कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ कंब रामायण
की आँखें एक दूसरे को पीने लगी ; उनकी प्रज्ञा भी अपना आश्रय छोड़कर एक दूसरे से जा मिली ।
( सीताजी के ) नयन-रूपी दो अतितीक्ष्ण बरछे ( रामचन्द्र की ) पुष्ट भुजाओं में जा गड़े । मुखरित होनेवाले वीर पद-कंकण पहने हुए (रामचन्द्र) के अरुण नयन भी मोहिनी-तुल्य उस देवी के स्तनों में गड़ गये ।
रूप-माधुर्य को पीनेवाले नयन-पाश से दोनों के मन बंध गये और उस बंधन के द्वारा खिंचे जाकर दृढ़ धनुष-धारी महाभाग तथा नुकीली दृष्टियुक्त तरुणी एक दूसरे के हृदय में पहुँच गये ।
कटिविहीन ( सीता ) एवं दोषरहित ( राम ), दो शरीर, किन्तु एक प्राण हो गये। विशाल क्षीरसागर में आदिशेष के पर्यंक पर साथ रहनेवाले वे दोनों एक दूसरे से वियुक्त हो गये थे, अब पुनः संयुक्त हो रहे हैं, तो फिर उनके प्रेम का वर्णन करना क्या आवश्यक है ?
उस असीम सुन्दर की भुजाओं का आलिंगन नहीं पा सकी, अतः स्वर्ण-कंकण-धारिणी ( सीता ) प्रतिमा के जैसे स्थिर खड़ी रह गई । उधर सीताजी की स्मृति, मन की दृढ़ता तथा शरीर-सौंदर्य को साथ लेकर कुमार भी मुनिवर का अनुसरण करते हुए आगे चले और दृष्टि-पथ से ओझल हो गये ।
अपने नयन-मार्ग से सुगन्धित पुष्पधारी (रामचन्द्र) के अदृश्य होते ही (सीताजी के) मन नामक मत्तगज का धृति नामक अंकुश भी हट गया । अब चन्द्रकला-सदृश ललाट से शोभित उनके स्त्रीत्व की क्या दशा हुई ? ( स्त्री-सुलभ लज्जा, संकोच आदि गुण भी छोड़ चले । )
विष्णु के अवतार-भूत ( रामचन्द्र ) के सम्मुख होते ही सीता के मन और शरीर उनकी तंतु-सूक्ष्म कटि के जैसे ही कंपित हो उठे । प्रेम की व्याधि उनके नयन-मार्ग से शरीर में जा पहुँची और तुरंत ही सारे शरीर में इस तरह फैल गई, जैसे दूध में जामन फैल जाता है ।
सीता देवी काम-व्याधि से पीड़ित हुईं । क्षण-क्षण वर्धमान उस व्याधि को वे किसी पर प्रकट भी नहीं कर सकती थीं । मूक व्याधि के समान अपनी पीड़ा को मन में ही छिपाये वे अति व्याकुल हो उठीं । उसी समय मन्मथ ने भी एक बाण उनके मन में छोड़ा, मानो जलते आग में किसी ने ईंधन डाल दिया हो ।
सीताजी की आँखें कान के उज्ज्वल ताटंकों तक फैल जाती थीं और बिना तेल लगाये तथा बिना आग में तपाये ही तीक्ष्ण फलवाले बरछे की जैसी लगती थीं । ऐसे नयन से शोभित ( वैदेही ) अब आग में पड़ी लता के सदृश झुलश गई । उनके केशपाश ढीले होकर बिखर गये और वस्त्र भी अंगों से नीचे फिसल पड़े ।
वियोग-व्याधि से पीड़ित होने के कारण ( सीता ) अपनी मेखला, शंख-निर्मित कंगन, शरीर की कांति, मन की दृढ़ता, स्मृति आदि सब खो बैठीं । ( क्षीरसागर मंथन के वाद ) अपनी समस्त संपत्ति देवताओं को देकर समुद्र जिस प्रकार कांतिहीन हो गया था, उसी प्रकार वह निश्चेष्ट रह गईं ।