कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ७६
तीनो लोक जल जायेगे, अतः वे उस अस्त्र को आते हुए देखकर स्वयं आगे बढ़े तथा उसे स्वयं ही निगल लिया। उस अस्त्र की ज्वालाएँ उनके शरीर के भीतर से बाहर निकलने लगीं, जिनसे वे और भी तेजस्वी हो निखर उठे। विध्वंसक रुद्रास्त्र की यह दशा हुई।
कौशिक ने यह सब देखा। वे सोचने लगे—वेदो के ज्ञाता महर्षियो के वंश में जो शक्ति तथा तेज रहते हैं, वे अन्य (लोगो) के पास नही होते। समस्त पृथ्वी पर राज्य करने की शक्ति भी उस ब्रह्मतेज के सामने कुछ भी नही। यह सोचकर उन्होंने कठिन तपस्या करने की ठानी और इंद्र की दिशा में (प्राची में) चले गये।
राजाओ के अधिराज (विश्वामित्र) महिमामय (वसिष्ठ) की विजय का ही स्मरण करते हुए चले और घोर तपस्या करने लगे। यह देखकर इन्द्र डरा और अप्सराओ में श्रेष्ठ तिलोत्तमा को उनकी तपस्या भंग करने के लिए भेजा।
कौशिक उस सुन्दरी के रूप को देखकर काम-पीड़ित हो उठे; काम-समुद्र में डूबकर अपनी सुध-बुध खो बैठे और उसकी संगति मे असंख्य दिन बिताये। जब उनका विवेक जागा, तब काम-भोग को विष के समान मानकर वे अट्टहास कर उठे।
अब कौशिक ने जाना कि यह सब इंद्र की वंचना है, उन्होंने क्रुद्ध हो तिलोत्तमा को शाप दिया कि वह मनुष्य-योनि मे जन्म ले। लाल नेत्रो और क्रोध-भरे मन को लेकर वे वहाँ से चल खड़े हुए ओर यम-दिशा (दक्षिण) की ओर चले गये।
कौशिक दक्षिण दिशा मे तप कर रहे थे। उसी समय अयोध्या के राजा त्रिशंकु ने अपने गुरु वसिष्ठ से प्रार्थना की कि मै सदेह स्वर्ग जाना चाहता हूँ, आप मेरी इच्छा पूरी करें। उन्होंने उत्तर दिया कि मुझसे यह कार्य नही हो सकता।
वसिष्ठ के ऐसा कहने पर त्रिशंकु बोला—यदि आपसे यह कार्य नही हो सकता है, तो मैं किसी अन्य व्यक्ति की सहायता से अपनी अभीष्ट-सिद्धि के लिए यज्ञ करूँगा। इस पर वसिष्ठ ने क्रुद्ध होकर उसे शाप दिया कि तुम अपने प्राचीन गुरु को छोड़कर दूसरे का आश्रय खोज रहे हो, अतः तुम चंडाल बन जाओ।
(शतानंद ने रामचंद्र को आगे की कहानी सुनाई) हे वत्स! ब्रह्मा के मानस-पुत्र (वसिष्ठ) के शाप से राजाधिराज त्रिशंकु का वह तेज मिट गया, जिससे सूर्य भी लज्जित होता था। सूर्योदय-वेला के विकसित कमल-सदृश उसके मुख की वह कांति नष्ट हो गई। वह चंडाल बन गया, जिसके रूप की सर्वत्र निन्दा होती है।
उसके रत्नहार, मुकुट तथा अन्य आभरण लोहे के बन गये, उसके वस्त्र तथा यज्ञोपवीत चर्ममय हो गये उसका शरीर मलिन हो गया और उसका सौंदर्य मिट गया। जब वह इस रूप को लेकर अयोध्या को लौटा, तब सभी लोग उसका धिक्कार करने लगे। तब दुःखी होकर वह अरण्य में चला गया।
कुछ दिनो के उपरांत वह उसी अरण्य मे तप करनेवाले विश्वामित्र के आश्रम के पास आया। विश्वामित्र के पूछने पर कि तुम कौन हो, क्यो आये हो ? त्रिशंकु ने नमस्कार करके अपनी सारी कहानी सुनाई।
विश्वामित्र त्रिशंकु का वृत्तांत सुनकर हँस पड़े और बोले—वस इतना ही।