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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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बालकाण्ड ६७

करुणा उत्पन्न हो। बीच में आये कष्टों को स्मरण करके दुःखी मत होओ। अब तुम अपने पति के आश्रम में जाओ। यों कहकर अहल्या के चरणों की वन्दना की।

आगे चलकर वे सब गौतम मुनि के आश्रम में जा पहुँचे; गौतम उन अतिथियों के आगमन से अत्यन्त हर्षित हुए और आगे बढ़कर आदर के साथ उनका स्वागत किया और सब प्रकार से उनका सत्कार किया। तब गाधिपुत्र ने उन तपस्वियों से कहा --

अंजनवर्ण (रामचन्द्र) की चरण-धूलि लगी नहीं कि अहल्या अपने पूर्व स्वरूप में खड़ी हो गईं; उसने अपने मन से कोई पाप नहीं किया था, अतः अब तुम उसे स्वीकार करो। गाधिपुत्र के ऐसा कहने पर ब्रह्मदेव के समान उन (गौतम) ने अहल्या को स्वीकार कर लिया।

सकल सद्गुणों से पूरित (रामचन्द्र) ने गौतम की परिक्रमा करके उनके चरण-कमलों को प्रणाम किया और अहल्या को उन्हें सौंप दिया। फिर, तपस्वी (विश्वामित्र) के साथ मिथिला नगरी के निकट जा पहुँचे और उसके मणिमय प्राचीर को देखा। (१--८६)


अध्याय १०

मिथिला-दर्शन पटल

प्रहरियों से सुरक्षित वह मिथिला नगरी अपनी ऊँची और मनोहर ध्वजा-रूपी हाथों को ऊँचा उठाये हुए है, मानो उस कमल-नयन (रामचन्द्र) को यह कहकर आह्वान कर रही हो कि 'सुनहली आभावाली लक्ष्मी मेरी तपस्या के प्रभाव से अपना निवास कमल-पुष्प को छोड़कर यहाँ अवतीर्ण हुई हैं, अतः आप शीघ्र आइए।'

उन्होंने देखा कि उस नगर के ऊँचे-ऊँचे प्रासादों पर सुंदर ध्वजाओं की पंक्तियाँ नृत्य कर रही हैं, वे ऐसी लगती हैं, मानो धर्मरूपी दूत से संदेश पाकर, अनुपम सुन्दरी जानकी का पाणिग्रहण करने के लिए योग्य वर (रामचन्द्र) को आते हुए देखकर, गगन-तल में अप्सराएँ आनन्द से नाच रही हों।

उस नगर में कहीं दो मत्त गज आपस में टकरा रहे हैं, जो दो पहाड़ों के जैसे दीखते हैं, जिनके बड़े-बड़े श्वेत दंत वज्र के समान हैं और जिनकी आँखों से कोपाग्नि निकल रही है, मानों प्रेमी दंपति मन्मथ के बाणों से विद्ध होकर (एक दूसरे से) मिलने चले हों और इतने में प्रणय-कलह में लग गये हों।

उन्होंने देखा कि जब सूर्य अस्तंगत होने लगता है, तब वहाँ का आकाश क्षीर-सागर के जैसा दीख पड़ता है, ऊँचे प्रासादों पर उड़नेवाली ध्वजाएँ मेघों का स्पर्श करती हुई गीली होती रहती हैं और साथ-साथ मेघों के समान ही फैले हुए अगरु धूम के स्पर्श से सूखती भी रहती हैं।

मन्मथ सीता देवी का चित्र खींचना चाहता है और अमृत में अपनी लेखनी