कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 87, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ७३
सखियो ने देखा कि स्वर्ण-ताटक धारिणी, मयूर-सदृश उसके आभरण स्रस्त हो रहे हैं, उनकी लज्जा भी गलित हो रही है, स्तनों पर मन्मथ-वाण का आघात होने से वे शर-विद्ध हरिणी के समान तड़प रही है। उस दशा को प्राप्त सीता को वे बड़ी कठिनाई से उपचार के लिए ले गईं।
जिनके मीन-तुल्य नयन ताटक-युक्त कानो के साथ सदा समर करते रहते थे, उनकी (सखियो ने) कोमल शय्या पर लिटा दिया, जिसपर उनके कर-चरण सदृश ही, अति मृदु पल्लव तथा पुष्पद्दल बिछाये गये थे और अतिशीतल ओस की बँदे भी छिड़काई गई थीं।
सुगन्धि से भरे नवपुष्पों की उस सेज पर जब वे लेटीं, तब उनके शरीर-ताप से वह शय्या झुलसकर ऐसी हो गई, जैसे पाला पड़ने पर कमलो से भरा सरोवर या राहुग्रस्त होने पर चन्द्रमा।
पर्वत की चोटी पर मेघ-वर्षा के समान सीताजी के स्तनों पर उनके दीर्घ नयनों से मोती की धारा झरने लगी। धनुष-सदृश भौंहो से शोभित उनके ललाट पर स्वेद-विदु छा जाते, किंतु दूसरे ही क्षण भट्ठी से निकले हुए धुएँ के जैसे उनके उष्ण उच्छ्वासों के लगने से तुरंत सूख जाते थे।
कठोर हृदयवाले वन्य व्याध के शर से आहत मयूर की जो दशा होती है, वही उनकी भी हो गई। विरह की अग्नि में लता-सुकुमार उनका शरीर झुलस गया और उस पुष्प-पर्यंक पर लुढ़क गया।
उन्हें वे कोमल पुष्प भी काँटे जैसे लगे। चन्दन का लेप शरीर के ताप से जलकर चिनगारी बनकर गिर पड़ा। आभरणों के भीतर के डोरे जलकर टूट गये और पर्यंक पर के पल्लव झुलसकर काले हो गये।
सीताजी की धाइयाँ, दासियाँ, माता, वहने—सब उनकी वेदना को देखकर बहुत ही व्याकुल हुईं। उनकी समझ में नही आया कि उन्हें कौन-सी व्याधि है। उन्होंने सोचा कि किसी की नजर लग गई है और वे नीराजन करके यह दोष दूर करने की चेष्टा करने लगीं।
सखियाँ पंखे झल रही थी, पर पंखे की हवा से उनका विरह-ताप शांत न हुआ, और बढ़ता ही गया, जिससे उनके आभरण तथा शरीर पर के पुष्पहार, जो अब तक कुम्हलाये-से दीख पड़ते थे, अब झुलस गये और कुछ जलने भी लगे। उस समय सीताजी का वह दृश्य ऐसा था, मानो कोई सोने की प्रतिमा तपाई जाकर पिघल रही हो।
वे विरह में प्रलाप करने लगीं। वह उनके (रामचन्द्र के) रूप-लावण्य का स्मरण करती हुईं, कभी उनके केशों को पुष्पालंकृत अंधकार-वन कहती, उनके दोनों भुजाओं को दो स्तंभ या मरकत-रत्नमय दो पर्वत कहती, उनके नयनों को कमल-पुष्प कहती, और कभी कहती कि यह तो कोई मेघ इन्द्र-धनुष के साथ ही आकाश से धरती पर उतर आया है।
वह कहती—जो सुन्दर पुरुष मेरे हृदय में प्रवेश करके मेरी मनोहरता, महिलो-