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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 549 में से

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पृष्ठ 85

बालकाण्ड ७१

यदि ब्रह्मदेव से प्रार्थना की जाय कि रथ-सदृश पीनजघनवाली ऐसी ही एक अन्य तरुणी की सृष्टि कीजिए, तो वह चतुर्मुख भी वैसी सृष्टि नहीं कर सकेगा। अमृतभोजी देवगण ही क्यो न प्रार्थना करे, सागर अमृत नामक दिव्य औषध भले ही दुबारा दे दे; किन्तु ऐसी मनोहर रूपवती लक्ष्मी को कहाँ से लायगा ?

कान्तिपूर्ण भाले के फल के जैसे नयनोंवाली मेनका आदि अप्सराएँ, जिनपर स्वर्ग के शासक इन्द्र तथा अन्य देवता भी मुग्ध होते रहते हैं, इन सीताजी के शरीर-सौन्दर्य को देखकर मन मसोसकर रह जाती हैं। अब उन अप्सराओं के मुख-चन्द्र के लिए सर्वदा दिन ही रहता है (अर्थात्, दिन में चन्द्रमा जिस तरह कान्तिहीन दीखता है, उसी प्रकार सीता की छवि के सामने वे कान्तिहीन हो गई हैं)।

कमल-पुष्प पर निवास करनेवाली यह देवी इस धरती पर उतर आई हैं। इनके लिए किन्होंने बड़ी तपस्या की थी ? क्या वह असंख्य ब्राह्मण थे, या स्वयं धर्मदेवता थे, या सारा संसार था, या स्वर्ग था, अथवा सभी देवता ही थे, जिन्होंने ऐसी तपस्या की थी ? हम कह नहीं सकते कि यह किनकी तपस्या का फल है।

अनुपम रूपवती नारियाँ सीताजी की सेवा में संलग्न रहती थीं वे उन्हें रक्त-कमल समान करवाली ! हरिणोपमे ! माता ! मधुतुल्ये ! अपूर्व अमृतसदृशे ! आदि शब्दों से संबोधित करती थीं। सीताजी के चरण जहाँ-जहाँ पड़ते थे, वहाँ वे, आगे-आगे पुष्प-राशि बिखेरती चलती थीं। उन पराग-भार से लदे पुष्पों के मध्य सीताजी विलक्षण कान्ति से शोभायमान दीखती थीं।

स्वर्णमय किंकिणी, रत्नहार, पुष्पमालाएँ, विशाल नितंबों पर पड़ी मेखलाएँ—इनसे भूषित लता-जैसी उनकी सहचरियाँ उनके सौंदर्य को मुग्ध होकर देखती खड़ी रह जाती थीं। उन सहचरियों के मध्य सीताजी ऐसी लगती थीं, मानो करोड़ों छोटी बिजलियों के बीच बड़ी विद्युत् राज्य कर रही हो।

'सबको मारनेवाले भाले तथा यम को भी पराजित करनेवाला कोई है'—यह जनश्रुति संसार में उत्पन्न करने के लिए ही सीताजी ने वैसे नयन पाये हैं। वे नयन अवर्णनीय हैं, उस सुन्दर कन्यारूपी फल (सीता) को देखकर पर्वत, दीवारे, प्रस्तर, पेड़-पौधे जैसे अचेतन पदार्थ भी द्रवित हो जाते हैं (तो चेतनों की बात ही क्या ?)।

पुरुषों की प्यासी आँखें जिन कामिनियों को देखकर उमंग से भर जाती हैं, वे रमणियाँ भी सीताजी के रूप-सौंदर्य को देख-देखकर आनंदित होती रहती हैं। नारियों के मन में भी रूप-लालसा (आकर्षण) उत्पन्न करनेवाली अमृत-समान सीताजी हमारे प्रभु श्रीरामचन्द्र को न जाने कैसी लगेंगी ?

कर्णाभरण आदि आभूषण पहले से ही जलद-शीतल नयनयुक्त सुन्दरियों के शृङ्गार की वस्तु रह चुके हैं, किन्तु अब इस सीताजी के जन्म से सौंदर्य के साधन (वे आभूषण) नई शोभा से शोभित हो रहे हैं।

अकल्पनीय सौंदर्य-युक्त सीताजी कन्या-प्रासाद पर खड़ी थीं, उस महाभाग (राम) की दृष्टि उम (सीता) पर पड़ी और उमकी दृष्टि उम महाभाग पर तब श्रीरामचन्द्र और सीताजी

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