भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 91

बालकाण्ड ७७

त्यों-त्यों उनका ताप बढ़ता ही जाता था। वे तड़फड़ा उठीं। पंखा झलने से उनके कोमल स्तनो मे गरमी बढ़ गई; क्या संसार मे काम-व्याधि का औषध भी कहीं है ?

सीता के शरीर-ताप मे कोमल पुष्पो की सेज झुलसकर काली पड़ जाती थी, तो माता मे भी बढ़कर ममता रखनेवाली उनकी दासियाँ सहस्रो शय्याएँ सजा देती थी।

मनोहर कन्यावास में पुष्पो की सेज पर हंसिनी-सदृश पड़ी सीता इस प्रकार विरह-विह्वल हो रही थी। उधर उनके विद्युत्-जैसी देह-लावण्य को देखने से उस कुमार की क्या दशा हुई, उसका भी थोड़ा वर्णन करेंगे।

जब ये (विश्वामित्र, रामचन्द्र और लक्ष्मण) महाराज (जनक) के सम्मुख आये, तब उन्होने अत्यन्त आनन्द के साथ उन तीनों की अगवानी की तथा अपने भोग-वैभव से अमरावती की समता करनेवाले गंगन-चुंबी प्रासाद मे उन्हे ठहराया।

वीर पुरुष (श्रीराम) की चरण-धूलि के स्पर्श से शाप-मुक्त होनेवाली अहल्या के पुत्र महर्षि (शतानन्द) वहाँ पधारे, मानो समस्त तपस्याएँ साकार होकर आ गई हो !

कुमारो ने उस आगत तपस्वी को आदर के साथ नमस्कार किया। अनंत सद्गुण-पूर्ण (शतानन्द) मुनि ने आशीष दिये और कौशिक के निकट आये।

गौतम के सत्पुत्र ने महान् तपस्वी विश्वामित्र को देखकर कहा—इस मिथिला की भूमि ने कैसी तपस्या की थी कि आपके यहाँ पदार्पण का फल उसको प्राप्त हुआ ?

शीतल कमल पर आसीन पुनीत ब्रह्मदेव की समानता करनेवाले, सर्वमैत्री की भावना से पूर्ण तथा महान तपस्वी शतानन्द से सर्वज्ञ (विश्वामित्र) ने कहा—'हे तपस्विन्, सुनें, इस उदार रामचंद्र ने वज्रघोष करनेवाली ताड़का का शरीर, मेरा यज्ञ तथा आपकी माता का शाप—तीनो को समाप्त किया है और मेरे मन का क्लेश दूर किया है।

यह सुनकर शतानन्द ने उत्तर दिया—हे तपोधन ! यदि आपकी कृपा रहे, तो इन दोनो वीरो के लिए कोई भी कार्य असंभव नही है। इस प्रकार कहकर—

उन्होने श्रीरामचन्द्र के चन्द्रमुख की ओर देखा, जो अतसी-पुष्प, नीलकांत मणि, नील समुद्र, नीले मेघ तथा नीलोत्पल के समान था; और बोले—

हे सुगन्धित पुष्पो की माला पहने हुए प्रभो ! मै आपको एक वृत्तात सुनाता हूँ, सुनें। अपूर्व तपस्या करनेवाले ये विश्वामित्र पहले भूतल के राजा बनकर अनेक वर्षों तक नीति से शासन करते रहे।

राजधर्म में निरत रहते समय एक बार ये आखेट करने के लिए एक घने अरण्य में गये और वहाँ अति प्रख्यात वसिष्ठ महर्षि के निकट जा पहुँचे।

अरुंधती के पति (वसिष्ठ) ने विश्वामित्र नरेश का उचित सत्कार किया तथा बैठने के लिए समुचित आसन दिया। जब कौशिक बैठे, तब उनको भोजन देने के उद्देश्य से वसिष्ठ ने अपनी सुरभि (गाय) को बुलाया और उसे आदेश दिया कि वह अमृत-सदृश भोज्य पदार्थ दे। सुरभि ने आज्ञा के अनुसार तत्काल सभी वस्तुएँ उपस्थित कर दीं।

उस मुनिवर (वसिष्ठ) ने कौशिक नरेश तथा उनकी सेना को षड्रस भोजन कराया और कहा—'आपलोग भर-पेट खाइए।' उनके भोजन करने के उपरांत सुवासित

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · पृष्ठ 91, कुल 549 में से · BharatKosha