-चषको में भरे नवसुरभित मद्य का पान करके हास प्रकट करते हुए मस्ती से अर्थहीन वचन वकते थे और अपने प्रियतमो के प्रति मान करने जाकर हँस पडते थे।

[ उपर्युक्त दोनों पद्यों मे वारनारियो का वर्णन है । ]

वारनारियाँ गेंद खेल रही थी। शारीरिक सुख के साथ ही धन भी प्राप्त करने-वाली, सर्पफन-तुल्य जघनवाली वेश्याओ के मन के जैसे ही स्फटिकवर्णवाले, कंदुक भी अपना स्वाभाविक रंग छिपाते थे । वे ( कंदुक ) उनकी कज्जलांकित आँखों की छाया पड़ने से काले तथा उनकी लाल हथेलियो की छाया से लाल होते रहते थे ।

उन्होंने कई द्यूतशालाएँ भी देखी, जहाँ भाले-जैसी नुकीली आँखोवाली सुन्दर वेश्याएँ चौसर खेलती थी। वे अपने हाथ के कगन, कर्णाभरण, रत्नहार, कलिंगदेश की वनी अमूल्य चादर, मकरवीणा आदि को भी दाँव पर रख देती थी। (खेलते-खेलते थक जाने से) उनके पुष्पांलंकृत केशपाश शिथिल हो जाते थे और स्फटिक के बने कुत्ते के आकार की मुहरें उनकी हथेली की छाया से लाल दिखाई देती थी।

उस नगर में कई वावलियाँ भी थी, जिनमे अनुपम अंगोवाली सुन्दरियाँ आनंद से स्नान करती थी। उस समय वहाँ के कमल, नीलकमल, रक्तकुमुद, जल पर फैली हुई 'वल्लै' लता के पत्ते, नीलोत्पल, लाल-लाल 'किडै' (नामक पौधे), तरंगे, मीन आदि जलचरी वस्तुएँ (उनके अंगो की सुन्दरता देख) लज्जित हो, दुःख अनुभव करती थी।

कही तरुण पुरुष खड्ग चलाने का अभ्यास करते थे। उनकी भुजाओ पर चंदन-

७० कम्ब रामायण

लेप तथा पीनस्तनी नारियों के आलिंगन से उत्पन्न चिह्न अंकित थे। उनका खड्ग-प्रयोग यह स्मरण दिलाता था कि मनुष्य का मन भी विषयभागी इंद्रियों के द्वारा आकृष्ट होकर मोह-ग्रस्त हो इसी प्रकार भटकता रहता है।

उन्होंने यत्र-तत्र युवक-समूह भी देखे, जिनका शरीर सूर्य के समान उज्ज्वल था, जिनका मन इतना उदार था कि वे माँगने पर कोई भी अभीष्ट वस्तु दे देते थे, जिनके लाल करों में धनुष थे और जिनके केश, अपनी मानिनी प्रेयसियों के चरणों पर झुकने से महावर लगकर लाल हो गये थे। उन्हें देखने से ऐसा लगता था, मानो स्वयं मन्मथ शिवजी के नेत्र से बचकर भूतल पर आ गया हो।

उन्होंने मिथिला नगर की फुलवारियों को देखा और वहाँ पुष्प-चयन करती हुई मयूर की समानता करनेवाली तरुणियों को भी देखा। वे तरुणियाँ तोतों से चाशनी जैसी मीठी बोली में संभाषण कर रही थीं। उनके सौंदर्य से अप्सराएँ भी लजा जाती थीं। उनकी गति की कमनीयता से हंस भी परास्त हो जाते थे और भ्रमर उन तरुणियों की विजय पर हर्षनाद कर उठते थे।

उन्होंने चतुरंगिनी सेना-विशिष्ट जनक महाराज के स्वर्णमय प्रासाद के चारों ओर एक विशाल खाई देखी, जिसमें देवों के निवास-योग्य उन्नत अट्टालिकाओं की परछाईं पड़ती रहती थी और जहाँ देवनगर अमरावती की सुन्दरता उत्पन्न हो रही थी। तरंगायमान वह खाई उमड़ती हुई गंगा नदी के समान गंभीर थी।

वे तीनों राजप्रासाद में कन्यागृह की अट्टालिका के अग्रभाग को देखकर वहीं खड़े हो गये, उस अट्टालिका में हंस और हंसिनियाँ इस प्रकार परस्पर मिलकर विचर रहे थे, जैसे स्वर्ण और उसकी आभा, पुष्प और उसकी सुवास, भ्रमरों का भोज्य मधु और उसकी मिष्टता तथा सुगुम्फित कवि-वचन तथा उसकी रसमयता।

अब हम सीताजी का वर्णन करना चाहते हैं, किन्तु कैसे करें ? कमलासन ब्रह्मदेव से लेकर सभी (व्यक्ति), किसी नारी का उपमान देते समय लक्ष्मी का उल्लेख करते हैं : वही लक्ष्मी स्वयं सीता का रूप लेकर अवतीर्ण हुई हैं, तो उनका उपमान कहाँ से और कैसे ढूँढा जाय ?

पार्वती प्रभृति देवियाँ भी सिर पर कर जोड़कर, सकल सद्गुण-संपन्न सीता को प्रणाम करती हैं। वैसी सीता को जो भी देखते हैं, वे कभी उस सुन्दरता का पार नहीं पाते हैं, मानव समझते हैं, हाय ! हम देवताओं के समान निर्निमेष दृष्टि से नहीं देख सकते, और, देवता लोग समझते हैं कि हम अपनी इन दो आँखों से सीता के सौंदर्य को कैसे देख सकते हैं (अर्थात्, इसके लिए दो आँखें पर्याप्त नहीं हैं) ?

सीताजी के वे चंचल नयन हरिण को भी अपने सौंदर्य-गुण से मात करते हैं। विजयशील भाला और तलवार भी उन नयनों की छटा से परास्त हो जाते हैं, अन्य नारियों के नयनों के उपमान-भूत 'कयल' मीन भी उनसे डरते हैं। उस समय (रामचन्द्र के लिए) सीताजी, मंदर पर्वत के मथने से कल्लोलित समुद्र से उत्पन्न अमृत नहीं, परन्तु उस कन्यागृह के उस प्रासाद से उत्पन्न अमृत थीं।

बालकाण्ड ७१

यदि ब्रह्मदेव से प्रार्थना की जाय कि रथ-सदृश पीनजघनवाली ऐसी ही एक अन्य तरुणी की सृष्टि कीजिए, तो वह चतुर्मुख भी वैसी सृष्टि नहीं कर सकेगा। अमृतभोजी देवगण ही क्यो न प्रार्थना करे, सागर अमृत नामक दिव्य औषध भले ही दुबारा दे दे; किन्तु ऐसी मनोहर रूपवती लक्ष्मी को कहाँ से लायगा ?

कान्तिपूर्ण भाले के फल के जैसे नयनोंवाली मेनका आदि अप्सराएँ, जिनपर स्वर्ग के शासक इन्द्र तथा अन्य देवता भी मुग्ध होते रहते हैं, इन सीताजी के शरीर-सौन्दर्य को देखकर मन मसोसकर रह जाती हैं। अब उन अप्सराओं के मुख-चन्द्र के लिए सर्वदा दिन ही रहता है (अर्थात्, दिन में चन्द्रमा जिस तरह कान्तिहीन दीखता है, उसी प्रकार सीता की छवि के सामने वे कान्तिहीन हो गई हैं)।

कमल-पुष्प पर निवास करनेवाली यह देवी इस धरती पर उतर आई हैं। इनके लिए किन्होंने बड़ी तपस्या की थी ? क्या वह असंख्य ब्राह्मण थे, या स्वयं धर्मदेवता थे, या सारा संसार था, या स्वर्ग था, अथवा सभी देवता ही थे, जिन्होंने ऐसी तपस्या की थी ? हम कह नहीं सकते कि यह किनकी तपस्या का फल है।

अनुपम रूपवती नारियाँ सीताजी की सेवा में संलग्न रहती थीं वे उन्हें रक्त-कमल समान करवाली ! हरिणोपमे ! माता ! मधुतुल्ये ! अपूर्व अमृतसदृशे ! आदि शब्दों से संबोधित करती थीं। सीताजी के चरण जहाँ-जहाँ पड़ते थे, वहाँ वे, आगे-आगे पुष्प-राशि बिखेरती चलती थीं। उन पराग-भार से लदे पुष्पों के मध्य सीताजी विलक्षण कान्ति से शोभायमान दीखती थीं।

स्वर्णमय किंकिणी, रत्नहार, पुष्पमालाएँ, विशाल नितंबों पर पड़ी मेखलाएँ—इनसे भूषित लता-जैसी उनकी सहचरियाँ उनके सौंदर्य को मुग्ध होकर देखती खड़ी रह जाती थीं। उन सहचरियों के मध्य सीताजी ऐसी लगती थीं, मानो करोड़ों छोटी बिजलियों के बीच बड़ी विद्युत् राज्य कर रही हो।

'सबको मारनेवाले भाले तथा यम को भी पराजित करनेवाला कोई है'—यह जनश्रुति संसार में उत्पन्न करने के लिए ही सीताजी ने वैसे नयन पाये हैं। वे नयन अवर्णनीय हैं, उस सुन्दर कन्यारूपी फल (सीता) को देखकर पर्वत, दीवारे, प्रस्तर, पेड़-पौधे जैसे अचेतन पदार्थ भी द्रवित हो जाते हैं (तो चेतनों की बात ही क्या ?)।

पुरुषों की प्यासी आँखें जिन कामिनियों को देखकर उमंग से भर जाती हैं, वे रमणियाँ भी सीताजी के रूप-सौंदर्य को देख-देखकर आनंदित होती रहती हैं। नारियों के मन में भी रूप-लालसा (आकर्षण) उत्पन्न करनेवाली अमृत-समान सीताजी हमारे प्रभु श्रीरामचन्द्र को न जाने कैसी लगेंगी ?

कर्णाभरण आदि आभूषण पहले से ही जलद-शीतल नयनयुक्त सुन्दरियों के शृङ्गार की वस्तु रह चुके हैं, किन्तु अब इस सीताजी के जन्म से सौंदर्य के साधन (वे आभूषण) नई शोभा से शोभित हो रहे हैं।

अकल्पनीय सौंदर्य-युक्त सीताजी कन्या-प्रासाद पर खड़ी थीं, उस महाभाग (राम) की दृष्टि उम (सीता) पर पड़ी और उमकी दृष्टि उम महाभाग पर तब श्रीरामचन्द्र और सीताजी

७२ कंब रामायण

की आँखें एक दूसरे को पीने लगी ; उनकी प्रज्ञा भी अपना आश्रय छोड़कर एक दूसरे से जा मिली ।

( सीताजी के ) नयन-रूपी दो अतितीक्ष्ण बरछे ( रामचन्द्र की ) पुष्ट भुजाओं में जा गड़े । मुखरित होनेवाले वीर पद-कंकण पहने हुए (रामचन्द्र) के अरुण नयन भी मोहिनी-तुल्य उस देवी के स्तनों में गड़ गये ।

रूप-माधुर्य को पीनेवाले नयन-पाश से दोनों के मन बंध गये और उस बंधन के द्वारा खिंचे जाकर दृढ़ धनुष-धारी महाभाग तथा नुकीली दृष्टियुक्त तरुणी एक दूसरे के हृदय में पहुँच गये ।

कटिविहीन ( सीता ) एवं दोषरहित ( राम ), दो शरीर, किन्तु एक प्राण हो गये। विशाल क्षीरसागर में आदिशेष के पर्यंक पर साथ रहनेवाले वे दोनों एक दूसरे से वियुक्त हो गये थे, अब पुनः संयुक्त हो रहे हैं, तो फिर उनके प्रेम का वर्णन करना क्या आवश्यक है ?

उस असीम सुन्दर की भुजाओं का आलिंगन नहीं पा सकी, अतः स्वर्ण-कंकण-धारिणी ( सीता ) प्रतिमा के जैसे स्थिर खड़ी रह गई । उधर सीताजी की स्मृति, मन की दृढ़ता तथा शरीर-सौंदर्य को साथ लेकर कुमार भी मुनिवर का अनुसरण करते हुए आगे चले और दृष्टि-पथ से ओझल हो गये ।

अपने नयन-मार्ग से सुगन्धित पुष्पधारी (रामचन्द्र) के अदृश्य होते ही (सीताजी के) मन नामक मत्तगज का धृति नामक अंकुश भी हट गया । अब चन्द्रकला-सदृश ललाट से शोभित उनके स्त्रीत्व की क्या दशा हुई ? ( स्त्री-सुलभ लज्जा, संकोच आदि गुण भी छोड़ चले । )

विष्णु के अवतार-भूत ( रामचन्द्र ) के सम्मुख होते ही सीता के मन और शरीर उनकी तंतु-सूक्ष्म कटि के जैसे ही कंपित हो उठे । प्रेम की व्याधि उनके नयन-मार्ग से शरीर में जा पहुँची और तुरंत ही सारे शरीर में इस तरह फैल गई, जैसे दूध में जामन फैल जाता है ।

सीता देवी काम-व्याधि से पीड़ित हुईं । क्षण-क्षण वर्धमान उस व्याधि को वे किसी पर प्रकट भी नहीं कर सकती थीं । मूक व्याधि के समान अपनी पीड़ा को मन में ही छिपाये वे अति व्याकुल हो उठीं । उसी समय मन्मथ ने भी एक बाण उनके मन में छोड़ा, मानो जलते आग में किसी ने ईंधन डाल दिया हो ।

सीताजी की आँखें कान के उज्ज्वल ताटंकों तक फैल जाती थीं और बिना तेल लगाये तथा बिना आग में तपाये ही तीक्ष्ण फलवाले बरछे की जैसी लगती थीं । ऐसे नयन से शोभित ( वैदेही ) अब आग में पड़ी लता के सदृश झुलश गई । उनके केशपाश ढीले होकर बिखर गये और वस्त्र भी अंगों से नीचे फिसल पड़े ।

वियोग-व्याधि से पीड़ित होने के कारण ( सीता ) अपनी मेखला, शंख-निर्मित कंगन, शरीर की कांति, मन की दृढ़ता, स्मृति आदि सब खो बैठीं । ( क्षीरसागर मंथन के वाद ) अपनी समस्त संपत्ति देवताओं को देकर समुद्र जिस प्रकार कांतिहीन हो गया था, उसी प्रकार वह निश्चेष्ट रह गईं ।

बालकाण्ड ७३

सखियो ने देखा कि स्वर्ण-ताटक धारिणी, मयूर-सदृश उसके आभरण स्रस्त हो रहे हैं, उनकी लज्जा भी गलित हो रही है, स्तनों पर मन्मथ-वाण का आघात होने से वे शर-विद्ध हरिणी के समान तड़प रही है। उस दशा को प्राप्त सीता को वे बड़ी कठिनाई से उपचार के लिए ले गईं।

जिनके मीन-तुल्य नयन ताटक-युक्त कानो के साथ सदा समर करते रहते थे, उनकी (सखियो ने) कोमल शय्या पर लिटा दिया, जिसपर उनके कर-चरण सदृश ही, अति मृदु पल्लव तथा पुष्पद्दल बिछाये गये थे और अतिशीतल ओस की बँदे भी छिड़काई गई थीं।

सुगन्धि से भरे नवपुष्पों की उस सेज पर जब वे लेटीं, तब उनके शरीर-ताप से वह शय्या झुलसकर ऐसी हो गई, जैसे पाला पड़ने पर कमलो से भरा सरोवर या राहुग्रस्त होने पर चन्द्रमा।

पर्वत की चोटी पर मेघ-वर्षा के समान सीताजी के स्तनों पर उनके दीर्घ नयनों से मोती की धारा झरने लगी। धनुष-सदृश भौंहो से शोभित उनके ललाट पर स्वेद-विदु छा जाते, किंतु दूसरे ही क्षण भट्ठी से निकले हुए धुएँ के जैसे उनके उष्ण उच्छ्वासों के लगने से तुरंत सूख जाते थे।

कठोर हृदयवाले वन्य व्याध के शर से आहत मयूर की जो दशा होती है, वही उनकी भी हो गई। विरह की अग्नि में लता-सुकुमार उनका शरीर झुलस गया और उस पुष्प-पर्यंक पर लुढ़क गया।

उन्हें वे कोमल पुष्प भी काँटे जैसे लगे। चन्दन का लेप शरीर के ताप से जलकर चिनगारी बनकर गिर पड़ा। आभरणों के भीतर के डोरे जलकर टूट गये और पर्यंक पर के पल्लव झुलसकर काले हो गये।

सीताजी की धाइयाँ, दासियाँ, माता, वहने—सब उनकी वेदना को देखकर बहुत ही व्याकुल हुईं। उनकी समझ में नही आया कि उन्हें कौन-सी व्याधि है। उन्होंने सोचा कि किसी की नजर लग गई है और वे नीराजन करके यह दोष दूर करने की चेष्टा करने लगीं।

सखियाँ पंखे झल रही थी, पर पंखे की हवा से उनका विरह-ताप शांत न हुआ, और बढ़ता ही गया, जिससे उनके आभरण तथा शरीर पर के पुष्पहार, जो अब तक कुम्हलाये-से दीख पड़ते थे, अब झुलस गये और कुछ जलने भी लगे। उस समय सीताजी का वह दृश्य ऐसा था, मानो कोई सोने की प्रतिमा तपाई जाकर पिघल रही हो।

वे विरह में प्रलाप करने लगीं। वह उनके (रामचन्द्र के) रूप-लावण्य का स्मरण करती हुईं, कभी उनके केशों को पुष्पालंकृत अंधकार-वन कहती, उनके दोनों भुजाओं को दो स्तंभ या मरकत-रत्नमय दो पर्वत कहती, उनके नयनों को कमल-पुष्प कहती, और कभी कहती कि यह तो कोई मेघ इन्द्र-धनुष के साथ ही आकाश से धरती पर उतर आया है।

वह कहती—जो सुन्दर पुरुष मेरे हृदय में प्रवेश करके मेरी मनोहरता, महिलो-

७४ . कम्ब रामायण

चित लज्जा आदि गुणों को गलाकर मेरे प्राणों के साथ ही पी गया है, उसकी पर्वतोपम भुजाओं में आश्रित धनुष, इक्षु-धनुष नहीं है और वह पुरुष मन्मथ भी नहीं है।

अब मैं अपनी नारी-निसर्ग रमणीयता, स्वाभाविक लज्जा, मन की स्मृति—इन्हे कही भी नहीं देख पा रही हूँ, अतः जो पुरुष अपने कोमल पदों को दुखाते हुए धरती पर चल रहा है, वह अवश्य ही एक चोर है, जो नेत्रमार्ग से हृदय में प्रवेश करने में निपुण है।

इन्द्रनील-तुल्य केश, चन्द्र-सदृश मुख, लंबी भुजाएँ, सुन्दर नीलरत्न-पर्वत के जैसे उनके कंधे-ये मेरे प्राणों को पीनेवाले नहीं हैं किंतु उन सबसे बढ़कर उनकी वह मुस्कान है, जो मेरे प्राणों को पी रही है।

विशाल, उज्ज्वल तथा देखनेवालों के प्राण हरनेवाला उनका वक्ष तथा भव्य तामरस-सदृश उनके चरण ही नहीं, किंतु मस्त हाथी की जैसी उनकी पदगति भी है जो, मेरे मन में अमिट रूप से अंकित हो गई है।

मैं क्या कहूँ ? वह पुरुष देवलोक का निवासी नहीं है, क्योंकि उनके पंकज-नयनों की पलकें स्पंदित होती हैं, उनके विशाल कर में धनुष था तथा उनके वक्ष पर यज्ञोपवीत भी था, अतः वह युवक अवश्य कोई राजकुमार ही है।

वह राजकुमार मेरे कौमार्य-रूपी बड़े प्राकार¹ को ढाहकर चला गया है, जिसमें मेरे सहजात महिलोचित लज्जा, संकोच आदि गुण सुरक्षित थे और मन की दृढता-रूपी यन्त्र भी सुरक्षा के लिए संचालित होते थे। क्या मैं अपने ये विरह-व्याकुल प्राण त्यागने के पूर्व फिर एक बार उस सुन्दर पुरुष के दर्शन कर सकूँगी ?

इस प्रकार के वचन कहती हुई (सीताजी) उन्मत्त-सी प्रलाप करने लगीं, वे कभी कहतीं-देखो, वह सुन्दर (कुमार) यहाँ मेरे सामने खड़ा है, फिर कहतीं, हाय ! वह अदृश्य हो गया है। वे अपने विरह-उत्तम मन में विविध प्रकार की कल्पनाएँ करने लगीं।

उस समय (सृष्टि के) आदिकाल से ही उष्ण किरणों को बिखेरनेवाला सूर्य, मानो हंसगतिवाली सुकुमारी सीता के विरह-ताप की आँच को सह नहीं सका, अतएव काँपनेवाले अपने दीर्घ करों को समेटकर समुद्र में जा डूबा।

उसी समय संध्या-रूपी कालदेव, पुष्पों की सुगन्धि लेकर बहनेवाले मलयानल-रूपी पाश को लिये हुए, रक्त गगन-रूपी लाल-लाल केश और अंधकार-रूपी अपने काले रूप को लेकर आ पहुँचा और संसार में अपूर्व उस देवी को और अधिक सताने लगा।

वह संध्याकाल एक भूत के समान बढ़ने लगा। उसके पास आकाश में शब्द करनेवाले विहग-रूपी 'पटह' था। भूमि पर गर्जन करता हुआ सागर रूपी नूपुर था, आसमान की लाली उसका रक्त था और उसके पास पापमय अंधकार-रूपी काला कवच था। इस प्रकार, वह देखने में अति भयंकर लगता था।


¹ यहाँ किसी यंत्र की ओर संकेत है, जो प्राचीन काल में दक्षिण के नगरों के प्राकारों में सुरक्षा के निमित्त लगे रहते थे।

बालकाण्ड ७१

सरोवर-रूपी अग्नि मे तपा हुआ, सुगंध-पुष्पो के मधु-रूपी विष मे बुझा हुआ वह मद मारुत सचरण करता हुआ आया और मन्मथ के बाणो से विद्ध उनके शरीर मे जा लगा; जिससे सीता अत्यन्त अधीर हो उठी और संध्याकालीन गगन को देखकर डर गई कि यह यम का ही भयकर रूप न हो।

वह संध्याकाल काले रग के साथ बढ़ता हुआ आया। सीता सोचने लगी कि दुःखपूर्ण युवतियो के प्राण हरनेवाला यह कौन है ? काला समुद्र है ? कालमेघ है ? बहुत बड़ा इन्द्रनील पर्वत है ? 'काया' पुष्प है ? नीलकुमुद है ? या नीलोत्पल पुष्प है ? उनके सामने राक्षसो के झुण्ड जैसे रात्रिकाल बढता आया। (सीताजी रात्रि को संबोधित करके कहती हैं ) हे रात्रि-रूपी कालसर्प ! ये नक्षत्र तुम्हारे विषदंत हैं, मलय-समीर तुम्हारी फुफकार है, अरुण गगन तुम्हारे मुँह का विषकोश है। इनको लेकर तुम कहाँ से आये हो ?

मन्मथ-रूपी अहेरी पहले से ही मुझपर तीर छोड़ने से विरत नहीं हो रहा है. तुम भी क्यो अब अपना मुँह बाये मेरी ओर बढ रहे हो ? मेरे दो प्राण नही हैं, एक ही है मैं किसी प्रकार से मन्मथ के बाणो से बचने की चेष्टा कर रही हूँ; इतने में तुम कहाँ से आ निकले ? मुझसे तुम्हारा क्या विरोध है ? क्यो तुम स्त्री-हत्या का पाप अपने ऊपर लेना चाहते हो ?

यह दुःखद अंधकार जो बढता चला आ रहा है, विश्व-भर में व्याप्त होनेवाला हलाहल तो नही है ? समुद्र ही तो नहीं है, जो उमड़ता चला आ रहा है ? या उन ( रामचन्द्र ) का नीलवर्ण ही तो नही है, जो सभी लोगो के द्वारा स्मरण किये जाने के कारण सर्वत्र फैल रहा है ? अथवा यह यमराज का रग है, जिसको अजन के साथ मिला-कर गगन और भूतल पर लीपा जा रहा है ?

उसी समय अपने जोड़े से विलग होकर एक क्रौंच पक्षी शब्द करने लगा। (सीता उसको संबोधित कर कहती हैं )—मेरे दृष्टिपथ में क्षण-भर के लिए स्थित होकर वे ओझल हो गये। उन्हे रोककर रखनेवाला कोई नही रहा। मुझ निस्सहाय पर दया न करके रात्रि के अंधकार में छिपा हुआ मन्मथ मुझपर बाण चला रहा है। तुम भी मुझे क्यो सताने आये हो ? क्या उसी निष्ठुर कामदेव ने तुम्हें यह कर्म सिखा दिया है ? अथवा मेरे पूर्वजन्म-कृत पाप ही तुम्हारे रूप में अब मुझे सताने आये हैं ?

इस प्रकार सोचती हुई ( सीता ) जब बहुत दुःखी हो रही थी, तब सखियो ने उन्हे गगनस्पर्शी प्रासाद के ऊपर एक चन्द्रकान्त-वेदिका पर लिटा दिया। अति प्रकाशमान घृतदीपो को उष्णतावर्षक समझकर वहाँ से हटा दिया और तैल-रहित रत्नदीपो को ला रखा, जिनके प्रकाश से रात्रि का समय भी दिन के समान ही गया।

उसी समय चंद्र उदित हुआ। जब देवताओ ने, अपना भोजन अमृत को प्राप्त करने के लिए, मंदर पर्वत मे वासुकि सर्प को लपेटकर समुद्र का मंथन किया था, तब समुद्र से गगन-तल पर उठे हुए जलबिन्दु तथा रत्नजाल नक्षत्रो से भी अधिक चमक उठे थे ; उस समय समुद्र मे अमृत का स्वर्ण-कलश जिस प्रकार ऊपर निकला था, उसी प्रकार अब चंद्र समुद्र से ऊपर उठने लगा।

७६कंब रामायण

सृष्टि के आरंभ में समस्त विश्व को अपने उदर में आलीन करके जब विष्णु वट-पत्र पर लेटे थे, तब उनकी नाभि-रूपी समुद्र से एक कमल निकला था, जिसपर ब्रह्मदेव भ्रमर बनकर चार वेदों का गान करते हुए बैठे थे। समुद्र ओर चंद्रमा के उदय होने का दृश्य ऐसा था, मानो वीचि-भरा एक अन्य समुद्र श्वेतकमल को लेकर शोभायमान हो रहा हो।

आकाश पर नक्षत्र विन्दियों के समान चमकते थे, जिनके मध्य उज्ज्वल चन्द्र निशा के अंधकार को चाटता हुआ बढ रहा था, उस समय प्राची दिशा की चंद्रिका, रजतमय मंगल-कलश के समीप रखे हुए कोमल क्रमुकपत्र के समान फैली हुई थी। न जाने, शुक-भाषिणी सीता के लिए वह क्या बनकर रहेगी ?

संध्याराग-रूपी अपने हाथों को फैलाकर समस्त विश्व को आवृत करनेवाला जो अंधकार था, उसको निगलने के लिए शीतल चन्द्रमा उदित हुआ। उसकी चन्द्रिका सर्वत्र इस प्रकार फैली, जिस प्रकार विशाल जलाशयों तथा खेतों से भरे तिरुवेण्णैनल्लूर ग्राम के निवासी 'शडयप्पवल्लल' की कीर्त्ति नभ, धरती तथा दिशाओं में व्याप्त हो रही हो।

समुद्र के जल से विशद उज्ज्वल चन्द्रमा नामक एक चतुर बढ़ई निकला है। वह अपने करों को ऊपर फैलाकर अतिश्वेत चन्द्रिका रूपी सुधा (चूना) से समस्त ब्रह्मांड को पोत रहा है, क्योंकि विष्णु के नाभि-कमल से उत्पन्न यह अंडगोल बहुत पुराना हो गया है और उसे अब नया बनाना है।

इसी समय कमल-पुष्प मुकुलित हो गये, जिससे लक्ष्मी तथा गुंजार भरनेवाला भ्रमर-कुल तिरोहित हो गया। (उसके पश्चात्) रक्तकुमुद सिर उठाकर ऐसे विकसित हुए, जैसे सर्वत्र अपने आज्ञा-चक्र को संचालित करनेवाले चक्रवर्ती राजा के हटते ही अनेक सामन्त नरेश अपना-अपना स्वतंत्र अधिकार चलाने लगते हैं।

(बढ़ते हुए चन्द्र को देखकर विरह-तप्त सीता देवी कहने लगी)—समस्त विश्व को निगलकर बढ़नेवाले अंधकार-रूपी काले रंग की अग्नि में तुम श्वेत रंग की अग्नि बनकर निकले हो। उस मायामय पुरुषोत्तम से समुद्र, रूप-रंग में हार गया है, इधर मैं भी लोक मार्ग के विरुद्ध चलकर उनके प्रेम में अपने को खो बैठी हूँ। इस प्रकार, दुःखी होनेवाले हम दोनो (समुद्र और सीता) पर तुम निष्ठुरता कर रहे हो।

सागर में उत्पन्न हे चन्द्र ! तुम तो कठोर नहीं हो, क्योंकि तुम किसी की हत्या करनेवाले नहीं हो। तुम्हारा जन्म क्षीर समुद्र से हुआ है और तुम्हारे सहोदर हैं अमृत तथा गजगामिनी सुन्दरी लक्ष्मी। ऐसे तुम, क्या अब मुझे जलाने पर तुले हो ?

ऊपर उठा हुआ चन्द्र-किरण-रूपी हथौड़ा सीता के सुकुमार स्तनों पर चोट करने लगा। जैसे कोई हंसिनी आग में गिर पड़ी हो, उसी प्रकार सीता कमल-पुष्पों की सेज पर तड़पने लगीं।

जब चन्द्र-किरण लगातार चोट करने लगी, तब उनका शरीर तप्त हुआ, शिथिल हुआ और सेज पर लुटक गया। उनके स्पर्श से कमलदल झुलस गये। उस शुक-भाषिणी देवी की यह दशा हुई।

ज्यों ज्यों सखियाँ सुगन्धित चन्दन आदि का लेप उनके शरीर पर लगाती थीं

बालकाण्ड ७७

त्यों-त्यों उनका ताप बढ़ता ही जाता था। वे तड़फड़ा उठीं। पंखा झलने से उनके कोमल स्तनो मे गरमी बढ़ गई; क्या संसार मे काम-व्याधि का औषध भी कहीं है ?

सीता के शरीर-ताप मे कोमल पुष्पो की सेज झुलसकर काली पड़ जाती थी, तो माता मे भी बढ़कर ममता रखनेवाली उनकी दासियाँ सहस्रो शय्याएँ सजा देती थी।

मनोहर कन्यावास में पुष्पो की सेज पर हंसिनी-सदृश पड़ी सीता इस प्रकार विरह-विह्वल हो रही थी। उधर उनके विद्युत्-जैसी देह-लावण्य को देखने से उस कुमार की क्या दशा हुई, उसका भी थोड़ा वर्णन करेंगे।

जब ये (विश्वामित्र, रामचन्द्र और लक्ष्मण) महाराज (जनक) के सम्मुख आये, तब उन्होने अत्यन्त आनन्द के साथ उन तीनों की अगवानी की तथा अपने भोग-वैभव से अमरावती की समता करनेवाले गंगन-चुंबी प्रासाद मे उन्हे ठहराया।

वीर पुरुष (श्रीराम) की चरण-धूलि के स्पर्श से शाप-मुक्त होनेवाली अहल्या के पुत्र महर्षि (शतानन्द) वहाँ पधारे, मानो समस्त तपस्याएँ साकार होकर आ गई हो !

कुमारो ने उस आगत तपस्वी को आदर के साथ नमस्कार किया। अनंत सद्गुण-पूर्ण (शतानन्द) मुनि ने आशीष दिये और कौशिक के निकट आये।

गौतम के सत्पुत्र ने महान् तपस्वी विश्वामित्र को देखकर कहा—इस मिथिला की भूमि ने कैसी तपस्या की थी कि आपके यहाँ पदार्पण का फल उसको प्राप्त हुआ ?

शीतल कमल पर आसीन पुनीत ब्रह्मदेव की समानता करनेवाले, सर्वमैत्री की भावना से पूर्ण तथा महान तपस्वी शतानन्द से सर्वज्ञ (विश्वामित्र) ने कहा—'हे तपस्विन्, सुनें, इस उदार रामचंद्र ने वज्रघोष करनेवाली ताड़का का शरीर, मेरा यज्ञ तथा आपकी माता का शाप—तीनो को समाप्त किया है और मेरे मन का क्लेश दूर किया है।

यह सुनकर शतानन्द ने उत्तर दिया—हे तपोधन ! यदि आपकी कृपा रहे, तो इन दोनो वीरो के लिए कोई भी कार्य असंभव नही है। इस प्रकार कहकर—

उन्होने श्रीरामचन्द्र के चन्द्रमुख की ओर देखा, जो अतसी-पुष्प, नीलकांत मणि, नील समुद्र, नीले मेघ तथा नीलोत्पल के समान था; और बोले—

हे सुगन्धित पुष्पो की माला पहने हुए प्रभो ! मै आपको एक वृत्तात सुनाता हूँ, सुनें। अपूर्व तपस्या करनेवाले ये विश्वामित्र पहले भूतल के राजा बनकर अनेक वर्षों तक नीति से शासन करते रहे।

राजधर्म में निरत रहते समय एक बार ये आखेट करने के लिए एक घने अरण्य में गये और वहाँ अति प्रख्यात वसिष्ठ महर्षि के निकट जा पहुँचे।

अरुंधती के पति (वसिष्ठ) ने विश्वामित्र नरेश का उचित सत्कार किया तथा बैठने के लिए समुचित आसन दिया। जब कौशिक बैठे, तब उनको भोजन देने के उद्देश्य से वसिष्ठ ने अपनी सुरभि (गाय) को बुलाया और उसे आदेश दिया कि वह अमृत-सदृश भोज्य पदार्थ दे। सुरभि ने आज्ञा के अनुसार तत्काल सभी वस्तुएँ उपस्थित कर दीं।

उस मुनिवर (वसिष्ठ) ने कौशिक नरेश तथा उनकी सेना को षड्रस भोजन कराया और कहा—'आपलोग भर-पेट खाइए।' उनके भोजन करने के उपरांत सुवासित

७८ | कंब रामायण

पुष्प और श्रेष्ठ चन्दन-लेप भी दिये ; तब वे बहुत संतुष्ट हुए। फिर कुछ सोचकर कहने लगे--

हे तपस्विन् ! आप अपने स्थान से उठे भी नही, तो भी इस दिव्य धेनु ने मेरी सारी सेना को पवित्र तथा बढ़िया भोजन प्रदान कर दिया ; ऐसी विशेषता से युक्त है यह गाय । शास्त्रो के पारगत वेदज्ञ पंडितो का कहना है कि सभी उत्तम वस्तुएँ राजाओ के ही भोग के योग्य होती हैं।

यह धेनु आप जैसे ब्राह्मणो के लिए रखने-योग्य नही है । अतः, यह सुरभि मुझे दे दीजिए । कौशिक के ये वचन सुनकर वसिष्ठ कुछ क्षण तक कुछ भी कहे बिना मौन रहे । फिर कहा—हे शत्रु-भयंकर शूलधारी राजन् ! मैं वल्कलधारी मुनि हूँ । मुझे यह अधिकार नही है कि मैं इसे और किसी को दूँ। यदि वह स्वयं आपके पास जाय, तो उसे ले जायें।

यह सुनकर 'आप के कथनानुसार ही करूँगा'—कहते हुए कौशिक उठे। उन्होने बड़े उत्साह से उस सुरभि को बाँध लिया और चलने लगे, तो सुरभि बंधन तोड़कर वसिष्ठ के पास आ पहुँची और उनसे पूछा—क्या आपने मुझे विश्वामित्र को दे दिया है ? वेदादि सभी तत्त्वो के पारगत (वसिष्ठ) ने कहा—

मैने विश्वामित्र को दिया नही। वह विजयी नरेश स्वय ही तुम्हे ले जाना चाहता है। यह सुनते ही सुरभि क्रोध से भर गई तथा वसिष्ठ से यह कहती हुई कि आप देखें, वज्रनाट के समान मेरी बजानेवाली इस सारी सेना को मैं किस प्रकार नष्ट कर देती हूँ, और उसने अपने रोगटे खड़े कर लिये।

तत्क्षण उस कपिला धेनु ने हथियारो के साथ बर्बर, किरात, चीन, शोणक आदि विविध जाति के सैनिक उत्पन्न किये। उन सैनिको ने कौशिक की बलवती सेना का सहार कर दिया। यह देखकर विश्वामित्र के पुत्र क्रुद्ध हो उठे।

यह सुरभि की शक्ति नही, श्रुतिशास्त्र मे पडित वसिष्ठ की ही माया है। यह कहते हुए उन कौशिक-कुमारो ने वसिष्ठ का सिर काटने के लिए उन्हे आ घेरा। तब वसिष्ठ ने उनको क्रोधाग्नि की ज्वाला से भरी दृष्टि से देखा, तत्काल वे सब मृत होकर गिर पड़े।

कौशिक ने अपने सौ पुत्रों को मरते हुए देखा, तो वे घृत डालने से भड़की हुई अग्नि के समान उग्र हो उठे। वे रथ पर बैठकर आये और अपने धनुष को खूब झुका-कर वसिष्ठ पर एक के पश्चात् एक करके अतिवेग से तीर बरसाने लगे। वसिष्ठ ने अपने हाथ के ब्रह्मदंड को आज्ञा दी कि वह उन तीरो को रोक ले।

(कौशिक ने) साधारण शस्त्रो से लेकर दिव्य अस्त्रो तक अपने अभ्यस्त सभी आयुधो का प्रयोग किया, पर वसिष्ठ का ब्रह्मदंड सभी को निगलकर उज्ज्वल हो खड़ा रहा। तब कौशिक ने मेरु को धनुष बनानेवाले (शिव) का ध्यान किया शिव साक्षात् हुए तथा एक बलिष्ठ अस्त्र देकर चले गये ।१

कौशिक ने उस रुद्रास्त्र का प्रयोग किया। उसे देख देवता डर गये कि अब


१ कंब रामायण के कुछ सस्करणों में यह पद्य नहीं मिलता।—अनु०

बालकाण्ड ७६

तीनो लोक जल जायेगे, अतः वे उस अस्त्र को आते हुए देखकर स्वयं आगे बढ़े तथा उसे स्वयं ही निगल लिया। उस अस्त्र की ज्वालाएँ उनके शरीर के भीतर से बाहर निकलने लगीं, जिनसे वे और भी तेजस्वी हो निखर उठे। विध्वंसक रुद्रास्त्र की यह दशा हुई।

कौशिक ने यह सब देखा। वे सोचने लगे—वेदो के ज्ञाता महर्षियो के वंश में जो शक्ति तथा तेज रहते हैं, वे अन्य (लोगो) के पास नही होते। समस्त पृथ्वी पर राज्य करने की शक्ति भी उस ब्रह्मतेज के सामने कुछ भी नही। यह सोचकर उन्होंने कठिन तपस्या करने की ठानी और इंद्र की दिशा में (प्राची में) चले गये।

राजाओ के अधिराज (विश्वामित्र) महिमामय (वसिष्ठ) की विजय का ही स्मरण करते हुए चले और घोर तपस्या करने लगे। यह देखकर इन्द्र डरा और अप्सराओ में श्रेष्ठ तिलोत्तमा को उनकी तपस्या भंग करने के लिए भेजा।

कौशिक उस सुन्दरी के रूप को देखकर काम-पीड़ित हो उठे; काम-समुद्र में डूबकर अपनी सुध-बुध खो बैठे और उसकी संगति मे असंख्य दिन बिताये। जब उनका विवेक जागा, तब काम-भोग को विष के समान मानकर वे अट्टहास कर उठे।

अब कौशिक ने जाना कि यह सब इंद्र की वंचना है, उन्होंने क्रुद्ध हो तिलोत्तमा को शाप दिया कि वह मनुष्य-योनि मे जन्म ले। लाल नेत्रो और क्रोध-भरे मन को लेकर वे वहाँ से चल खड़े हुए ओर यम-दिशा (दक्षिण) की ओर चले गये।

कौशिक दक्षिण दिशा मे तप कर रहे थे। उसी समय अयोध्या के राजा त्रिशंकु ने अपने गुरु वसिष्ठ से प्रार्थना की कि मै सदेह स्वर्ग जाना चाहता हूँ, आप मेरी इच्छा पूरी करें। उन्होंने उत्तर दिया कि मुझसे यह कार्य नही हो सकता।

वसिष्ठ के ऐसा कहने पर त्रिशंकु बोला—यदि आपसे यह कार्य नही हो सकता है, तो मैं किसी अन्य व्यक्ति की सहायता से अपनी अभीष्ट-सिद्धि के लिए यज्ञ करूँगा। इस पर वसिष्ठ ने क्रुद्ध होकर उसे शाप दिया कि तुम अपने प्राचीन गुरु को छोड़कर दूसरे का आश्रय खोज रहे हो, अतः तुम चंडाल बन जाओ।

(शतानंद ने रामचंद्र को आगे की कहानी सुनाई) हे वत्स! ब्रह्मा के मानस-पुत्र (वसिष्ठ) के शाप से राजाधिराज त्रिशंकु का वह तेज मिट गया, जिससे सूर्य भी लज्जित होता था। सूर्योदय-वेला के विकसित कमल-सदृश उसके मुख की वह कांति नष्ट हो गई। वह चंडाल बन गया, जिसके रूप की सर्वत्र निन्दा होती है।

उसके रत्नहार, मुकुट तथा अन्य आभरण लोहे के बन गये, उसके वस्त्र तथा यज्ञोपवीत चर्ममय हो गये उसका शरीर मलिन हो गया और उसका सौंदर्य मिट गया। जब वह इस रूप को लेकर अयोध्या को लौटा, तब सभी लोग उसका धिक्कार करने लगे। तब दुःखी होकर वह अरण्य में चला गया।

कुछ दिनो के उपरांत वह उसी अरण्य मे तप करनेवाले विश्वामित्र के आश्रम के पास आया। विश्वामित्र के पूछने पर कि तुम कौन हो, क्यो आये हो ? त्रिशंकु ने नमस्कार करके अपनी सारी कहानी सुनाई।

विश्वामित्र त्रिशंकु का वृत्तांत सुनकर हँस पड़े और बोले—वस इतना ही।

८२ कंब रामायण

उस मुनिकुमार ने बंदङ्ग ऋषि के कथनानुसार ही यज्ञ मे मंत्र का जप किया। तुरंत ही विशाल पक्ष-युक्त गरुड, हंस, ऋषभ आदि वाहनो के अधिष्ठाता त्रिदेव, अन्य देव परिवार-समेत, उस यज्ञशाला मे आ उपस्थित हुए और उस मुनि-कुमार के प्राणो की तथा वेदविहित यज्ञ की भी रक्षा की। अब मुनिवर (विश्वामित्र) भी उत्तर दिशा की ओर चल पडे।

उत्तर दिशा मे पहुँचकर विश्वामित्र तपोमग्न हुए। अपने कर-कमल से नासिका को वन्द किया, इडा को पिंगला¹ से दबाया और हृदय में एकाक्षर प्रणव का ध्यान करते रहे। इस प्रकार, अनेक वर्ष (ध्यान-मग्न) रहने पर कुंडलिनी मूल की अग्नि से उनका सहस्रार स्फुटित हुआ और उनके कपाल से तमपुज उठे और सभी लोको को आवृत करने लगे, जिससे सभी डर गये।

उनके कपाल से उत्थित वह धुआँ विश्व-भर में ऐसे फैल गया, जैसे त्रिपुर-दाह करनेवाले (शिव) ने गजासुर का सहार करके उसके चर्म को अपने शरीर मे समेट लिया हो, या प्रलय-मेघ ही घिर आये हों।

सभी लोक अंधकार मे डूब गये। अति प्रखर सूर्य के किरण-जाल भी उस तम मे अदृश्य हो गये। दिक्पालो तथा धरणी को धारण करनेवाले दिग्गजो की आँखें उस गाढ अंधकार मे अधी हो गई।

नभ मे, जहाँ ससार के जीवन-प्रद घन-समूह घिरे रहते हैं, वहाँ अब धुआँ भर गया। इससे धरती के सभी चर-अचर, पदार्थ-समुदाय भयभीत हो उठे। खर-किरण (सूर्य) के कर कही भी आगे न बढ सके और सर्वतः मार्ग को रुद्ध पाकर लौट आये। सभी देवता थर-थर काँपने लगे।

पुण्डरीक पर स्थित ब्रह्मदेव, गरुडवाहन विष्णु, वृषभ पर सचरण करनेवाले शकर, वज्रधारी इन्द्र तथा अन्य देवता पृथक्-पृथक् चलकर उस तपोधन के समीप आ पहुँचे।

अर्धचन्द्र को सिर पर धारण करनेवाले (शिव), हरित तुलसीमाला-धारी (विष्णु) तथा उस विष्णु के नाभि-कमल पर आसीन ब्रह्मा—इन तीनो ने विश्वामित्र से कहा—हे महान् तपोधन। तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कौन ऐसा है, जो वेदों का पारंगत हो।

उनके वचन सुनकर विश्वामित्र अपना सिर नवाकर, दोनो कर-कमल जोडे खडे रहे और यह कहकर कि अभीष्ट पुण्य-फल मुझे अभी प्राप्त हुआ है, आनद से फूल उठे। फिर, सभी देव अपने-अपने स्थान पर जा पहुँचे।

यह प्राचीन युग की घटना है। इन कौशिक के समान तपोमहिमा से युक्त अन्य कोई नही है। इस नियमनिष्ठ नीतिज्ञ की करुणा आप दोनों को मिली है। अब आपके लिए असभव कार्य कुछ भी नही है। अनतगुण-पूर्ण शतानंद ने इन शब्दो मे राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र की कहानी सुनाई।

गौतम के प्रियपुत्र शतानद के मुख से यह वृत्तान्त श्रवण करके वे दोनों वीर


१. इडा को पिगला से दबाना—यह प्राणवायु की एक प्रक्रिया है।

बालकाण्ड ८३

विस्मय तथा आनन्द से भर गये। उन्होंने उन तपस्वी के चरणो की वन्दना की और वे उन्हें आशीष देकर अपने आवास को लौटे।

विश्वामित्र तथा लक्ष्मण जब अपनी-अपनी शय्या पर जाकर लेटे, तब रामचन्द्र किसी तमोमय फल के समान ऐसे रह गये कि वहाँ पर केवल निशा थी, चन्द्र था, एकान्त था, सीता ( की स्मृति ) थी तथा स्वयं राम थे।

( राम सोचने लगे ) कदाचित् कोई बिजली मेघ से अलग होकर नारी के सुन्दर रूप में आ उपस्थित हुई है। बहुत सोचने पर भी मै समझ नही पा रहा हूँ कि यह क्या है, क्या नही है ? उस रूप को मै अपने नेत्रों और मन में अंकित देख रहा हूँ।

उस सुन्दरी ( सीता ) के नयन उस क्षीरसमुद्र के जैसे प्रकाशमान हैं, जहाँ कालवर्ण विष्णु आदिशेष पर लेटे रहते हैं। अब वह सुन्दरी मेरे हृदय-रूपी कमल में आ विराजी है। अतः, कदाचित् वह पंकज-निवासिनी लक्ष्मी ही है।

यद्यपि मुझपर वह रमणी करुणाहीन है. तथापि मेरा मन उसपर मुग्ध हो गया है। उसने भयदायक काम-पीड़ा उत्पन्न करनेवाले अपने विष-सदृश नयनों से मुझे पी-सा लिया है, अतः अब मुझे इस ससार के सभी चर-अचर वस्तु-समूह उसी रमणी के सोने के रंग में अंकित-से दीखते हैं।

यद्यपि मैं अपने इस अभागे वक्ष से उस सुन्दरी के स्वर्ण-कलश-तुल्य स्तनों का—जहाँ पर आभरण स्पंदित होते रहते हैं—आलिंगन नही कर पाया हूँ, तथापि मैं सोचता हूँ कि क्या मै फिर उसकी उज्ज्वल चन्द्रिका जैसी हँसी को तथा उसके बिंबफल-तुल्य अधर को कभी देख सकूँगा ?

मनोहर मेखला से भूषित रथ-सदृश नितंब एक है, खड्ग-जैसे दो-दो नयन हैं दो पीन स्तन भी हैं तथा मुख पर अंकित मदहास भी एक है। हाय ! अपने पराक्रम में प्रख्यात यम-सदृश ( मुझे मारने के लिए ) क्या इतने आयुधों की आवश्यकता है ?

रसपूर्ण इक्षु को धनुष बनाकर और सुन्दरी को व्याज बनाकर यदि मन्मथ मुझ पर पुष्पबाणों की वर्षा करे तथा मुझे परास्त कर दे, तो अब शौर्य नामक गुण किसके पास बचेगा ?

यह चाँदनी ऐसी फैली है, मानो क्षीर-समुद्र का गंभीर जल ससार को निगलने के लिए उमड़ पड़ा हो। ज्यो-ज्यो मैं उस रमणी का स्मरण करता हूँ, त्यो-त्यो वह चाँदनी मेरे प्राणो को समूल उखाड़ने लगती है। क्या संसार में श्वेत रंग का विष भी होता है ?

क्या मेरा शुद्ध मन भी सन्मार्ग से हटकर अनैतिक मार्ग पर चल सकता है ? ( नही ) अब यदि यह मन इस नारी पर मुग्ध हुआ है, तो इसका कारण यही है कि वह चाशनी ( मिसरी ) जैसी मधुर बोलीवाली तथा सोने के रंगवाली बाला कुमारी ही है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।

इतने में रात्रि व्यतीत हुई; चन्द्र पश्चिम समुद्र में डूब गया, मानो रात्रिकाल-रूपी राजा के मरने पर उसका उज्ज्वल श्वेतच्छत्र गिर गया हो, या पश्चिम दिशा-रूपी नारी के अति प्रकाशमान भाल पर रहनेवाला वर्तुल आभरण खो गया हो।