कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 70, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ | कंब रामायण
लक्ष्मी के प्रियतम (श्रीराम) के दिव्य अस्त्रों ने भयंकर ताड़का से उत्पन्न दोनों वीरों में प्रथम मारीच को समुद्र में फेंक दिया और दूसरे सुबाहु को यमलोक में पहुँचा दिया।
पुष्पगुच्छों की मालाओं से सुशोभित (रामचन्द्र) ने जो बाण बरसाये, उन बाणों से क्षण-भर में मार्ग अन्तरिक्ष भर गया। (बचे हुए राक्षस) यह सोचकर कि ये दोनों राघववीर अब लाशों के पर्वत पर चढ़कर हमें (जीवित) पकड़ लेंगे, अहमहमिका से (आपस में चढ़ा-ऊपरी करते हुए) वहाँ से भाग चले।
वज्र के समान भयंकर राम के बाण भागते हुए राक्षसों का पीछा करते हुए चले, तब उन राक्षसों की शिरोहीन धड़ें तड़प-तड़पकर नाचने लगीं, भूत-पिशाच भी, जो शव-भक्षण करने आये थे, मेरे (लेखक के) प्रभु (रामचन्द्र) का यश गाने लगे, मांसभक्षी पक्षियों का एक चंदोवा-सा वहाँ तन गया।
(देवताओं से की गई) पुष्पवर्षा (उन पक्षियों के) चंदोवे को चीरती हुई नीचे बरस पड़ी, गगन में मेघों के समान दुंदुभि गरज उठी, इन्द्रादि देवता एकत्र हो गये और सुन्दर धनुर्धारी (रामचन्द्र) की जय-जयकार करने लगे।
पावन तपस्वियों ने आशीष-रूपी पुष्पों की वर्षा की तथा उस कानन के वृक्षों ने भी पुष्पों की वर्षा की। विश्वामित्र ने उसी समय अपना यज्ञ यथाविधि समाप्त किया और मुदित मन से (रामचन्द्र से) ये बातें कहीं—
सभी भुवनों का सर्जन करनेवाले तथा (प्रलय के समय) उन्हें अपने उदर में रख-कर उनकी रक्षा करनेवाले तुम्हीं हो। आज तुमने मेरे इस छोटे-से यज्ञ की रक्षा की। मैं यही मानता हूँ कि यह सब मेरे पुण्यों का फल है, नहीं तो इस छोटे-से यज्ञ की रक्षा तुम्हारे लिए कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं है।
(दूसरे दिन प्रातःकाल) पुष्पों से भरे उस वन में, अपूर्व तपस्याशील अनेक ऋषियों के साथ निवास करनेवाले, पर्वत-समान सद्गुणों से पूर्ण विश्वामित्र के सम्मुख कौसल्या-पुत्र उपस्थित हुए और प्रणाम करके पूछा—'आज मैं आपकी क्या सेवा करूँ? आज्ञा दीजिए।'
'हे पुत्र, यदि मैं किन्हीं कार्यों को दुःसाध्य समझकर तुम से करने के लिए कहता भी हूँ, तो वे तुम्हारे लिए दुःसाध्य नहीं होते। अभी (कुछ) बड़े कार्य करने बाकी हैं, जिन्हें बाद में किया जा सकता है। अभी हम विशाल और जल-सम्पन्न खेतों से घिरे हुए मिथिला नगर में जायेंगे और वहाँ जाकर महाराज जनक से किये जानेवाले यज्ञ का संदर्शन करेंगे। चलो।' विश्वामित्र के यह कहते ही तीनों चल पड़े। (१—५६)