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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

७४ . कम्ब रामायण

चित लज्जा आदि गुणों को गलाकर मेरे प्राणों के साथ ही पी गया है, उसकी पर्वतोपम भुजाओं में आश्रित धनुष, इक्षु-धनुष नहीं है और वह पुरुष मन्मथ भी नहीं है।

अब मैं अपनी नारी-निसर्ग रमणीयता, स्वाभाविक लज्जा, मन की स्मृति—इन्हे कही भी नहीं देख पा रही हूँ, अतः जो पुरुष अपने कोमल पदों को दुखाते हुए धरती पर चल रहा है, वह अवश्य ही एक चोर है, जो नेत्रमार्ग से हृदय में प्रवेश करने में निपुण है।

इन्द्रनील-तुल्य केश, चन्द्र-सदृश मुख, लंबी भुजाएँ, सुन्दर नीलरत्न-पर्वत के जैसे उनके कंधे-ये मेरे प्राणों को पीनेवाले नहीं हैं किंतु उन सबसे बढ़कर उनकी वह मुस्कान है, जो मेरे प्राणों को पी रही है।

विशाल, उज्ज्वल तथा देखनेवालों के प्राण हरनेवाला उनका वक्ष तथा भव्य तामरस-सदृश उनके चरण ही नहीं, किंतु मस्त हाथी की जैसी उनकी पदगति भी है जो, मेरे मन में अमिट रूप से अंकित हो गई है।

मैं क्या कहूँ ? वह पुरुष देवलोक का निवासी नहीं है, क्योंकि उनके पंकज-नयनों की पलकें स्पंदित होती हैं, उनके विशाल कर में धनुष था तथा उनके वक्ष पर यज्ञोपवीत भी था, अतः वह युवक अवश्य कोई राजकुमार ही है।

वह राजकुमार मेरे कौमार्य-रूपी बड़े प्राकार¹ को ढाहकर चला गया है, जिसमें मेरे सहजात महिलोचित लज्जा, संकोच आदि गुण सुरक्षित थे और मन की दृढता-रूपी यन्त्र भी सुरक्षा के लिए संचालित होते थे। क्या मैं अपने ये विरह-व्याकुल प्राण त्यागने के पूर्व फिर एक बार उस सुन्दर पुरुष के दर्शन कर सकूँगी ?

इस प्रकार के वचन कहती हुई (सीताजी) उन्मत्त-सी प्रलाप करने लगीं, वे कभी कहतीं-देखो, वह सुन्दर (कुमार) यहाँ मेरे सामने खड़ा है, फिर कहतीं, हाय ! वह अदृश्य हो गया है। वे अपने विरह-उत्तम मन में विविध प्रकार की कल्पनाएँ करने लगीं।

उस समय (सृष्टि के) आदिकाल से ही उष्ण किरणों को बिखेरनेवाला सूर्य, मानो हंसगतिवाली सुकुमारी सीता के विरह-ताप की आँच को सह नहीं सका, अतएव काँपनेवाले अपने दीर्घ करों को समेटकर समुद्र में जा डूबा।

उसी समय संध्या-रूपी कालदेव, पुष्पों की सुगन्धि लेकर बहनेवाले मलयानल-रूपी पाश को लिये हुए, रक्त गगन-रूपी लाल-लाल केश और अंधकार-रूपी अपने काले रूप को लेकर आ पहुँचा और संसार में अपूर्व उस देवी को और अधिक सताने लगा।

वह संध्याकाल एक भूत के समान बढ़ने लगा। उसके पास आकाश में शब्द करनेवाले विहग-रूपी 'पटह' था। भूमि पर गर्जन करता हुआ सागर रूपी नूपुर था, आसमान की लाली उसका रक्त था और उसके पास पापमय अंधकार-रूपी काला कवच था। इस प्रकार, वह देखने में अति भयंकर लगता था।


¹ यहाँ किसी यंत्र की ओर संकेत है, जो प्राचीन काल में दक्षिण के नगरों के प्राकारों में सुरक्षा के निमित्त लगे रहते थे।