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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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कम्ब रामायण

हे सद्गुणहीन शुक्र, दान देते समय बाधा डालनेवाले निष्ठुर ! किसी याचक को देने के पूर्व 'मत दो' कहकर किसी दाता को रोकना क्या तुम्हे शोभा देता है ? तुम्हारे इस कार्य से तुम्हारे बन्धु भी वस्त्र और अन्न से वंचित हो जायेंगे।

इस प्रकार कहकर महाबलि ने शुक्राचार्य के सभी वचनो को यह समझकर कि मन्त्री कठोर हृदयवाला है, अस्वीकार कर दिया और (वामन से) यह कहते हुए कि तुम्हीं तीन पग (भूमि) नापकर ले लो, उस वामन के छोटे-से हाथ में जल दे दिया।

सरोवर का स्वच्छ जल ज्यो ही वामन के हाथ में गिरा, त्यो ही वह वामन-मूर्ति, जिसका बौनापन उसके माता-पिता की भी घृणा का विषय हो सकता था, इस प्रकार गगन तक ऊँचा चढ गया कि सामने खडे रहकर उसे देखनेवाले लोग विस्मय और भय मे डूब गये। वह उसी प्रकार बढता चला गया जिस प्रकार उत्तम पात्र को दिये गये दान का फल बढता चला जाता है।

उस बौने का जो पग धरती पर रहा, वह समस्त विश्व पर छा गया और धरती के छोटी होने के कारण और आगे नही फैल सका। दूसरा पग जो गगन-भर मे छाकर स्वर्गलोक को भी पार कर गया था, आगे बढने के लिए और स्थान न पाने के कारण लौट पडा।

समस्त भूतल और गगन-मडल को अपने दो पगो के अन्तर्गत कर लेने के कारण तीसरे पग के लिए स्थान ही बाकी न रहा। उस तीसरे पग के लिए भक्त महाबलि का सिर ही स्थान बना। हे धनुष-शोभित भुजावाले (रामचन्द्र) ! तुलसी-माला से विभूषित सिर-वाले विष्णु (सचमुच) बहुत छोटे हैं।¹

यज्ञरूप विष्णु ने तीनो लोको का राज्य इन्द्र का स्वत्व कहकर उसे दे दिया और स्वयं क्षीरसागर मे जाकर शयन करने लगे, जहाँ उनके भुवनव्यापी चरण लक्ष्मी देवी के कर-स्पर्श से लाल दिखाई देते हैं।

कर्मबन्धनो को समूल नष्ट करनेवाले (रामचन्द्र) ! इस उपवन मे विष्णु भगवान् ने तपस्या की थी, अत. जो भक्ति-श्रद्धा के साथ इस प्रदेश के दर्शन करते हैं, वे फिर जन्म नही ग्रहण करेगे। वेदोक्त विधि से यज्ञ करने के निमित्त मेरे लिए इस आश्रम से बढकर अन्य कोई उचित स्थान नही है।

इसी स्थान में रहकर मैं अपना यज्ञ करूँगा, यह कहकर विश्वामित्र उस सुन्दर उपवन में पहुँचे और यज्ञ के उपकरण एकत्र करके, रमणीय रूप-विशिष्ट राम तथा लक्ष्मण को रक्षा के लिए नियुक्त करके, अपना यज्ञ करने लगे।

देवताओं को उद्दिष्ट करके विश्वामित्र ने छह दिनो तक ऐसा यज्ञ किया, जो दूसरो के लिए दुष्कर था भूमि की रक्षा करनेवाले दशरथ चक्रवर्ती के उन दोनो कुमारो ने उस यज्ञ की रक्षा इस प्रकार की, जैसे पलकें नेत्रों की रक्षा करती हैं।

यज्ञ की रक्षा करते हुए वृषभ-समान बली उन दोनों कुमारों में से ज्येष्ठ ने सर्वज्ञ


¹ भाव यह है कि भगवान के चरण संसार के लिए बहुत बड़ा होने पर भी भक्तों के सिर के सामने बहुत छोटा बन जाता है।