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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 549 में से

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पृष्ठ 94

८२ कंब रामायण

उस मुनिकुमार ने बंदङ्ग ऋषि के कथनानुसार ही यज्ञ मे मंत्र का जप किया। तुरंत ही विशाल पक्ष-युक्त गरुड, हंस, ऋषभ आदि वाहनो के अधिष्ठाता त्रिदेव, अन्य देव परिवार-समेत, उस यज्ञशाला मे आ उपस्थित हुए और उस मुनि-कुमार के प्राणो की तथा वेदविहित यज्ञ की भी रक्षा की। अब मुनिवर (विश्वामित्र) भी उत्तर दिशा की ओर चल पडे।

उत्तर दिशा मे पहुँचकर विश्वामित्र तपोमग्न हुए। अपने कर-कमल से नासिका को वन्द किया, इडा को पिंगला¹ से दबाया और हृदय में एकाक्षर प्रणव का ध्यान करते रहे। इस प्रकार, अनेक वर्ष (ध्यान-मग्न) रहने पर कुंडलिनी मूल की अग्नि से उनका सहस्रार स्फुटित हुआ और उनके कपाल से तमपुज उठे और सभी लोको को आवृत करने लगे, जिससे सभी डर गये।

उनके कपाल से उत्थित वह धुआँ विश्व-भर में ऐसे फैल गया, जैसे त्रिपुर-दाह करनेवाले (शिव) ने गजासुर का सहार करके उसके चर्म को अपने शरीर मे समेट लिया हो, या प्रलय-मेघ ही घिर आये हों।

सभी लोक अंधकार मे डूब गये। अति प्रखर सूर्य के किरण-जाल भी उस तम मे अदृश्य हो गये। दिक्पालो तथा धरणी को धारण करनेवाले दिग्गजो की आँखें उस गाढ अंधकार मे अधी हो गई।

नभ मे, जहाँ ससार के जीवन-प्रद घन-समूह घिरे रहते हैं, वहाँ अब धुआँ भर गया। इससे धरती के सभी चर-अचर, पदार्थ-समुदाय भयभीत हो उठे। खर-किरण (सूर्य) के कर कही भी आगे न बढ सके और सर्वतः मार्ग को रुद्ध पाकर लौट आये। सभी देवता थर-थर काँपने लगे।

पुण्डरीक पर स्थित ब्रह्मदेव, गरुडवाहन विष्णु, वृषभ पर सचरण करनेवाले शकर, वज्रधारी इन्द्र तथा अन्य देवता पृथक्-पृथक् चलकर उस तपोधन के समीप आ पहुँचे।

अर्धचन्द्र को सिर पर धारण करनेवाले (शिव), हरित तुलसीमाला-धारी (विष्णु) तथा उस विष्णु के नाभि-कमल पर आसीन ब्रह्मा—इन तीनो ने विश्वामित्र से कहा—हे महान् तपोधन। तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कौन ऐसा है, जो वेदों का पारंगत हो।

उनके वचन सुनकर विश्वामित्र अपना सिर नवाकर, दोनो कर-कमल जोडे खडे रहे और यह कहकर कि अभीष्ट पुण्य-फल मुझे अभी प्राप्त हुआ है, आनद से फूल उठे। फिर, सभी देव अपने-अपने स्थान पर जा पहुँचे।

यह प्राचीन युग की घटना है। इन कौशिक के समान तपोमहिमा से युक्त अन्य कोई नही है। इस नियमनिष्ठ नीतिज्ञ की करुणा आप दोनों को मिली है। अब आपके लिए असभव कार्य कुछ भी नही है। अनतगुण-पूर्ण शतानंद ने इन शब्दो मे राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र की कहानी सुनाई।

गौतम के प्रियपुत्र शतानद के मुख से यह वृत्तान्त श्रवण करके वे दोनों वीर


१. इडा को पिगला से दबाना—यह प्राणवायु की एक प्रक्रिया है।

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