कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 83, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ६१
उन तीनो ने मिथिला नगर की पण्यवीथि (बाजार) देखी, जहाँ दोनो ओर अपार रत्न, स्वर्ण, मोती, कवरी मृग के केश, अरण्य मे उत्पन्न अगुरु की लकड़ी, मयूर-पंख, हाथी के दाँत—इनके अवार लगे थे। वह हाट ऐसी लगती थी, जैसे कावेरी नदी हो, जिसके दोनों तटो पर कूपको ने मोती, अगुरु आदि एकत्र कर उनकी राशियाँ बना दी हो ।
उस नगर में रमणियाँ नुकीले और छोटे नाखूनवाले अपने कोमल कर-पल्लवों को दुखाती हुई वीणा की खूँटियो को घुमाती थी और प्रवहमाण मधु-धारा सदृश तन्त्रियो को कसती थी , वे अपने हाथ की उँगलियो के साथ मन को भी संलग्न करके. उज्ज्वल मदहास विखेरती हुई विस्पष्ट स्वर-युक्त संगीत-रूपी स्वच्छ मधु को पान कराती थी , उस संगीत का पान करते हुए वे तीनो आनंद से आगे बढ़ चले ।
कही उन्होने अतिवेग से दौड़ने हुए घोड़ो की पंक्ति देखी, जो कुम्हार के द्वारा घुमाये गये चाक के समान वर्त्तुल आकार में दौड़ रही थी। (वह पंक्ति) महा-पुरुषो की मित्रता के ही समान अटूट गतिवाली थी तथा ज्ञानियो की बुद्धि के सदृश एकाग्र थी । वे घोड़े ऐसे दौड़ते थे कि उनका आकार स्पष्ट नही दिखाई पड़ता था।
उन्होने ऊँचे प्रासादों के झरोखो में अनेक उदीयमान पूर्णचंद्र देखे, जो पने भाले-मन्मथ का धनुष, भ्रमर-कुल से संकुल नील केशों का जूड़ा—इनसे शोभायमान थे तथा दीर्घकाल का कलंक भी जिनसे मिट गया था।
उन्होने अनेक मनोहर कमल भी देखे, जो स्फटिक-चषको में भरे नवसुरभित मद्य का पान करके हास प्रकट करते हुए मस्ती से अर्थहीन वचन वकते थे और अपने प्रियतमो के प्रति मान करने जाकर हँस पडते थे।
[ उपर्युक्त दोनों पद्यों मे वारनारियो का वर्णन है । ]
वारनारियाँ गेंद खेल रही थी। शारीरिक सुख के साथ ही धन भी प्राप्त करने-वाली, सर्पफन-तुल्य जघनवाली वेश्याओ के मन के जैसे ही स्फटिकवर्णवाले, कंदुक भी अपना स्वाभाविक रंग छिपाते थे । वे ( कंदुक ) उनकी कज्जलांकित आँखों की छाया पड़ने से काले तथा उनकी लाल हथेलियो की छाया से लाल होते रहते थे ।
उन्होंने कई द्यूतशालाएँ भी देखी, जहाँ भाले-जैसी नुकीली आँखोवाली सुन्दर वेश्याएँ चौसर खेलती थी। वे अपने हाथ के कगन, कर्णाभरण, रत्नहार, कलिंगदेश की वनी अमूल्य चादर, मकरवीणा आदि को भी दाँव पर रख देती थी। (खेलते-खेलते थक जाने से) उनके पुष्पांलंकृत केशपाश शिथिल हो जाते थे और स्फटिक के बने कुत्ते के आकार की मुहरें उनकी हथेली की छाया से लाल दिखाई देती थी।
उस नगर में कई वावलियाँ भी थी, जिनमे अनुपम अंगोवाली सुन्दरियाँ आनंद से स्नान करती थी। उस समय वहाँ के कमल, नीलकमल, रक्तकुमुद, जल पर फैली हुई 'वल्लै' लता के पत्ते, नीलोत्पल, लाल-लाल 'किडै' (नामक पौधे), तरंगे, मीन आदि जलचरी वस्तुएँ (उनके अंगो की सुन्दरता देख) लज्जित हो, दुःख अनुभव करती थी।
कही तरुण पुरुष खड्ग चलाने का अभ्यास करते थे। उनकी भुजाओ पर चंदन-