कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 90, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७६ | कंब रामायण |
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सृष्टि के आरंभ में समस्त विश्व को अपने उदर में आलीन करके जब विष्णु वट-पत्र पर लेटे थे, तब उनकी नाभि-रूपी समुद्र से एक कमल निकला था, जिसपर ब्रह्मदेव भ्रमर बनकर चार वेदों का गान करते हुए बैठे थे। समुद्र ओर चंद्रमा के उदय होने का दृश्य ऐसा था, मानो वीचि-भरा एक अन्य समुद्र श्वेतकमल को लेकर शोभायमान हो रहा हो।
आकाश पर नक्षत्र विन्दियों के समान चमकते थे, जिनके मध्य उज्ज्वल चन्द्र निशा के अंधकार को चाटता हुआ बढ रहा था, उस समय प्राची दिशा की चंद्रिका, रजतमय मंगल-कलश के समीप रखे हुए कोमल क्रमुकपत्र के समान फैली हुई थी। न जाने, शुक-भाषिणी सीता के लिए वह क्या बनकर रहेगी ?
संध्याराग-रूपी अपने हाथों को फैलाकर समस्त विश्व को आवृत करनेवाला जो अंधकार था, उसको निगलने के लिए शीतल चन्द्रमा उदित हुआ। उसकी चन्द्रिका सर्वत्र इस प्रकार फैली, जिस प्रकार विशाल जलाशयों तथा खेतों से भरे तिरुवेण्णैनल्लूर ग्राम के निवासी 'शडयप्पवल्लल' की कीर्त्ति नभ, धरती तथा दिशाओं में व्याप्त हो रही हो।
समुद्र के जल से विशद उज्ज्वल चन्द्रमा नामक एक चतुर बढ़ई निकला है। वह अपने करों को ऊपर फैलाकर अतिश्वेत चन्द्रिका रूपी सुधा (चूना) से समस्त ब्रह्मांड को पोत रहा है, क्योंकि विष्णु के नाभि-कमल से उत्पन्न यह अंडगोल बहुत पुराना हो गया है और उसे अब नया बनाना है।
इसी समय कमल-पुष्प मुकुलित हो गये, जिससे लक्ष्मी तथा गुंजार भरनेवाला भ्रमर-कुल तिरोहित हो गया। (उसके पश्चात्) रक्तकुमुद सिर उठाकर ऐसे विकसित हुए, जैसे सर्वत्र अपने आज्ञा-चक्र को संचालित करनेवाले चक्रवर्ती राजा के हटते ही अनेक सामन्त नरेश अपना-अपना स्वतंत्र अधिकार चलाने लगते हैं।
(बढ़ते हुए चन्द्र को देखकर विरह-तप्त सीता देवी कहने लगी)—समस्त विश्व को निगलकर बढ़नेवाले अंधकार-रूपी काले रंग की अग्नि में तुम श्वेत रंग की अग्नि बनकर निकले हो। उस मायामय पुरुषोत्तम से समुद्र, रूप-रंग में हार गया है, इधर मैं भी लोक मार्ग के विरुद्ध चलकर उनके प्रेम में अपने को खो बैठी हूँ। इस प्रकार, दुःखी होनेवाले हम दोनो (समुद्र और सीता) पर तुम निष्ठुरता कर रहे हो।
सागर में उत्पन्न हे चन्द्र ! तुम तो कठोर नहीं हो, क्योंकि तुम किसी की हत्या करनेवाले नहीं हो। तुम्हारा जन्म क्षीर समुद्र से हुआ है और तुम्हारे सहोदर हैं अमृत तथा गजगामिनी सुन्दरी लक्ष्मी। ऐसे तुम, क्या अब मुझे जलाने पर तुले हो ?
ऊपर उठा हुआ चन्द्र-किरण-रूपी हथौड़ा सीता के सुकुमार स्तनों पर चोट करने लगा। जैसे कोई हंसिनी आग में गिर पड़ी हो, उसी प्रकार सीता कमल-पुष्पों की सेज पर तड़पने लगीं।
जब चन्द्र-किरण लगातार चोट करने लगी, तब उनका शरीर तप्त हुआ, शिथिल हुआ और सेज पर लुटक गया। उनके स्पर्श से कमलदल झुलस गये। उस शुक-भाषिणी देवी की यह दशा हुई।
ज्यों ज्यों सखियाँ सुगन्धित चन्दन आदि का लेप उनके शरीर पर लगाती थीं