कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 71, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ९
अहल्या पटल
वे तीनो ( महर्षि विश्वामित्र एव राम-लक्ष्मण ) शोण ( सोन १ ) नदी-रूपी नारी के निकट जा पहुँचे । विविध रत्नो ( से सुशोभित ) तथा चंदन, अगरु आदि सुगंध-द्रव्यो से सुरभित सिकता-राशि ही उस शोण-रमणी के स्तन थे, सुकोमल लताएँ उसकी कटि थी, ( भ्रमर-कुल से ) गुंजरित नव विकसित पुष्प-पंक्तियाँ उसकी मेखला बनी थी उस स्थान मे फैली हुई काली मिट्टी उसके केशपाश थी ; निकटस्थ पर्वतो की परिक्रमा करती हुई उसकी जो नहरे बह रही थी, वे उसके नूपुर थे । इस प्रकार, वह नदी-नारी शोभायमान थी ।
ज्यो ही वे तीनो शोण नदी के तट पर पहुँचे, त्यो ही सूर्य भी अस्त हो गया, मानो वह अगले दिन प्रातःकाल उदित होते समय उन तीनो को शीतलता पहुँचाना चाहता हो और अपनी स्वाभाविक उष्णता को शात करने के लिए, अरुण ¹ के नयनो से भी तीव्र गति से जानेवाले अपने घोड़ो-सहित, पश्चिम सागर मे डूब गया हो ।
( पक्षियो के ) कलरव से भरे सरोबरो मे सुरभिमय दीर्घ नालवाले बड़े कमल-पुष्प खिले हैं, जो ( प्यासे भ्रमरो को तृप्त करने के कारण ) धर्म के आलय-स्वरूप हैं । वे कमल सूर्यास्त होते ही अपने दल-कपाटो को बंद कर लेते हैं, तो आश्रय की खोज में विलंब से आये हुए मस्त भ्रमर अपनी भ्रमरियो के साथ, उन पुष्पो से लौट जाते हैं ओर शोण नदी के तीरस्थ सुगंधित पुष्प-भरे उद्यानो में विश्राम पाते हैं । वे तीनो रात्रि में विश्राम करने के लिए उसी उद्यान में प्रविष्ट हुए ।
श्रीराघव ने विश्वामित्र से प्रश्न किया—यह कैसा उद्यान है ? तपस्वी एव कर्म-बंधन से विमुक्त ( विश्वामित्र ) महर्षि ने उत्तर दिया—पुरातन काल मे काश्यप महर्षि की पत्नी दिति ने अपने असुर-पुत्रो के शोक मे इसी स्थान में तप किया था ।
[ यहाँ से आगे २५ पद्यों में इस उद्यान का इतिहास वर्णित है । ]
कालमेघ की समता करनेवाले मेरे ( लेखक के ) स्वामी ( महाविष्णु ) इस अडगोल से परे परमपद स्थान मे रहते हैं । एक विद्याधर-स्त्री उस परमधाम मे पहुँच गई और पुडरीक के कोमल आवास मे रहनेवाली लक्ष्मी का स्तवन किया । लक्ष्मी देवी ने प्रसन्न होकर एक पुष्पहार उस विद्याधर-रमणी को दिया, जो पुष्पमधु से पूरित एव भ्रमरो से युक्त थे ।
उस विद्याधर-कन्या ने लक्ष्मी देवी के प्रसाद-भूत उस पुष्पहार को अपनी वीणा मे बाँध लिया और ब्रह्मलोक को लौट आई । इसी समय अतिक्रोधी दुर्वासा मुनि उसके सम्मुख आये । उन्होने उस कन्या को लक्ष्मी देवी की भक्ता जानकर उसके चरणो की वंदना की ।²
१. 'अरुण' सूर्य के सारथी का नाम है ।
२ दक्षिण मे वैष्णव अपने को भगवान तथा भगवान के भक्तो का भी दास मानते हैं । विद्याधरी विष्णु की भक्तिन होने के कारण दुर्वासा के लिए भी वंदनीय थी ।