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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 549 में से

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पृष्ठ 84

७० कम्ब रामायण

लेप तथा पीनस्तनी नारियों के आलिंगन से उत्पन्न चिह्न अंकित थे। उनका खड्ग-प्रयोग यह स्मरण दिलाता था कि मनुष्य का मन भी विषयभागी इंद्रियों के द्वारा आकृष्ट होकर मोह-ग्रस्त हो इसी प्रकार भटकता रहता है।

उन्होंने यत्र-तत्र युवक-समूह भी देखे, जिनका शरीर सूर्य के समान उज्ज्वल था, जिनका मन इतना उदार था कि वे माँगने पर कोई भी अभीष्ट वस्तु दे देते थे, जिनके लाल करों में धनुष थे और जिनके केश, अपनी मानिनी प्रेयसियों के चरणों पर झुकने से महावर लगकर लाल हो गये थे। उन्हें देखने से ऐसा लगता था, मानो स्वयं मन्मथ शिवजी के नेत्र से बचकर भूतल पर आ गया हो।

उन्होंने मिथिला नगर की फुलवारियों को देखा और वहाँ पुष्प-चयन करती हुई मयूर की समानता करनेवाली तरुणियों को भी देखा। वे तरुणियाँ तोतों से चाशनी जैसी मीठी बोली में संभाषण कर रही थीं। उनके सौंदर्य से अप्सराएँ भी लजा जाती थीं। उनकी गति की कमनीयता से हंस भी परास्त हो जाते थे और भ्रमर उन तरुणियों की विजय पर हर्षनाद कर उठते थे।

उन्होंने चतुरंगिनी सेना-विशिष्ट जनक महाराज के स्वर्णमय प्रासाद के चारों ओर एक विशाल खाई देखी, जिसमें देवों के निवास-योग्य उन्नत अट्टालिकाओं की परछाईं पड़ती रहती थी और जहाँ देवनगर अमरावती की सुन्दरता उत्पन्न हो रही थी। तरंगायमान वह खाई उमड़ती हुई गंगा नदी के समान गंभीर थी।

वे तीनों राजप्रासाद में कन्यागृह की अट्टालिका के अग्रभाग को देखकर वहीं खड़े हो गये, उस अट्टालिका में हंस और हंसिनियाँ इस प्रकार परस्पर मिलकर विचर रहे थे, जैसे स्वर्ण और उसकी आभा, पुष्प और उसकी सुवास, भ्रमरों का भोज्य मधु और उसकी मिष्टता तथा सुगुम्फित कवि-वचन तथा उसकी रसमयता।

अब हम सीताजी का वर्णन करना चाहते हैं, किन्तु कैसे करें ? कमलासन ब्रह्मदेव से लेकर सभी (व्यक्ति), किसी नारी का उपमान देते समय लक्ष्मी का उल्लेख करते हैं : वही लक्ष्मी स्वयं सीता का रूप लेकर अवतीर्ण हुई हैं, तो उनका उपमान कहाँ से और कैसे ढूँढा जाय ?

पार्वती प्रभृति देवियाँ भी सिर पर कर जोड़कर, सकल सद्गुण-संपन्न सीता को प्रणाम करती हैं। वैसी सीता को जो भी देखते हैं, वे कभी उस सुन्दरता का पार नहीं पाते हैं, मानव समझते हैं, हाय ! हम देवताओं के समान निर्निमेष दृष्टि से नहीं देख सकते, और, देवता लोग समझते हैं कि हम अपनी इन दो आँखों से सीता के सौंदर्य को कैसे देख सकते हैं (अर्थात्, इसके लिए दो आँखें पर्याप्त नहीं हैं) ?

सीताजी के वे चंचल नयन हरिण को भी अपने सौंदर्य-गुण से मात करते हैं। विजयशील भाला और तलवार भी उन नयनों की छटा से परास्त हो जाते हैं, अन्य नारियों के नयनों के उपमान-भूत 'कयल' मीन भी उनसे डरते हैं। उस समय (रामचन्द्र के लिए) सीताजी, मंदर पर्वत के मथने से कल्लोलित समुद्र से उत्पन्न अमृत नहीं, परन्तु उस कन्यागृह के उस प्रासाद से उत्पन्न अमृत थीं।