भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 92

७८ | कंब रामायण

पुष्प और श्रेष्ठ चन्दन-लेप भी दिये ; तब वे बहुत संतुष्ट हुए। फिर कुछ सोचकर कहने लगे--

हे तपस्विन् ! आप अपने स्थान से उठे भी नही, तो भी इस दिव्य धेनु ने मेरी सारी सेना को पवित्र तथा बढ़िया भोजन प्रदान कर दिया ; ऐसी विशेषता से युक्त है यह गाय । शास्त्रो के पारगत वेदज्ञ पंडितो का कहना है कि सभी उत्तम वस्तुएँ राजाओ के ही भोग के योग्य होती हैं।

यह धेनु आप जैसे ब्राह्मणो के लिए रखने-योग्य नही है । अतः, यह सुरभि मुझे दे दीजिए । कौशिक के ये वचन सुनकर वसिष्ठ कुछ क्षण तक कुछ भी कहे बिना मौन रहे । फिर कहा—हे शत्रु-भयंकर शूलधारी राजन् ! मैं वल्कलधारी मुनि हूँ । मुझे यह अधिकार नही है कि मैं इसे और किसी को दूँ। यदि वह स्वयं आपके पास जाय, तो उसे ले जायें।

यह सुनकर 'आप के कथनानुसार ही करूँगा'—कहते हुए कौशिक उठे। उन्होने बड़े उत्साह से उस सुरभि को बाँध लिया और चलने लगे, तो सुरभि बंधन तोड़कर वसिष्ठ के पास आ पहुँची और उनसे पूछा—क्या आपने मुझे विश्वामित्र को दे दिया है ? वेदादि सभी तत्त्वो के पारगत (वसिष्ठ) ने कहा—

मैने विश्वामित्र को दिया नही। वह विजयी नरेश स्वय ही तुम्हे ले जाना चाहता है। यह सुनते ही सुरभि क्रोध से भर गई तथा वसिष्ठ से यह कहती हुई कि आप देखें, वज्रनाट के समान मेरी बजानेवाली इस सारी सेना को मैं किस प्रकार नष्ट कर देती हूँ, और उसने अपने रोगटे खड़े कर लिये।

तत्क्षण उस कपिला धेनु ने हथियारो के साथ बर्बर, किरात, चीन, शोणक आदि विविध जाति के सैनिक उत्पन्न किये। उन सैनिको ने कौशिक की बलवती सेना का सहार कर दिया। यह देखकर विश्वामित्र के पुत्र क्रुद्ध हो उठे।

यह सुरभि की शक्ति नही, श्रुतिशास्त्र मे पडित वसिष्ठ की ही माया है। यह कहते हुए उन कौशिक-कुमारो ने वसिष्ठ का सिर काटने के लिए उन्हे आ घेरा। तब वसिष्ठ ने उनको क्रोधाग्नि की ज्वाला से भरी दृष्टि से देखा, तत्काल वे सब मृत होकर गिर पड़े।

कौशिक ने अपने सौ पुत्रों को मरते हुए देखा, तो वे घृत डालने से भड़की हुई अग्नि के समान उग्र हो उठे। वे रथ पर बैठकर आये और अपने धनुष को खूब झुका-कर वसिष्ठ पर एक के पश्चात् एक करके अतिवेग से तीर बरसाने लगे। वसिष्ठ ने अपने हाथ के ब्रह्मदंड को आज्ञा दी कि वह उन तीरो को रोक ले।

(कौशिक ने) साधारण शस्त्रो से लेकर दिव्य अस्त्रो तक अपने अभ्यस्त सभी आयुधो का प्रयोग किया, पर वसिष्ठ का ब्रह्मदंड सभी को निगलकर उज्ज्वल हो खड़ा रहा। तब कौशिक ने मेरु को धनुष बनानेवाले (शिव) का ध्यान किया शिव साक्षात् हुए तथा एक बलिष्ठ अस्त्र देकर चले गये ।१

कौशिक ने उस रुद्रास्त्र का प्रयोग किया। उसे देख देवता डर गये कि अब


१ कंब रामायण के कुछ सस्करणों में यह पद्य नहीं मिलता।—अनु०