कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 66, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५२ | कंब रामायण |
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वियोग नही सह सकी। वह भी नदी का रूप धारण कर पति की अनुगामिनी हुई। तपस्वियो में प्रधान ऋचीक मुनि ने उसे देखकर आशीर्वाद दिया कि तुम इसी भूतल पर रहो, जिससे भूतलवासी तुमसे (तुममें स्नान करके) अपने दुःख मिटा सकें और ब्रह्मलोक प्राप्त कर सके।
मेरी ही ज्येष्ठ वहन कौशिकी इस महान् नदी के रूप में भूतल पर रह रही है।" विश्वामित्र से यह कथा सुनकर वह उत्तम कुमार (राम) तथा उनके अनुज लक्ष्मण आश्चर्य में पड़ गये। कुछ दूर आगे जाने पर उन्हें एक उपवन दिखाई दिया, जहाँ मेघ आकर विश्राम करते थे; उनके पूछने पर कि यह कौन-सा उपवन है ? महान् तपस्वी विश्वामित्र कहने लगे—
यह उपवन उतना ही विशुद्ध है, जितना उन नारियो का मुख होता है, जो अपने पति के अतिरिक्त अन्य किमी दैव या तपस्या को नही मानती। और सुनो, अरुण-नयनों-वाले श्रीविष्णु, जिनका स्वरूप चार वेदो, देवताओ तथा मुनियो के लिए भी अज्ञेय है, कभी इस स्थान मे रहकर तपस्या करते थे।
भूलोक तथा देवलोक के निवासी बधनो से मुक्त होने के लिए जिसका नाम जपते हैं और जिनकी माया के रहस्य को कोई भी नही जान पाता, वही प्रसिद्ध अमल मूत्तिं (विष्णु) ने इस स्थान पर एक सौ कल्प तक घोर तपस्या की थी।
जिस समय वे इस उपवन में तप कर रहे थे, उस समय महावलि नामक एक राजा ने स्वर्ग और भूलोक दोनो को अपने अधीन कर लिया। वह महाबलि उस महावराह के समान बलवान् था, जिसने इस भूतल को अपने एक वक्र दन्त पर अनायास ही उठा लिया था।
'ससार में उसको कोई भी पराजित कर सकेगा', ऐसी शका से मुक्त होकर, तपस्या में निरत उस चक्रवर्त्ती ने ऐसा एक महायज्ञ सपन्न करने का निश्चय किया, जो देवताओ के लिए भी असाध्य हो और जो घृत आदि होम-द्रव्यों से सपूर्ण हो। उसने निश्चय किया कि वह उस यज्ञ मे अपनी भूमि तथा अन्य सभी सपत्ति ब्राह्मणो को दे देगा।
देवो ने जब इस यज्ञ का समाचार सुना, तब इस उपवन मे आये। यहाँ तपस्या में निरत विष्णु को प्रणाम करके प्रार्थना की कि हे भगवन्! आप उस अत्याचारी महावलि के दुष्कृत्यो को रोकिए। विष्णु ने भी ऐसा करने की सम्मति दे दी।
नीलवर्ण तथा सद्गुणो मे विभूषित विष्णु, त्रिकालज्ञ कश्यप और अदिति के पुत्र के रूप मे अवतरित हुए। वे वामन-रूप मे थे, जसे एक बड़े वटवृक्ष को अपने भीतर छिपाये हुए एक छोटा-सा बीज हो।
अद्भुत गुणो एव कार्यों से युक्त (विष्णु), हाथ में अग्नि लिये हुए एक वामन का रूप धारण करके चले। इसका तत्त्व केवल ज्ञानी ही जानते हैं, उनकी यह आकृति ब्रह्मा के ज्ञान-स्वरूप ही थी।
सभी लोकों को जीतनेवाले महावलि ने जब यह समाचार सुना कि एक वामन मूत्तिं उसके यहाँ आये हैं, तब वह आश्चर्य-चकित हो गया; उसने उठकर उनका स्वागत किया और कहा—हे परिपूर्ण। आपसे श्रेष्ठ ब्राह्मण समार में दूसरा नही है, आपके दर्शन पाकर मैं कृतार्थ हो गया।