कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ५३
पौरुषवान् महावलि की बात सुनकर सर्वज्ञ वामन ने कहा—तुमने याचकों की इच्छा से भी अधिक दान दिये हैं। (इसलिए) हे दीर्घ करवाले ! अब याचक बनकर तुम्हारे समीप जो आये, वही महान् है और जो न आये, वह कैसे महान् हो सकता है ?
यह सुनकर महावलि आनन्दित हुआ और उत्तर में उसने पूछा—कहिए अब, आपके लिए मैं क्या करूँ ? महावलि के इतना कहते ही वामन ने कहा—यदि दे सको, तो तीन पग भूमि-मात्र मुझे दो । वामन के 'दो' कहने के पूर्व ही बलि ने कहा—'दिया ।' इतने में शुक्राचार्य ने उसे रोका ।
(शुक्र ने कहा ) राजन् ! जिस वामन-रूप को हम मागने देख रहे हैं, यह छल-मात्र है । यह मत सोचो कि जल-भरे मेघ-सदृश नीलवर्णवाला यह वामन साधारण मनुष्य है । यह वह पुरुष है, जिसने कभी सभी अंडो को तथा ( उनमें रहनेवाले ) सभी वस्तु-समूह को निगल लिया था। इस मर्म को समझो ।
(बलि ने कहा) आप यह नहीं देख रहे हैं कि मेरा कर दान देने के लिए ऊपर उठा हुआ है और मेरे सम्मुख जलसमृद्ध मेघ जैसे विष्णु का कर दान लेने के लिए नीचे फैला हुआ है, जो उनकी महत्ता के अनुकूल नहीं है । अब इससे बढ़कर मेरा गौरव और क्या हो सकता है ?
आदर-योग्य, सन्मार्ग बतानेवाले धर्मशास्त्रों के ज्ञाता (दान देते समय ) यह नहीं सोचते कि यह (दान माँगनेवाला ) अपना है या पराया, वे तो यह कहते हैं कि मेरे इस दान को कोई उत्तम व्यक्ति आगे बढ़कर ग्रहण करे । इस वामन के समान योग्य व्यक्ति और कौन हो सकता है ?
आप वेल्ली¹ कहलाते हैं, इसलिए आपने इस प्रकार कहा । उत्तम नर याचकों के सभी अभीष्टों को पूर्ण करते हैं । यदि कोई उनके प्राण भी माँगे, भले ही किसी याचक के लिए ऐसा दान माँगना अनुचित है, तो वे अपने प्राणों का भी दान कर देते हैं।
हे पितृ-तुल्य ! संसार में प्राण-रहित लोग (वास्तव में ) मृत नहीं हैं; परन्तु जो प्राणों का त्याग न करते हुए भी दूसरों से याचना करते हैं, वे ही मृत हैं । जो शरीर त्याग कर मृत कहलाते हैं, वे मृत होने पर भी यदि दानी हों, तो अमर बन जाते हैं । ऐसे दानियों के सिवा संसार में कौन जीवित रहने योग्य हैं ?
वे (वास्तव में) शत्रु नहीं होते, जो उत्तरोत्तर बढ़नेवाली हानि उत्पन्न कर देते हैं । दानियों के सच्चे शत्रु वे ही होते हैं, जो दान देते समय उनको रोकते हैं। वे दूसरों की ही नहीं, प्रत्युत अपनी भी हानि करते हैं। दाता को दान देने से रोकने के समान पापकृत्य दूसरा नहीं है।
(धर्मशास्त्रों के ) वचनों के अनुसार जब संपत्ति अपने वश में रहती है, तब दान देना चाहिए और इस लोक में यश तथा उस धर्म का फल—पुण्य भी प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रकार प्रयत्न करनेवालों के अंतरंग शत्रु वे लोग ही होते हैं जो यह कहकर उन्हें दान देने से मना करते हैं कि 'लोभ-गुण का त्याग मत करो।'
१ तमिल में वेल्ली का अर्थ 'शुक्र' तथा 'अज्ञान' दोनों होते हैं।