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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 549 में से

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पृष्ठ 82

६८ कम्ब रामायण

डुबोता है, लेकिन वह बेचारा सीताजी के अवयवों के सौंदर्य को अंकित करने में सर्वथा असमर्थ हो हारकर रह जाता है; ऐसी अनुपम सुंदरी को अपने अंक में पाकर मिथिला नगरी अपने स्वर्णमय प्राचीरों के साथ ऐसी शोभायमान है, जैसे लक्ष्मी का निवासभूत कमल-पुष्प ही हो। ऐसी उस नगरी में वे तीनों प्रविष्ट हुए।

वे तीनों मिथिला की विशाल वीथियों से होकर जाने लगे, जहाँ चन्द्रोपम ललाट-वाली नारियों एवं पुरुषों के रत्नमय आभरण बिखरे पड़े रहते थे (समागम-काल में वे उन आभरणों को बाधाजनक पाकर उतारकर फेंक देते हैं), वे वीथियाँ देखने में ऐसी लगती थी, जैसे तमिल-भाषा के पिता (अगस्त्य) मुनिवर के पी जाने पर रत्नमय समुद्र का तल हो; या रात्रि के समय घने नक्षत्रों से जड़ा हुआ आकाश हो।

वे लोग वहाँ की वीथियों में जाने लगे, जहाँ लोहे के अंकुशों को भी तोड़ देने-वाले पर्वत-सदृश मत्तगज मद जल बहाते थे, जब उस मद-जल की धारा बह चलती थी, तब लगाम में रहनेवाले घोड़ों के मुँह से जो झाग गिरता था, उसके मिलने से उस धारा का रूप बदल जाता था। फिर, रथों के निरंतर दौड़ने से कीचड़ बनता था और अनन्तर (उनके सूखने के बाद) धूल फैल जाती थी। यों उन वीथियों की आकृति क्षण-क्षण में परिवर्तित होती रहती थी।

वे तीनों मिथिला की उन विशाल वीथियों में जाने लगे, जहाँ रति की वेला में मधुरभाषी रमणियों ने अपने पुष्प-हार फेंक दिये थे, जिन से मधु-धारा बह रही थी और जिनपर भ्रमर मँडरा रहे थे। वे मुरझाई हुई पुष्पमालाएँ उन कोमलांगी नारियों की जैसी ही लगती थीं, जो निरंतर तुल्यानुराग-भरे अपने प्रेमियों के साथ काम-समर कर चुकने पर अत्यंत श्रांत हो पड़ी रहती हैं।

उन्होंने मिथिला नगर की स्वर्णमय नृत्यशालाएँ देखीं, जिनमें 'याक्'१ (वीणा के जैसा एक तंत्री वाद्य) के घृत-मधुर तारों के नाद, मधुर कंठ से गाये हुए गीत, उँगली से छेड़े जानेवाली 'मकरवीणा' की ध्वनि — ये सब एक दूसरे में एकश्रुति होकर गुंजित होते थे और जहाँ अस्ति और नास्ति का संदेह उत्पन्न करनेवाली सूक्ष्म-कटि रमणियाँ नृत्य करती थीं, जिनके हाथों के मार्ग पर उनके नयन चलते तथा उनके नयनों के मार्ग पर उनके मन (के भाव) चलते थे।

उन्होंने देखा — मरकत-सदृश गुवाक (सुपारी) के वृक्षों में शुद्ध प्रवाल जैसे फल लगे हैं, उन वृक्षों में झूले लगे हैं, उन में सुन्दर नारियाँ झूल रही हैं, झूले बार-बार इधर से उधर और उधर से इधर आते जाते रहते हैं और यह स्मरण दिलाते हैं कि पापी जन भी इसी प्रकार पुन:-पुन: इस संसार में आते-जाते रहते हैं। उन रमणियों के पुष्पहारों पर से उड़े हुए भ्रमर गुंजार भरते हैं, मानो उनकी लचकती हुई सूक्ष्म कटियों पर दया उत्पन्न होने से वे चिल्ला उठे हों।


१ प्राचीन तमिल-साहित्य में चार प्रकार के याक्-वाद्य प्रसिद्ध हैं। उनके नाम हैं— (१) पेरियाक् (२) कमऱ्याक , (३) गोडयाक , (४) शगोडयाक , जिनमें क्रमश २१, १६, १४ और ७ तन्त्रियाँ होती थीं।—अनु०