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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 549 में से

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बालकाण्ड ५१

'मानस (मानस-सरोवर) से निकलनेवाली (और इसीलिए) सरयू' कहलाने-वाली, देवताओं से भी प्रशंस्यमान नदी यहाँ बहती है, जिसमें गोमती नामक नदी आकर मिलती है; उन दोनों के मिलने से ही यह ध्वनि उत्पन्न होती है।' उनके (विश्वामित्र के) यह कहने पर तीनों आगे बढे और भवसागर से पार उतारनेवाली एक पवित्र नदी के पास पहुँचे।

उस महानुभाव ने विश्वामित्र से पूछा कि हे देवगण से स्तुत्य मुनि ! यह बड़ी पावन नदी कौन-सी है ? वे बोले—"कमलासन ब्रह्मा ने प्राचीन काल में कुश नामक एक प्रतापी तथा गुणशील राजा को जन्म दिया था। उसके अपनी धर्मपत्नी से चार पुत्र हुए। उनके नाम थे—कुश, कुशनाभ, सद्गुणविशिष्ट आधूर्त्त और जयशील वसु। इनमें से कुश कौशांबी नगर में, कुशनाभ महोदय नामक नगर में, आधूर्त्त दोषहीन धर्मवन नामक नगर में और वसु गिरिव्रज नामक नगर में राज करते थे।

उनमें से कुशनाभ के एक सौ लड़कियाँ उत्पन्न हुईं, जो मिष्टभाषी, सुन्दर होठो-वाली और सद्गुणो मे विभूषित थी। वे जब सयानी हुईं, तब एक दिन अपनी सखियो के साथ क्रीडा करती हुई एक उपवन मे जा पहुँची। उसी समय वायुदेव वहाँ आये और उनके सौन्दर्य पर मुग्ध होकर उन कन्याओ से कहा --

'हे आम की फाँक के समान नुकीले नयनयुक्त कन्याओ! मैं मकरकेतु (मन्मथ) के झुके हुए धनुष से निकले हुए पुष्प-बाणो से विद्ध हो गया हूँ, (अतः) तुमलोग मुझसे विवाह कर लो।' तब उन कन्याओं ने उत्तर दिया कि आप जाकर हमारे पिता से यह बात कहें, यदि वे कन्यादान करके हमे आपकी पत्नी बनायेंगे, तो हम आपके संग जा सकती हैं। यह सुनकर वायुदेव बहुत क्रुद्ध हुए और उनकी पीठों को तोड़कर उन्हे कूबड बना दिया, जिससे सुन्दर प्रकाशमान कंकण पहनी हुई वे कन्याएँ धरती पर गिर पड़ीं।

जब वायुदेव चले गये, तब वे कन्याएँ किसी प्रकार घिसटती हुई अपने पिता के पास पहुँची और करुणा-भरी वाणी में सारा वृत्तात कह सुनाया, राजा ने उन दीर्घ केशोंवाली अपनी कन्याओ को आश्वासन दिया और महान् तपस्वी चूलि के पुत्र ज्ञानी ब्रह्मदत्त से उनका विवाह कर दिया।

उस ब्रह्मदत्त के कर-कमल का स्पर्श पाते ही उनका कूबड़ मिट गया और उन्होने अपना पूर्व सौन्दर्य प्राप्त कर लिया। पूरी पृथ्वी पर शासन करनेवाले कुशनाभ ने अपुत्र होने के कारण मुनियो की सहायता से एक यज्ञ किया। उस यज्ञकुण्ड के मध्य से गाधि नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसकी तीव्रगामी अश्वसेना (प्रसिद्ध) हुई।

कुशनाभ गाधि को राज्य देकर स्वर्ग सिधारा, प्रसिद्ध महोदय नगर मे राज्य करनेवाले गाधि के मै और मुझसे पहले कौशिकी नामक एक कन्या उत्पन्न हुई। राजाओ के राजा गाधि ने कौशिकी का विवाह भृगु महर्षि के पुत्र ऋचीक के साथ कर दिया, जिनकी तपस्या की समानता स्वयं उनके पिता भी नही कर सकते थे। वह वेदज्ञ कुछ समय तक धर्म, अर्थ और काम को सम्पन्न कर फिर बड़ी तपस्या करके ब्रह्मलोक को प्राप्त हुए।

जब कौशिकी का प्रिय पति उसको छोड़कर स्वर्ग चला गया, तब वह पति-

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