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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

बालकाण्ड ७१

सरोवर-रूपी अग्नि मे तपा हुआ, सुगंध-पुष्पो के मधु-रूपी विष मे बुझा हुआ वह मद मारुत सचरण करता हुआ आया और मन्मथ के बाणो से विद्ध उनके शरीर मे जा लगा; जिससे सीता अत्यन्त अधीर हो उठी और संध्याकालीन गगन को देखकर डर गई कि यह यम का ही भयकर रूप न हो।

वह संध्याकाल काले रग के साथ बढ़ता हुआ आया। सीता सोचने लगी कि दुःखपूर्ण युवतियो के प्राण हरनेवाला यह कौन है ? काला समुद्र है ? कालमेघ है ? बहुत बड़ा इन्द्रनील पर्वत है ? 'काया' पुष्प है ? नीलकुमुद है ? या नीलोत्पल पुष्प है ? उनके सामने राक्षसो के झुण्ड जैसे रात्रिकाल बढता आया। (सीताजी रात्रि को संबोधित करके कहती हैं ) हे रात्रि-रूपी कालसर्प ! ये नक्षत्र तुम्हारे विषदंत हैं, मलय-समीर तुम्हारी फुफकार है, अरुण गगन तुम्हारे मुँह का विषकोश है। इनको लेकर तुम कहाँ से आये हो ?

मन्मथ-रूपी अहेरी पहले से ही मुझपर तीर छोड़ने से विरत नहीं हो रहा है. तुम भी क्यो अब अपना मुँह बाये मेरी ओर बढ रहे हो ? मेरे दो प्राण नही हैं, एक ही है मैं किसी प्रकार से मन्मथ के बाणो से बचने की चेष्टा कर रही हूँ; इतने में तुम कहाँ से आ निकले ? मुझसे तुम्हारा क्या विरोध है ? क्यो तुम स्त्री-हत्या का पाप अपने ऊपर लेना चाहते हो ?

यह दुःखद अंधकार जो बढता चला आ रहा है, विश्व-भर में व्याप्त होनेवाला हलाहल तो नही है ? समुद्र ही तो नहीं है, जो उमड़ता चला आ रहा है ? या उन ( रामचन्द्र ) का नीलवर्ण ही तो नही है, जो सभी लोगो के द्वारा स्मरण किये जाने के कारण सर्वत्र फैल रहा है ? अथवा यह यमराज का रग है, जिसको अजन के साथ मिला-कर गगन और भूतल पर लीपा जा रहा है ?

उसी समय अपने जोड़े से विलग होकर एक क्रौंच पक्षी शब्द करने लगा। (सीता उसको संबोधित कर कहती हैं )—मेरे दृष्टिपथ में क्षण-भर के लिए स्थित होकर वे ओझल हो गये। उन्हे रोककर रखनेवाला कोई नही रहा। मुझ निस्सहाय पर दया न करके रात्रि के अंधकार में छिपा हुआ मन्मथ मुझपर बाण चला रहा है। तुम भी मुझे क्यो सताने आये हो ? क्या उसी निष्ठुर कामदेव ने तुम्हें यह कर्म सिखा दिया है ? अथवा मेरे पूर्वजन्म-कृत पाप ही तुम्हारे रूप में अब मुझे सताने आये हैं ?

इस प्रकार सोचती हुई ( सीता ) जब बहुत दुःखी हो रही थी, तब सखियो ने उन्हे गगनस्पर्शी प्रासाद के ऊपर एक चन्द्रकान्त-वेदिका पर लिटा दिया। अति प्रकाशमान घृतदीपो को उष्णतावर्षक समझकर वहाँ से हटा दिया और तैल-रहित रत्नदीपो को ला रखा, जिनके प्रकाश से रात्रि का समय भी दिन के समान ही गया।

उसी समय चंद्र उदित हुआ। जब देवताओ ने, अपना भोजन अमृत को प्राप्त करने के लिए, मंदर पर्वत मे वासुकि सर्प को लपेटकर समुद्र का मंथन किया था, तब समुद्र से गगन-तल पर उठे हुए जलबिन्दु तथा रत्नजाल नक्षत्रो से भी अधिक चमक उठे थे ; उस समय समुद्र मे अमृत का स्वर्ण-कलश जिस प्रकार ऊपर निकला था, उसी प्रकार अब चंद्र समुद्र से ऊपर उठने लगा।