भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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बालकाण्ड - ६५

उनके नृत्यों के साथ संगीत तथा मृदंग-ताल की ध्वनियाँ होती रहती है, जिन (शब्दों) से भड़ककर भैंसें भागकर नदियों में जा गिरती हैं, जिनके कारण (पानी में) उथल-पुथल उत्पन्न हो जाती है, जिससे मीन उछल-उछलकर तट पर के नारियल, गुवाक (सुपाड़ी) आदि वृक्षों के पत्तों पर जा गिरते हैं।

वहाँ के सरोवरों में कोमलांगी सुन्दरियाँ (जब) भाले-सदृश अपनी आँखें मीच-कर और जलमग्न होकर ऊपर उठती हैं, तब वे क्षीर-सागर के मथने के समय जल से ऊपर उठती हुई लक्ष्मी देवी का दृश्य उपस्थित करती हैं। उनके करों के श्वेत कंगन वहाँ के जल-पक्षियों के साथ बोल उठते हैं। उन सरोवरों में भ्रमर सुगंधित पुष्प की कलियों को भेदकर भीतर पहुँचते हैं तथा मधुपान करके मत्त रहते हैं।

इस प्रकार के मिथिला देश में वे तीनो जा पहुँचे और प्राचीरों से आवृत, ऊँची ध्वजाओं से अलंकृत उस मिथिला नगर के बाहर आकर ठहरे। वहाँ एक उजड़े हुए स्थान में उन्होंने एक ऊँचा प्रस्तर पड़ा देखा, जो गृहस्थ-धर्म से च्युत होकर अभिशप्त हो पड़ी रहनेवाली गौतम-पत्नी अहल्या का ही रूप था।

उस प्रस्तर पर काकुत्स्थ (श्रीरामचन्द्र) की चरण-धूलि जा लगी, तुरन्त ही वह (अहल्या देवी) प्रस्तर-रूप छोड़कर अपना पूर्व स्वरूप धारण करके उठ खड़ी हुईं, जैसे कोई नर, अविद्या-मोह को मिटानेवाला तत्त्वज्ञान पाने पर मायावृत रूप छोड़ दे और यथार्थ आत्म-स्वरूप को पहचान ले और भगवान् के चरणों को प्राप्त हो जाय। महामुनि (विश्वामित्र) कहने लगे—

गगन से भूतल पर गंगा को ले आनेवाले भगीरथ के वंश में उत्पन्न (रामचन्द्र) ! यह विद्युत्-समान नारी, जो अत्यन्त आनन्द के साथ एक ओर खड़ी है, उस गौतम मुनि की पत्नी अहल्या है, जिस (मुनि) ने पापकर्म करनेवाले देवेन्द्र को सहस्र रक्त-वर्ण नेत्र दिये थे।

सुनहली जटावाले (विश्वामित्र) का कथन सुनकर, पंकज पर विद्युत्-द्युति के साथ आसीन लक्ष्मी के वल्लभ (रामचन्द्र) ने आश्चर्य से कहा—इस संसार की भी कैसी प्रकृति है ? इस प्रकार की घटनाएँ क्यों होती हैं ? क्या ये पूर्वजन्मों के कर्मों का परिणाम हैं अथवा उन कर्मों के अतिरिक्त कोई और भी कारण है ? संसार की माता-सदृश अहल्या की ऐसी दशा क्यों हुई ?

रामचन्द्र की बात सुनकर ज्ञानी (विश्वामित्र) ने कहा—शुभाश्रय ! सुनो, पुराने समय में वज्रधारी इन्द्र कभी दुर्गुण-रहित संयमी गौतम महर्षि की मृग के समान नयनोंवाली पत्नी अहल्या के सौंदर्य पर मुग्ध हुआ और उसके स्तनों का स्पर्श प्राप्त करना चाहा।

अहल्या के नयन-रूपी भाले तथा मन्मथ के बाण इन्द्र को पीड़ित करने लगे। उसने सोचा, किसी भी उपाय से अहल्या की संगति प्राप्त करनी चाहिए ; एक दिन उसने कामांध होकर गौतम मुनि से अहल्या को पृथक् किया और सत्य-स्वरूप गौतम का वेष धारण कर उसके पास जा पहुँचा।