कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ५५
मुनिवर के निकट जाकर पूछा—'हे अवर्णनीय गुण-विभूषित मुने ! आपने जिन अत्याचारी राक्षसों के सम्बन्ध में कहा था, वे कब आयेंगे ?'
विश्वामित्र मौन व्रत धारण किये हुए थे, इसलिए कुछ उत्तर नहीं दिया। युद्ध-निपुण कुमार उन्हें प्रणाम करके यज्ञशाला से बाहर आये और आकाश की ओर देखा। वहाँ (आकाश में) राक्षस लोग वर्षाकाल के काले मेघों के समान गर्जन कर रहे थे, जिसे सुनकर वज्र भी डर जाय।
उन राक्षसों ने बाण चलाये, भाले फेंके, आग और पानी बरसाये, बड़े-बड़े पहाड़ उखाड़कर फेंके, निन्दा-वचन कहे, डराया, धमकाया; कुठार, परशु आदि आयुधों का प्रयोग किया; एक नहीं, ऐसे अनेक माया-कृत्य किये।
(राक्षसों द्वारा) क्रोध के साथ फेंके हुए आयुधों से, जिनमें (मारे गये) प्राणियों के मांस लगे हुए थे, प्रलय-काल की वर्षा के समान सारा वन-प्रदेश ढक गया। चारों ओर से राक्षस-सेना घिर आई और आकाश पर छा गई। (यह दृश्य ऐसा था) मानो मछलियों से भरे हुए लहराते समुद्र ने ही गगन को ढक लिया हो।
राक्षस-सेनाएँ, जिनमें बाण एवं चमकनेवाले खड्ग बहुत ही घने दिखाई दे रहे थे, मारू बाजा बजाती हुई संचरण कर रही थीं, मानो वे प्रलय-काल में उठी हुई तथा गर्जन करनेवाली अनुपम घटा ही हों।
राक्षसों के मुँह के दोनों ओर वराहदन्त निकले हुए थे, वे क्रोध से ओठ चबा रहे थे, उनके बाल रक्तवर्ण थे और नेत्रों से चिनगारियाँ निकल रही थीं। इस प्रकार के उन राक्षसों की ओर संकेत करके रामचन्द्र ने लक्ष्मण से कहा—'जटाधारी मुनि ने जिन राक्षसों के विषय में कहा था, वे ये ही हैं।
उन राक्षसों के आते ही क्रोध से अग्नि-ज्वाला बिखेरते हुए लक्ष्मण ने आँखों के कोरों से गगन की ओर देखा और फिर अपने धनुष की ओर देखा, फिर राम को प्रणाम करके कहा—'अभी इसी स्थान पर आप इन राक्षसों को टुकड़े-टुकड़े होकर गिरते हुए देखेंगे।
धूम्रवर्ण एवं शूलधारी राक्षस कहीं होमकुण्ड की अग्नि में मांस और रक्त न डाल दें, यह सोचकर कमललोचन (राम) ने अपने शरों से उस मुनि-श्रेष्ठ के निवास के ऊपर एक दूसरी छत-सी बना डाली।
क्षीरसागर के मथते समय उसमें से हलाहल विष निकलकर जब सृष्टि का विनाश करने लगा था, तब देवता लोग जिस प्रकार भयभीत हो चन्द्रचूड़ (शिव) की शरण में गये थे, उसी प्रकार महा तपस्वी मुनि भी वञ्चकराक्षसों से भयभीत हो रामचन्द्र से बोले—'हे अंजनवर्ण ! हम आपकी शरण में हैं, हमें अभय दान दीजिए।'
तब कमललोचन (राम) ने यह कहकर कि आपलोग व्याकुल मत होइए—उन्हें अपनी भुजाओं की छाया में ले लिया और अपने धनुष की दिव्य प्रत्यचा को अपने कान तक खींचकर मारे भूतल को (उन राक्षसों के) रक्त का समुद्र बनाया और उनके सिरों के पहाड़ बनाये।