कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
बालकाण्ड ५१
'मानस (मानस-सरोवर) से निकलनेवाली (और इसीलिए) सरयू' कहलाने-वाली, देवताओं से भी प्रशंस्यमान नदी यहाँ बहती है, जिसमें गोमती नामक नदी आकर मिलती है; उन दोनों के मिलने से ही यह ध्वनि उत्पन्न होती है।' उनके (विश्वामित्र के) यह कहने पर तीनों आगे बढे और भवसागर से पार उतारनेवाली एक पवित्र नदी के पास पहुँचे।
उस महानुभाव ने विश्वामित्र से पूछा कि हे देवगण से स्तुत्य मुनि ! यह बड़ी पावन नदी कौन-सी है ? वे बोले—"कमलासन ब्रह्मा ने प्राचीन काल में कुश नामक एक प्रतापी तथा गुणशील राजा को जन्म दिया था। उसके अपनी धर्मपत्नी से चार पुत्र हुए। उनके नाम थे—कुश, कुशनाभ, सद्गुणविशिष्ट आधूर्त्त और जयशील वसु। इनमें से कुश कौशांबी नगर में, कुशनाभ महोदय नामक नगर में, आधूर्त्त दोषहीन धर्मवन नामक नगर में और वसु गिरिव्रज नामक नगर में राज करते थे।
उनमें से कुशनाभ के एक सौ लड़कियाँ उत्पन्न हुईं, जो मिष्टभाषी, सुन्दर होठो-वाली और सद्गुणो मे विभूषित थी। वे जब सयानी हुईं, तब एक दिन अपनी सखियो के साथ क्रीडा करती हुई एक उपवन मे जा पहुँची। उसी समय वायुदेव वहाँ आये और उनके सौन्दर्य पर मुग्ध होकर उन कन्याओ से कहा --
'हे आम की फाँक के समान नुकीले नयनयुक्त कन्याओ! मैं मकरकेतु (मन्मथ) के झुके हुए धनुष से निकले हुए पुष्प-बाणो से विद्ध हो गया हूँ, (अतः) तुमलोग मुझसे विवाह कर लो।' तब उन कन्याओं ने उत्तर दिया कि आप जाकर हमारे पिता से यह बात कहें, यदि वे कन्यादान करके हमे आपकी पत्नी बनायेंगे, तो हम आपके संग जा सकती हैं। यह सुनकर वायुदेव बहुत क्रुद्ध हुए और उनकी पीठों को तोड़कर उन्हे कूबड बना दिया, जिससे सुन्दर प्रकाशमान कंकण पहनी हुई वे कन्याएँ धरती पर गिर पड़ीं।
जब वायुदेव चले गये, तब वे कन्याएँ किसी प्रकार घिसटती हुई अपने पिता के पास पहुँची और करुणा-भरी वाणी में सारा वृत्तात कह सुनाया, राजा ने उन दीर्घ केशोंवाली अपनी कन्याओ को आश्वासन दिया और महान् तपस्वी चूलि के पुत्र ज्ञानी ब्रह्मदत्त से उनका विवाह कर दिया।
उस ब्रह्मदत्त के कर-कमल का स्पर्श पाते ही उनका कूबड़ मिट गया और उन्होने अपना पूर्व सौन्दर्य प्राप्त कर लिया। पूरी पृथ्वी पर शासन करनेवाले कुशनाभ ने अपुत्र होने के कारण मुनियो की सहायता से एक यज्ञ किया। उस यज्ञकुण्ड के मध्य से गाधि नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसकी तीव्रगामी अश्वसेना (प्रसिद्ध) हुई।
कुशनाभ गाधि को राज्य देकर स्वर्ग सिधारा, प्रसिद्ध महोदय नगर मे राज्य करनेवाले गाधि के मै और मुझसे पहले कौशिकी नामक एक कन्या उत्पन्न हुई। राजाओ के राजा गाधि ने कौशिकी का विवाह भृगु महर्षि के पुत्र ऋचीक के साथ कर दिया, जिनकी तपस्या की समानता स्वयं उनके पिता भी नही कर सकते थे। वह वेदज्ञ कुछ समय तक धर्म, अर्थ और काम को सम्पन्न कर फिर बड़ी तपस्या करके ब्रह्मलोक को प्राप्त हुए।
जब कौशिकी का प्रिय पति उसको छोड़कर स्वर्ग चला गया, तब वह पति-
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वियोग नही सह सकी। वह भी नदी का रूप धारण कर पति की अनुगामिनी हुई। तपस्वियो में प्रधान ऋचीक मुनि ने उसे देखकर आशीर्वाद दिया कि तुम इसी भूतल पर रहो, जिससे भूतलवासी तुमसे (तुममें स्नान करके) अपने दुःख मिटा सकें और ब्रह्मलोक प्राप्त कर सके।
मेरी ही ज्येष्ठ वहन कौशिकी इस महान् नदी के रूप में भूतल पर रह रही है।" विश्वामित्र से यह कथा सुनकर वह उत्तम कुमार (राम) तथा उनके अनुज लक्ष्मण आश्चर्य में पड़ गये। कुछ दूर आगे जाने पर उन्हें एक उपवन दिखाई दिया, जहाँ मेघ आकर विश्राम करते थे; उनके पूछने पर कि यह कौन-सा उपवन है ? महान् तपस्वी विश्वामित्र कहने लगे—
यह उपवन उतना ही विशुद्ध है, जितना उन नारियो का मुख होता है, जो अपने पति के अतिरिक्त अन्य किमी दैव या तपस्या को नही मानती। और सुनो, अरुण-नयनों-वाले श्रीविष्णु, जिनका स्वरूप चार वेदो, देवताओ तथा मुनियो के लिए भी अज्ञेय है, कभी इस स्थान मे रहकर तपस्या करते थे।
भूलोक तथा देवलोक के निवासी बधनो से मुक्त होने के लिए जिसका नाम जपते हैं और जिनकी माया के रहस्य को कोई भी नही जान पाता, वही प्रसिद्ध अमल मूत्तिं (विष्णु) ने इस स्थान पर एक सौ कल्प तक घोर तपस्या की थी।
जिस समय वे इस उपवन में तप कर रहे थे, उस समय महावलि नामक एक राजा ने स्वर्ग और भूलोक दोनो को अपने अधीन कर लिया। वह महाबलि उस महावराह के समान बलवान् था, जिसने इस भूतल को अपने एक वक्र दन्त पर अनायास ही उठा लिया था।
'ससार में उसको कोई भी पराजित कर सकेगा', ऐसी शका से मुक्त होकर, तपस्या में निरत उस चक्रवर्त्ती ने ऐसा एक महायज्ञ सपन्न करने का निश्चय किया, जो देवताओ के लिए भी असाध्य हो और जो घृत आदि होम-द्रव्यों से सपूर्ण हो। उसने निश्चय किया कि वह उस यज्ञ मे अपनी भूमि तथा अन्य सभी सपत्ति ब्राह्मणो को दे देगा।
देवो ने जब इस यज्ञ का समाचार सुना, तब इस उपवन मे आये। यहाँ तपस्या में निरत विष्णु को प्रणाम करके प्रार्थना की कि हे भगवन्! आप उस अत्याचारी महावलि के दुष्कृत्यो को रोकिए। विष्णु ने भी ऐसा करने की सम्मति दे दी।
नीलवर्ण तथा सद्गुणो मे विभूषित विष्णु, त्रिकालज्ञ कश्यप और अदिति के पुत्र के रूप मे अवतरित हुए। वे वामन-रूप मे थे, जसे एक बड़े वटवृक्ष को अपने भीतर छिपाये हुए एक छोटा-सा बीज हो।
अद्भुत गुणो एव कार्यों से युक्त (विष्णु), हाथ में अग्नि लिये हुए एक वामन का रूप धारण करके चले। इसका तत्त्व केवल ज्ञानी ही जानते हैं, उनकी यह आकृति ब्रह्मा के ज्ञान-स्वरूप ही थी।
सभी लोकों को जीतनेवाले महावलि ने जब यह समाचार सुना कि एक वामन मूत्तिं उसके यहाँ आये हैं, तब वह आश्चर्य-चकित हो गया; उसने उठकर उनका स्वागत किया और कहा—हे परिपूर्ण। आपसे श्रेष्ठ ब्राह्मण समार में दूसरा नही है, आपके दर्शन पाकर मैं कृतार्थ हो गया।
बालकाण्ड ५३
पौरुषवान् महावलि की बात सुनकर सर्वज्ञ वामन ने कहा—तुमने याचकों की इच्छा से भी अधिक दान दिये हैं। (इसलिए) हे दीर्घ करवाले ! अब याचक बनकर तुम्हारे समीप जो आये, वही महान् है और जो न आये, वह कैसे महान् हो सकता है ?
यह सुनकर महावलि आनन्दित हुआ और उत्तर में उसने पूछा—कहिए अब, आपके लिए मैं क्या करूँ ? महावलि के इतना कहते ही वामन ने कहा—यदि दे सको, तो तीन पग भूमि-मात्र मुझे दो । वामन के 'दो' कहने के पूर्व ही बलि ने कहा—'दिया ।' इतने में शुक्राचार्य ने उसे रोका ।
(शुक्र ने कहा ) राजन् ! जिस वामन-रूप को हम मागने देख रहे हैं, यह छल-मात्र है । यह मत सोचो कि जल-भरे मेघ-सदृश नीलवर्णवाला यह वामन साधारण मनुष्य है । यह वह पुरुष है, जिसने कभी सभी अंडो को तथा ( उनमें रहनेवाले ) सभी वस्तु-समूह को निगल लिया था। इस मर्म को समझो ।
(बलि ने कहा) आप यह नहीं देख रहे हैं कि मेरा कर दान देने के लिए ऊपर उठा हुआ है और मेरे सम्मुख जलसमृद्ध मेघ जैसे विष्णु का कर दान लेने के लिए नीचे फैला हुआ है, जो उनकी महत्ता के अनुकूल नहीं है । अब इससे बढ़कर मेरा गौरव और क्या हो सकता है ?
आदर-योग्य, सन्मार्ग बतानेवाले धर्मशास्त्रों के ज्ञाता (दान देते समय ) यह नहीं सोचते कि यह (दान माँगनेवाला ) अपना है या पराया, वे तो यह कहते हैं कि मेरे इस दान को कोई उत्तम व्यक्ति आगे बढ़कर ग्रहण करे । इस वामन के समान योग्य व्यक्ति और कौन हो सकता है ?
आप वेल्ली¹ कहलाते हैं, इसलिए आपने इस प्रकार कहा । उत्तम नर याचकों के सभी अभीष्टों को पूर्ण करते हैं । यदि कोई उनके प्राण भी माँगे, भले ही किसी याचक के लिए ऐसा दान माँगना अनुचित है, तो वे अपने प्राणों का भी दान कर देते हैं।
हे पितृ-तुल्य ! संसार में प्राण-रहित लोग (वास्तव में ) मृत नहीं हैं; परन्तु जो प्राणों का त्याग न करते हुए भी दूसरों से याचना करते हैं, वे ही मृत हैं । जो शरीर त्याग कर मृत कहलाते हैं, वे मृत होने पर भी यदि दानी हों, तो अमर बन जाते हैं । ऐसे दानियों के सिवा संसार में कौन जीवित रहने योग्य हैं ?
वे (वास्तव में) शत्रु नहीं होते, जो उत्तरोत्तर बढ़नेवाली हानि उत्पन्न कर देते हैं । दानियों के सच्चे शत्रु वे ही होते हैं, जो दान देते समय उनको रोकते हैं। वे दूसरों की ही नहीं, प्रत्युत अपनी भी हानि करते हैं। दाता को दान देने से रोकने के समान पापकृत्य दूसरा नहीं है।
(धर्मशास्त्रों के ) वचनों के अनुसार जब संपत्ति अपने वश में रहती है, तब दान देना चाहिए और इस लोक में यश तथा उस धर्म का फल—पुण्य भी प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रकार प्रयत्न करनेवालों के अंतरंग शत्रु वे लोग ही होते हैं जो यह कहकर उन्हें दान देने से मना करते हैं कि 'लोभ-गुण का त्याग मत करो।'
१ तमिल में वेल्ली का अर्थ 'शुक्र' तथा 'अज्ञान' दोनों होते हैं।
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कम्ब रामायण
हे सद्गुणहीन शुक्र, दान देते समय बाधा डालनेवाले निष्ठुर ! किसी याचक को देने के पूर्व 'मत दो' कहकर किसी दाता को रोकना क्या तुम्हे शोभा देता है ? तुम्हारे इस कार्य से तुम्हारे बन्धु भी वस्त्र और अन्न से वंचित हो जायेंगे।
इस प्रकार कहकर महाबलि ने शुक्राचार्य के सभी वचनो को यह समझकर कि मन्त्री कठोर हृदयवाला है, अस्वीकार कर दिया और (वामन से) यह कहते हुए कि तुम्हीं तीन पग (भूमि) नापकर ले लो, उस वामन के छोटे-से हाथ में जल दे दिया।
सरोवर का स्वच्छ जल ज्यो ही वामन के हाथ में गिरा, त्यो ही वह वामन-मूर्ति, जिसका बौनापन उसके माता-पिता की भी घृणा का विषय हो सकता था, इस प्रकार गगन तक ऊँचा चढ गया कि सामने खडे रहकर उसे देखनेवाले लोग विस्मय और भय मे डूब गये। वह उसी प्रकार बढता चला गया जिस प्रकार उत्तम पात्र को दिये गये दान का फल बढता चला जाता है।
उस बौने का जो पग धरती पर रहा, वह समस्त विश्व पर छा गया और धरती के छोटी होने के कारण और आगे नही फैल सका। दूसरा पग जो गगन-भर मे छाकर स्वर्गलोक को भी पार कर गया था, आगे बढने के लिए और स्थान न पाने के कारण लौट पडा।
समस्त भूतल और गगन-मडल को अपने दो पगो के अन्तर्गत कर लेने के कारण तीसरे पग के लिए स्थान ही बाकी न रहा। उस तीसरे पग के लिए भक्त महाबलि का सिर ही स्थान बना। हे धनुष-शोभित भुजावाले (रामचन्द्र) ! तुलसी-माला से विभूषित सिर-वाले विष्णु (सचमुच) बहुत छोटे हैं।¹
यज्ञरूप विष्णु ने तीनो लोको का राज्य इन्द्र का स्वत्व कहकर उसे दे दिया और स्वयं क्षीरसागर मे जाकर शयन करने लगे, जहाँ उनके भुवनव्यापी चरण लक्ष्मी देवी के कर-स्पर्श से लाल दिखाई देते हैं।
कर्मबन्धनो को समूल नष्ट करनेवाले (रामचन्द्र) ! इस उपवन मे विष्णु भगवान् ने तपस्या की थी, अत. जो भक्ति-श्रद्धा के साथ इस प्रदेश के दर्शन करते हैं, वे फिर जन्म नही ग्रहण करेगे। वेदोक्त विधि से यज्ञ करने के निमित्त मेरे लिए इस आश्रम से बढकर अन्य कोई उचित स्थान नही है।
इसी स्थान में रहकर मैं अपना यज्ञ करूँगा, यह कहकर विश्वामित्र उस सुन्दर उपवन में पहुँचे और यज्ञ के उपकरण एकत्र करके, रमणीय रूप-विशिष्ट राम तथा लक्ष्मण को रक्षा के लिए नियुक्त करके, अपना यज्ञ करने लगे।
देवताओं को उद्दिष्ट करके विश्वामित्र ने छह दिनो तक ऐसा यज्ञ किया, जो दूसरो के लिए दुष्कर था भूमि की रक्षा करनेवाले दशरथ चक्रवर्ती के उन दोनो कुमारो ने उस यज्ञ की रक्षा इस प्रकार की, जैसे पलकें नेत्रों की रक्षा करती हैं।
यज्ञ की रक्षा करते हुए वृषभ-समान बली उन दोनों कुमारों में से ज्येष्ठ ने सर्वज्ञ
¹ भाव यह है कि भगवान के चरण संसार के लिए बहुत बड़ा होने पर भी भक्तों के सिर के सामने बहुत छोटा बन जाता है।
बालकाण्ड ५५
मुनिवर के निकट जाकर पूछा—'हे अवर्णनीय गुण-विभूषित मुने ! आपने जिन अत्याचारी राक्षसों के सम्बन्ध में कहा था, वे कब आयेंगे ?'
विश्वामित्र मौन व्रत धारण किये हुए थे, इसलिए कुछ उत्तर नहीं दिया। युद्ध-निपुण कुमार उन्हें प्रणाम करके यज्ञशाला से बाहर आये और आकाश की ओर देखा। वहाँ (आकाश में) राक्षस लोग वर्षाकाल के काले मेघों के समान गर्जन कर रहे थे, जिसे सुनकर वज्र भी डर जाय।
उन राक्षसों ने बाण चलाये, भाले फेंके, आग और पानी बरसाये, बड़े-बड़े पहाड़ उखाड़कर फेंके, निन्दा-वचन कहे, डराया, धमकाया; कुठार, परशु आदि आयुधों का प्रयोग किया; एक नहीं, ऐसे अनेक माया-कृत्य किये।
(राक्षसों द्वारा) क्रोध के साथ फेंके हुए आयुधों से, जिनमें (मारे गये) प्राणियों के मांस लगे हुए थे, प्रलय-काल की वर्षा के समान सारा वन-प्रदेश ढक गया। चारों ओर से राक्षस-सेना घिर आई और आकाश पर छा गई। (यह दृश्य ऐसा था) मानो मछलियों से भरे हुए लहराते समुद्र ने ही गगन को ढक लिया हो।
राक्षस-सेनाएँ, जिनमें बाण एवं चमकनेवाले खड्ग बहुत ही घने दिखाई दे रहे थे, मारू बाजा बजाती हुई संचरण कर रही थीं, मानो वे प्रलय-काल में उठी हुई तथा गर्जन करनेवाली अनुपम घटा ही हों।
राक्षसों के मुँह के दोनों ओर वराहदन्त निकले हुए थे, वे क्रोध से ओठ चबा रहे थे, उनके बाल रक्तवर्ण थे और नेत्रों से चिनगारियाँ निकल रही थीं। इस प्रकार के उन राक्षसों की ओर संकेत करके रामचन्द्र ने लक्ष्मण से कहा—'जटाधारी मुनि ने जिन राक्षसों के विषय में कहा था, वे ये ही हैं।
उन राक्षसों के आते ही क्रोध से अग्नि-ज्वाला बिखेरते हुए लक्ष्मण ने आँखों के कोरों से गगन की ओर देखा और फिर अपने धनुष की ओर देखा, फिर राम को प्रणाम करके कहा—'अभी इसी स्थान पर आप इन राक्षसों को टुकड़े-टुकड़े होकर गिरते हुए देखेंगे।
धूम्रवर्ण एवं शूलधारी राक्षस कहीं होमकुण्ड की अग्नि में मांस और रक्त न डाल दें, यह सोचकर कमललोचन (राम) ने अपने शरों से उस मुनि-श्रेष्ठ के निवास के ऊपर एक दूसरी छत-सी बना डाली।
क्षीरसागर के मथते समय उसमें से हलाहल विष निकलकर जब सृष्टि का विनाश करने लगा था, तब देवता लोग जिस प्रकार भयभीत हो चन्द्रचूड़ (शिव) की शरण में गये थे, उसी प्रकार महा तपस्वी मुनि भी वञ्चकराक्षसों से भयभीत हो रामचन्द्र से बोले—'हे अंजनवर्ण ! हम आपकी शरण में हैं, हमें अभय दान दीजिए।'
तब कमललोचन (राम) ने यह कहकर कि आपलोग व्याकुल मत होइए—उन्हें अपनी भुजाओं की छाया में ले लिया और अपने धनुष की दिव्य प्रत्यचा को अपने कान तक खींचकर मारे भूतल को (उन राक्षसों के) रक्त का समुद्र बनाया और उनके सिरों के पहाड़ बनाये।
५६ | कंब रामायण
लक्ष्मी के प्रियतम (श्रीराम) के दिव्य अस्त्रों ने भयंकर ताड़का से उत्पन्न दोनों वीरों में प्रथम मारीच को समुद्र में फेंक दिया और दूसरे सुबाहु को यमलोक में पहुँचा दिया।
पुष्पगुच्छों की मालाओं से सुशोभित (रामचन्द्र) ने जो बाण बरसाये, उन बाणों से क्षण-भर में मार्ग अन्तरिक्ष भर गया। (बचे हुए राक्षस) यह सोचकर कि ये दोनों राघववीर अब लाशों के पर्वत पर चढ़कर हमें (जीवित) पकड़ लेंगे, अहमहमिका से (आपस में चढ़ा-ऊपरी करते हुए) वहाँ से भाग चले।
वज्र के समान भयंकर राम के बाण भागते हुए राक्षसों का पीछा करते हुए चले, तब उन राक्षसों की शिरोहीन धड़ें तड़प-तड़पकर नाचने लगीं, भूत-पिशाच भी, जो शव-भक्षण करने आये थे, मेरे (लेखक के) प्रभु (रामचन्द्र) का यश गाने लगे, मांसभक्षी पक्षियों का एक चंदोवा-सा वहाँ तन गया।
(देवताओं से की गई) पुष्पवर्षा (उन पक्षियों के) चंदोवे को चीरती हुई नीचे बरस पड़ी, गगन में मेघों के समान दुंदुभि गरज उठी, इन्द्रादि देवता एकत्र हो गये और सुन्दर धनुर्धारी (रामचन्द्र) की जय-जयकार करने लगे।
पावन तपस्वियों ने आशीष-रूपी पुष्पों की वर्षा की तथा उस कानन के वृक्षों ने भी पुष्पों की वर्षा की। विश्वामित्र ने उसी समय अपना यज्ञ यथाविधि समाप्त किया और मुदित मन से (रामचन्द्र से) ये बातें कहीं—
सभी भुवनों का सर्जन करनेवाले तथा (प्रलय के समय) उन्हें अपने उदर में रख-कर उनकी रक्षा करनेवाले तुम्हीं हो। आज तुमने मेरे इस छोटे-से यज्ञ की रक्षा की। मैं यही मानता हूँ कि यह सब मेरे पुण्यों का फल है, नहीं तो इस छोटे-से यज्ञ की रक्षा तुम्हारे लिए कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं है।
(दूसरे दिन प्रातःकाल) पुष्पों से भरे उस वन में, अपूर्व तपस्याशील अनेक ऋषियों के साथ निवास करनेवाले, पर्वत-समान सद्गुणों से पूर्ण विश्वामित्र के सम्मुख कौसल्या-पुत्र उपस्थित हुए और प्रणाम करके पूछा—'आज मैं आपकी क्या सेवा करूँ? आज्ञा दीजिए।'
'हे पुत्र, यदि मैं किन्हीं कार्यों को दुःसाध्य समझकर तुम से करने के लिए कहता भी हूँ, तो वे तुम्हारे लिए दुःसाध्य नहीं होते। अभी (कुछ) बड़े कार्य करने बाकी हैं, जिन्हें बाद में किया जा सकता है। अभी हम विशाल और जल-सम्पन्न खेतों से घिरे हुए मिथिला नगर में जायेंगे और वहाँ जाकर महाराज जनक से किये जानेवाले यज्ञ का संदर्शन करेंगे। चलो।' विश्वामित्र के यह कहते ही तीनों चल पड़े। (१—५६)
अध्याय ९
अहल्या पटल
वे तीनो ( महर्षि विश्वामित्र एव राम-लक्ष्मण ) शोण ( सोन १ ) नदी-रूपी नारी के निकट जा पहुँचे । विविध रत्नो ( से सुशोभित ) तथा चंदन, अगरु आदि सुगंध-द्रव्यो से सुरभित सिकता-राशि ही उस शोण-रमणी के स्तन थे, सुकोमल लताएँ उसकी कटि थी, ( भ्रमर-कुल से ) गुंजरित नव विकसित पुष्प-पंक्तियाँ उसकी मेखला बनी थी उस स्थान मे फैली हुई काली मिट्टी उसके केशपाश थी ; निकटस्थ पर्वतो की परिक्रमा करती हुई उसकी जो नहरे बह रही थी, वे उसके नूपुर थे । इस प्रकार, वह नदी-नारी शोभायमान थी ।
ज्यो ही वे तीनो शोण नदी के तट पर पहुँचे, त्यो ही सूर्य भी अस्त हो गया, मानो वह अगले दिन प्रातःकाल उदित होते समय उन तीनो को शीतलता पहुँचाना चाहता हो और अपनी स्वाभाविक उष्णता को शात करने के लिए, अरुण ¹ के नयनो से भी तीव्र गति से जानेवाले अपने घोड़ो-सहित, पश्चिम सागर मे डूब गया हो ।
( पक्षियो के ) कलरव से भरे सरोबरो मे सुरभिमय दीर्घ नालवाले बड़े कमल-पुष्प खिले हैं, जो ( प्यासे भ्रमरो को तृप्त करने के कारण ) धर्म के आलय-स्वरूप हैं । वे कमल सूर्यास्त होते ही अपने दल-कपाटो को बंद कर लेते हैं, तो आश्रय की खोज में विलंब से आये हुए मस्त भ्रमर अपनी भ्रमरियो के साथ, उन पुष्पो से लौट जाते हैं ओर शोण नदी के तीरस्थ सुगंधित पुष्प-भरे उद्यानो में विश्राम पाते हैं । वे तीनो रात्रि में विश्राम करने के लिए उसी उद्यान में प्रविष्ट हुए ।
श्रीराघव ने विश्वामित्र से प्रश्न किया—यह कैसा उद्यान है ? तपस्वी एव कर्म-बंधन से विमुक्त ( विश्वामित्र ) महर्षि ने उत्तर दिया—पुरातन काल मे काश्यप महर्षि की पत्नी दिति ने अपने असुर-पुत्रो के शोक मे इसी स्थान में तप किया था ।
[ यहाँ से आगे २५ पद्यों में इस उद्यान का इतिहास वर्णित है । ]
कालमेघ की समता करनेवाले मेरे ( लेखक के ) स्वामी ( महाविष्णु ) इस अडगोल से परे परमपद स्थान मे रहते हैं । एक विद्याधर-स्त्री उस परमधाम मे पहुँच गई और पुडरीक के कोमल आवास मे रहनेवाली लक्ष्मी का स्तवन किया । लक्ष्मी देवी ने प्रसन्न होकर एक पुष्पहार उस विद्याधर-रमणी को दिया, जो पुष्पमधु से पूरित एव भ्रमरो से युक्त थे ।
उस विद्याधर-कन्या ने लक्ष्मी देवी के प्रसाद-भूत उस पुष्पहार को अपनी वीणा मे बाँध लिया और ब्रह्मलोक को लौट आई । इसी समय अतिक्रोधी दुर्वासा मुनि उसके सम्मुख आये । उन्होने उस कन्या को लक्ष्मी देवी की भक्ता जानकर उसके चरणो की वंदना की ।²
१. 'अरुण' सूर्य के सारथी का नाम है ।
२ दक्षिण मे वैष्णव अपने को भगवान तथा भगवान के भक्तो का भी दास मानते हैं । विद्याधरी विष्णु की भक्तिन होने के कारण दुर्वासा के लिए भी वंदनीय थी ।
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उस विद्याधर-कन्या ने दुर्वासा महर्षि से कहा—हे महिमामय महर्षे ! इसे लोँ। यह पुष्पहार श्रीमहालक्ष्मी के मुकुट का भूषण था, जो (लक्ष्मी) सृष्टि तथा स्थिति के कारण-भूत, सारे विश्व को निगलने ओर उगलनेवाले, उस विष्णु भगवान् के विशाल वक्ष पर आसीन रहती ह। मैं तुमको प्रेम से इसे देती हूँ। यह कहकर उसने उस हार को दुर्वासा के हाथ में दे दिया।
दुर्वासा ने सोचा, सभी देवो की स्वामिनी लक्ष्मी देवी ने जो हार अपने मुकुट पर धारण किया था, उसे प्राप्त करने का सौभाग्य मुझे मिला है, न जाने पूर्वजन्म में मैने कौन-सा बड़ा तप किया था; दुर्वासा अत्यन्त आनन्दित होकर नर्त्तन करने लगे, अपने को कर्म-विमुक्त समझने लगे और अन्त मे देवलोक मे जा पहुँचे।
वहाँ इन्द्र अपने समस्त वैभव के साथ ऐरावत हाथी पर सवार होकर स्वर्ग-वीथि मे जा रहा था। उस दृश्य को देखकर दुर्वासा विस्मय तथा आनन्द से भर गये। (वह दृश्य कैसा था ?) मानो कोई रजत-पर्वत हो, जिस पर जलपूर्ण बादल छाये हो, सहस्रो विकसित कमलपुष्प भी फैले हों ओर जिनपर सूर्य की स्वर्णिम किरणो की आभा पड़ रही हो, ऐरावत का वैसा ही भव्य दृश्य था।
रंभा, मेनका, तिलोत्तमा, उर्वशी—ये अप्सराएँ इन्द्र के आगे-आगे नृत्य करती हुई जा रही थी, उनकी वाणी इतनी मधुर थी कि इक्षु-रस भी फीका पड़ गया था; उनके पल्लव-कोमल चरण मन्मथ के पुष्पबाणो से भरे तूणीर जैसे थे, उनके नूपुर मधुर नाद करते थे, तथा साथ-साथ संगीत भी हो रहा था।
इन्द्र के दोनो पाश्र्वों में चामर डुल रहे थे, वह दृश्य ऐसा था, मानो किसी बडे नीलम के पर्वत के दोनो ओर चंद्रकिरणो का पुंज संचरण कर रहा हो, उसके शिर पर भव्य श्वेत छत्र ऐसा शोभित था, जैसे पूर्णचंद्र अपनी ज्योत्स्ना फैलाता हुआ स्थिर खड़ा हो।
भेरी, ताल, शंख आदि वाजे ऐसा नाद उत्पन्न कर रहे थे, जिसमे मंगल-गीत भी डूब जाते थे। चतुर्वेदो का घोष समुद्र गर्जन के समान हो रहा था। इन्द्र का वह मनोहर वीथि-विहार (जुलूस)¹ ऐसा आ रहा था, मानो वह सारे विश्व को (आनन्द मे) डुबो देगा।
उपमा-रहित (दुर्वासा) मुनि इस वैभव को देख हर्षित हुए और विद्याधर-कन्या का दिया हुआ पुष्पहार इन्द्र को उपहार दिया। इन्द्र ने अपने हाथ में रखे अंकुश से उस हार को उठा लिया और उसे ऐरावत के सिर पर डाल दिया। ऐरावत ने अपनी सूँड़ से उसे खींचकर पैरो तले रौंद दिया।
यह देखते ही दुर्वासा मुनि की आँखो से कठोर क्रोधाग्नि की ज्वाला उमड़ पड़ी। सारे अंडगोल जलकर भस्म हो जायेंगे—ऐसी आशंका से भयभीत होकर देवता विखरकर भाग गये, सूर्य-चन्द्र भी अपनी गति रोककर स्थिर खडे हो गये, अष्ट दिशाओ में अँधेरा फैल गया, सारे लोक चक्कर काटने लगे।
उस दुर्वासा महर्षि की साँसो से धुआँ निकलने लगा; वे क्रोध से अट्टहास कर
¹ तमिल मे जुलूस के लिए 'पवनि' शब्द का प्रयोग होता है। यहाँ उसके लिए वीथि-विहार शब्द का प्रयोग किया गया है।—अनु०
बालकाण्ड ५८
उठे, जैसे त्रिपुर-दाह के समय शिवजी हँस रहे हो। उनकी भौहें उनके विशाल भाल पर चढ़ गईं; (उन्होंने अपनी) आँखों से ज्वाला उगलते हुए ऐसा गर्जन किया, जिससे स्वयं वज्र भी डर गया। उन्होंने कहा—हे पापिष्ठ शतमख ! सुन—
पञ्च महाभूतों के नायक, भूमि-वल्लभ एवं अनुपम छन्दों के प्रभु महाविष्णु के वक्ष पर आसीन आदिलक्ष्मी के द्वारा यह हार प्रेम के साथ धारण किया गया था और विद्याधर- कन्या ने उनसे इसे प्राप्त किया था। बड़ी तपस्या की महिमा के कारण मैने उनसे यह हार प्राप्त किया।
तेरे इस वैभव को देखकर मै आनन्दित हुआ और आदर के साथ वह हार तुझे प्रदान किया, किंतु तूने इसका अनादर किया, अतः तेरी सारी निधियाँ और अपार संपत्ति समुद्र में डूब जाये तथा तू महिमाहीन होकर दुःखी बन जा!—क्रोधी मुनि ने इस प्रकार इन्द्र को शाप दिया।
(दुर्वासा के शाप देते ही) रंभा आदि अप्सराएँ, कल्पवृक्ष, नौ निधियाँ, सुरभि पशु, श्वेत अश्व, पर्वताकार मत्तगज (ऐरावत) इत्यादि सभी संपत्तियाँ इन्द्र के पास से हट गईं और उर्मियों से आकुल समुद्र में जाकर छिप गईं।
क्रोधी दुर्वासा मुनि के शाप के कारण स्वर्ग आदि सभी लोकों को दरिद्रता पीडित करने लगी। तब सभी देवगण, अर्धनारीश्वर एवं चतुर्मुख को साथ लेकर श्रीविष्णु भगवान् के समीप पहुँचे, जिनका वक्ष रक्त-कमल पर आसीन महालक्ष्मी तथा श्रीवत्स के चिह्नों से अंकित है।
नवविकसित कमल से उत्पन्न ब्रह्मा तथा शिव प्रभृति अन्य देवों ने दुर्वासा के कठोर शाप की बात बतलाई और प्रार्थना की कि आपके अतिरिक्त अन्य कोई शरण नहीं है, अतएव आप हम सबकी रक्षा करे। तब सभी लोकों को नापनेवाले (उस त्रिविक्रम) ने प्रेम से कहा—'डरो नहीं।—
तुमलोग असुरों को अपने साथ मिलाकर, गर्जन करनेवाले सागर को मथो : मन्दर पर्वत को मथानी बनाओ, वासुकि सर्प को रस्सी बनाओ, शीतल चन्द्रमा को मथानी की टेक बनाओ और ओषधियों से भरकर इस सागर का मंथन करो और उसमें से अमृत को निकालो।
हम भी उस स्थान पर आयेंगे। तुमलोग शीघ्र ही अपना कार्य आरम्भ कर दो।' विष्णु के ये वचन सुनकर देवता उनकी प्रशंसा करने लगे और दरिद्रता से मुक्त होने की बात सोचकर आनन्द से नाचने लगे।
देवता मंदर पर्वत को उखाड़ लाये; उसमें वासुकि नाग को लपेटा; चंद्र को टेक बनाया, ओषधियों से (समुद्र को) भरा और क्षीरसागर को मथने लगे, तो उसमें उथल-पुथल मच गई। भूमि डोल उठी। भूमि के नीचे स्थित आदिशेष भी मरोड़ खाने लगा।
धर्म-रहित व्यक्तियों के मन जिन सद्गुणों को जान भी नहीं सकते ऐसे सद्गुणों से युक्त (विष्णु भगवान्) ने महान् कूर्म का रूप धारण किया. अपने सहस्रों बलिष्ठ अंगों को
६० | कंब रामायण
फैलाकर दृढ़ खड़े रहे घूमनेवाला मंदर पर्वत उनकी पीठ पर था। इस प्रकार, उन्होंने दुर्वासा के शाप से नष्ट हुई सभी वस्तुओ को पुनः प्राप्त किया।
सभी खोई हुई वस्तुएँ प्रभु (विष्णु भगवान्) की कृपा से पुनः प्रकट हुई। उस समय सुर तथा असुर आपस मे कलह करने लगे। विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर असुरो का विनाश किया और सुरो ने अमृत का पान किया।
श्रीधर मूर्त्ति ने हलाहल विष एवं चंद्रकला वृषभ-वाहन (शकर) को दिया, पञ्चवृक्ष तथा अन्य उत्कृष्ट वस्तुएँ इन्द्र को प्रदान किया, शेष पुष्पक आदि सपत्तियों को अन्यान्य देवो को दिया और लक्ष्मी देवी तथा कौस्तुभमणि को अपने हृदय का हार बनाया।
उस समय, दिति अपने पुत्र असुरो के विनाश से अत्यन्त दुःखित हुई। उसने अपने पति कश्यप ऋषि के निकट पहुँचकर उन्हे प्रणाम किया तथा उनसे प्रार्थना की कि इन्द्रादि देवो के षड्यन्त्र से मेरे पुत्र मारे गये हैं, इसलिए एक ऐसा पुत्र प्रदान करो, जो उन देवों को मिटाने मे समर्थ हो।
कश्यप ने दिति की प्रार्थना सुनकर कहा—तुम्हे पुत्र का वरदान देता हूँ; तुम पृथ्वी पर जाकर एक सहस्र वर्ष तक कड़ी तपस्या करोगी, तो तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी। दिति तपस्या करने लगी।
इन्द्र ने दिति की तपस्या की बात सुनी। वह उसकी परिचर्या मे लग गया। एक बार तपस्या से श्रान्त होकर जब दिति लेटी हुई थी, तब सूक्ष्म रूप धारण करके इन्द्र उसके गर्भ मे प्रविष्ट हुआ और दिति के गर्भस्थ शिशु के सात खंड कर दिये। दिति जगकर रोने लगी, तब इन्द्र ने उन सातो खंडो को सप्त मरुत् बना दिया।
यही वह स्थान है, जो दिति की तपस्या से पवित्र हुआ है। यहाँ का शरवण (सरकंडो का वन) ही उमा ओर शकर के पुत्र सुब्रह्मण्य (कार्तिक) का उद्भव-स्थान हैं, जिन्हे आदिवायु एव गगा देवी भी भरण नही कर सकी थी। इस प्रकार, विश्वामित्र ने श्रीरामचन्द्र को कथा सुनाई।$^१$
फिर सूर्यदेव, यम के सदृश काल अधकार को हटाकर, ससार की रक्षा करते हुए, अपने रथ पर आरूढ होकर, सहस्रो किरणो के साथ नील सागर से उदित हुए, जैसे विष्णु की नाभि से ब्रह्मा को लिये हुए आदिकमल निकला हो।
सूर्योदय होते ही त्रिमूर्त्तियो के सदृश वे तीनो (विश्वामित्र, राम ओर लक्ष्मण) वहाँ से प्रस्थान कर चले ओर दोनो कूलों पर अपनी उमड़ती लहरों से टकराती हुई बहनेवाली सुदर गंगा नदी को देखा, जो रक्त नेत्र तथा वृषभ-वाहन शकर की 'कोष्णी' तथा 'कोण्ड्र' फूलो से अलकृत घने जटाजूट से निकलने के कारण, सुनहली धारा युक्त कावेरी$^२$ नदी के समान है।
राघव ने विश्वामित्र से कहा— पितृ-सदृश ऋषीश्वर ! इस महान् नदी की
$^१$ यह कथा विस्तार के साथ कालिदास-कृत कुमारसभव में वर्णित ह।
$^२$ कावेरी की धारा सुनहली होती है। गगा की धारा भी शिवजी का जटा के फूलो तथा रक्त नेत्रो का छाया पड़ने से सुनहली दीखती है।
बालकाण्ड ६१
महिमा बताइए। विश्वामित्र कहने लगे—मेरे पालक राजकुमार ! पुराने काल में तुम्हारे श्रेष्ठ सूर्यकुल मे सगर नामक चक्रवर्त्ती उत्पन्न हुए थे, जिन्होने अपनी बलिष्ठ भुजाओ मे अयोध्या नगरी मे रहते हुए सारी पृथ्वी पर शासन किया था।
उस विजयी चक्रवर्त्ती के दो पत्नियाँ थी। विदर्भ देश मे उत्पन्न पत्नी से 'असमंजस' नामक पुत्र हुआ, जिसका पुत्र 'अंशुमान्' था। उनकी दूसरी पत्नी, गरुड की भगिनी सुकुमारी 'सुमति' थी, जिसके धर्मपरायण साठ हजार बलवान् पुत्र हुए।
अत्यंत पराक्रमी सगर चक्रवर्त्ती अपने सभी पुत्रो की सहायता से अश्वमेध यज्ञ करने लगे। देवता लोग इससे असंतुष्ट हो उठे और देवेंद्र से यह समाचार निवेदित किया। इन्द्र ने जाकर यज्ञ के सुन्दर अश्व को पकड़ लिया और उसे ले जाकर पाताल में तपस्या करनेवाले कपिल महर्षि के पीछे छिपा दिया।
तीव्र गति से चलनेवाले उस यज्ञाश्व के पीछे-पीछे अंशुमान् जा रहा था। इन्द्र द्वारा उस अश्व का अपहरण होते ही वह आश्चर्य-चकित हुआ। इन्द्र के द्वारा अपहरण को नही जानने के कारण वह सर्वत्र भू लोक मे उसकी खोज करता रहा; किंतु असफल रहा। अंत मे अपने पितामह सगर के पास आकर सारा वृत्तांत कहा।
अंशुमान् से समाचार पाकर सगर ने अपने साठ हजार पुत्रो से यह समाचार कहा, तो वे वडवाग्नि के समान कोपाग्नि से जल उठे ओर समस्त पृथ्वी पर घोडे की खोज करके अन्त मे (पृथ्वी को) खोदते-खोदते पाताल में उतर पडे।
कहते हैं कि वे साठ सहस्र सगर-पुत्र उत्तर दिशा मे खोदने लगे और शतयोजन चौड़ा और शतयोजन गहरा गर्त्त खोद डाला। पाताल मे पहुँचकर उन्होने महातपस्वी कपिल के पीछे अपना यज्ञाश्व देखा। वे आग की तरह क्रोध से जल उठे और कपिल महर्षि को गाली देने लगे। वे इस प्रकार अहंकार से भरकर उन (महर्षि) के निकट जा पहुँचे।
(उनकी बाते सुनकर) उस मुनि ने अत्यन्त उमड़ते हुए क्रोध के साथ अग्नि-सदृश अपनी आँखें खोलकर उन्हे देखा। तब, परमशिव के मंदहास से जिस प्रकार तीनो पुर जलकर भस्म हो गये थे, उसी प्रकार वे साठ हजार राजकुमार जलकर भस्मावशेष हो गये। चरों ने यह समाचार सगर चक्रवर्त्ती को दिया।
सगर, पुत्र-शोक से अत्यन्त उद्विग्न हो उठे। उन्होने अपने शोक का अन्त न पाने पर भी अपने कर्त्तव्य का स्मरण करते हुए अपने पौत्र अंशुमान् को बुलाया और कहा—वे (पुत्र) तो मिट गये, अब क्या आरंभ किये हुए यज्ञ-कृत्य को रोकना उचित होगा? अंशुमान् अपने पितामह के यज्ञ की पूर्त्ति के निमित्त चल पड़ा और कपिल के निवास-स्थान पाताल में जा पहुँचा।
पाताल मे अपने मृत पितृव्यो (चाचाओ) की भस्मराशियो को देख वह उद्विग्न हो उठा। फिर, कपिल मुनि के चरण-कमलो पर नत होकर खड़ा रहा; तब मुनि ने अश्व को ले जाने की आज्ञा दे दी और अश्व किस प्रकार वहाँ आया था, इसका सारा वृत्तान्त भी कह सुनाया।
६२
कंब रामायण
सब के द्वारा प्रशंसित (रामचन्द्र) । उस निष्कलंक मुनिके वचन सुनकर अंशुमान् ने आदर के साथ उनकी वंदना की और अश्व लेकर लौट आया । सगर ने यज्ञ पूर्ण किया । कुछ समय उपरांत अंशुमान् को राज्य सौंपकर चक्रवर्त्ती दिवंगत हो गये ।
सगर-पुत्रों के द्वारा खोदे जाने से मकर-मत्स्यों से पूरित समुद्र ही 'सागर' कहलाया । अंशुमान् अप्रतिम पराक्रम के साथ भूमि का शासन करता रहा । उसके दीर्घवंश में भगीरथ नामक कुमार अवतरित हुआ ।
वे चक्रवर्त्ती भगीरथ समस्त धरती पर अपना एकमात्र शासन-चक्र चलाते रहे । एक बार उन्होंने वसिष्ठ से अपने पूर्वज सगर-कुमारों की मृत्यु का वृत्तान्त सुना । तब उन्होंने वसिष्ठ के चरणतल को सिर से लगाकर प्रणाम किया और निवेदन किया—
कपिल की कठोर कोपाग्नि में मेरे पूर्वज दग्ध हुए और दीर्घकाल से निरय (नरक) में पड़े हैं । मैं उनके उद्धार के लिए तपस्या करना चाहता हूँ । कृपया आप तपस्या का क्रम मुझे बतला दें । मुनिवर ने कहा—
हे भूमि-पालकों के प्रभु ! तुम ब्रह्मा को लक्ष्य करके अपने प्रपितामहो के उद्धार के निमित्त निरंतर कई दिनों तक अश्रान्त तपस्या करो ।
तब भगीरथ सारी पृथ्वी का भार अपने मंत्री सुमंत्र को सौंपकर हिमालय के अंक में जा पहुँचे । जब उन्होंने दस सहस्र वर्ष तक कठिन तपस्या की, तब आदिकमल से उद्भूत ब्रह्मा प्रकट हुए ।
ब्रह्मा ने भगीरथ से कहा—तुम्हारी इस बड़ी तपस्या से मैं संतुष्ट हुआ । महान् तपस्वी कपिल के क्रोध से तुम्हारे पूर्वपुरुष जल गये थे । यदि उनके भस्मावशेष आकाश-गंगा के प्रवाह से सिंचित हों, तो वे सद्गति को प्राप्त होंगे ।
विशाल गगन में बहनेवाली गंगा नदी यदि भूमि पर उतर आयगी, तो उसके वेग को त्रिनेत्र के अतिरिक्त और कोई वहन नही कर सकता, अतः शिवजी को लक्ष्य कर तुम तपस्या करो । यह कहकर विश्व के निर्माता ब्रह्मदेव अदृश्य हुए ।
फिर, भगीरथ ने शिवजी का ध्यान करते हुए पूर्वोक्त समय तक ही (दस सहस्र वर्ष) तप किया । अग्नि-समान कान्तियुक्त देव (शिवजी) वहाँ पहुँचे और यह कहकर अदृश्य हो गये कि हम तुम्हारी इच्छा पूर्ण करेंगे । उसके पश्चात् पाँच सहस्र वर्ष तक गंगा देवी को लक्ष्य कर भगीरथ ने तप किया ।
नदियों में श्रेष्ठतम (गंगा) नदी, तरुण नारी का रूप धारण कर भगीरथ के सम्मुख प्रकट हुई और उससे कहा—तुम किस प्रयोजन के निमित्त यह कठोर तप कर रहे हो ? उत्तुंग तरंग-भरित (गंगा) प्रवाह यदि स्वर्ग से भूमि पर उतर आयगा, तो उसका वेग कौन सह सकेगा ? शिव ने जो वचन कहा है, वह विनोद-मात्र है, उससे कुछ नही होगा । दुबारा तुम शिवजी की तपस्या करो और ठीक ढंग से यह जान लो कि शिव गंगा के वेग को सहने के लिए सन्नद्ध हैं या नहीं ।
गंगा के वचन सुनकर वह (भगीरथ) खिन्नमन हो गया और फिर जाकर दो सहस्र वर्ष तक स्वर्णमय जटावाले एवं अग्नि-ज्वाला-स्वरूप (शिवजी) को लक्ष्य करके तप किया ।
बालकाण्ड ६३
तब भगवान् (शिवजी) उनके सम्मुख प्रत्यक्ष हुए और उनकी इच्छा के विषय में पूछा। भगीरथ ने निवेदन किया—मेरे प्रभु ! गंगा नदी ने कहा है कि उनके वेग को रोक लेने का आपका पूर्व वचन केवल विनोद-मात्र है, तो तथ्य क्या है, बतलाइए। यह सुनकर उन्होंने (शंकर ने) उत्तर दिया—डरो नहीं, मैं गंगा को इस प्रकार रोक लूँगा कि उसकी एक बूँद भी नहीं बिखरेगी। और फिर, वे (शिवजी) अदृश्य हो गये। तब उसने (भगीरथ ने) गंगा को लक्ष्य करके ढाई हजार वर्ष तक कड़ी तपस्या की।
उस राजा ने क्रमशः पत्ते, भस्म, जल, पवन, सूर्य-किरण—इनका आहार करते हुए और फिर इनका भी त्याग करके तीस सहस्र वर्ष तक महान् श्रद्धा के साथ तपस्या की।
(भगीरथ की तपस्या पूर्ण होते ही) श्रेष्ठ नदी आकाश से भू-लोक में आकर प्रकट हुई। वह इस प्रकार गर्जन करती हुई उतरी कि ब्रह्मदेव का सत्यलोक और इन्द्रादि देवों का स्वर्गलोक भी काँप उठे। पार्वती के पति (शिवजी) ने अपने विलक्षण जटाजूट में उसे पूर्णरूप से छिपा लिया।
घास की नोक पर पड़ी हुई ओस की बूँद के समान, भगवान् (शंकर) की जटा में उस श्रेष्ठ नदी को छिपे हुए देखकर वह (भगीरथ) अत्यन्त विभ्रम के साथ सिर झुकाये मौन खड़ा रहा। उन्होंने (शंकर ने) उसे धीरज बँधाते हुए कहा कि डरो नहीं, अब गंगा मेरी जटा के मध्य में है, और फिर उसके एक थोड़े-से अंश को बाहर निकलने दिया। गंगा का वह अंश भूमि पर उतर पड़ा।
आगे-आगे राजा चलने लगा और उसके पीछे-पीछे गंगा, मृत सगर-पुत्रों को सद्गति देने की उमंग में, बड़ी तेजी से वह चली, उसने मार्ग में तपोनिरत जह्नु महर्षि के यज्ञ का ध्वंस कर दिया। जह्नु ने क्रोधाविष्ट होकर गंगा-प्रवाह को चुल्लू में भरकर पी लिया।
उस दृश्य को देखकर वेदज्ञ मुनि विस्मित रह गये। उसने (भगीरथ ने) जह्नु को नमस्कार करके गंगा को लाने का सारा वृत्तांत कह सुनाया, तब जह्नु ने द्रवी-भूत होकर कान के मार्ग से गंगा को बाहर निकाल दिया, तब वह मृतक राजपुत्रों की भस्मराशि पर उछलती हुई वह चली।
'निरय' (नामक नरक) में पड़े हुए सगर-कुमार अनन्त मार्ग (स्वर्गलोक) में जा पहुँचे। इस दृश्य को देखकर आनन्दित स्वर्गवासियों (देवों) ने सुगन्धित पुष्पों की वर्षा की। नगाड़े बज उठे। तब, भगीरथ अयोध्यापुरी को लौट आया।
(विश्वामित्र ने रामचन्द्र से कहा)—हे नृपकुमार! इस अण्डगोल से परे विद्यमान, समस्त विश्व को एक ही पग में नापनेवाले (त्रिविक्रम) के कमल-चरण से निस्सृत होकर कमलभव (ब्रह्मा) के कमंडल से जो जल संचित हुआ था, वही भगीरथ की तपस्या से लाया जाकर गंगा नदी के रूप में भूतल पर आया है।
भगीरथ ने अपने पितरों की सद्गति के लिए अनेक सहस्र वर्षों तक तपस्या करके यह जल भूतल पर लाया; अतः यह नदी भागीरथी कहलाई और जह्नु महर्षि के कर्ण-मार्ग से बहने के कारण यह जाह्नवी कहलाई।
८० कम्ब रामायण
(विश्वामित्र ने) गंगा की कहानी कह सुनाई तो वे (राम और लक्ष्मण) सुनकर आश्चर्य और आनन्द में डूब गये। फिर, वे गंगा को पार कर विशाला नामक नगर में पहुंचे, जहाँ के पर्वत-सदृश भुजावाले नरेश ने उनका आदर-सहित स्वागत किया और (विश्वामित्र के) चरणों की वन्दना की। तीनों कुछ समय उस स्थान पर ठहरे और (फिर) आगे बढ़ चले।
वे तीनों मिथिला देश में जा पहुंचे जहाँ खेतों में अमरस कमलपुष्प खिल रहे थे। (जहाँ) खेतों की निगरानी में लगी हुई कृषक-नारियों के भाले-सदृश सुन्दर नेत्रों की, चंचल नयनों की परछाईं पानी में पड़ती थी, जिसे देखकर सारस पक्षी भ्रान्ति से उन्हें 'चपल' मीन समझ लेते थे और उन परछाइयों पर अपनी चोंच मारने लगते थे किन्तु मीन न पाकर लज्जित हो जाते थे।
[ नीचे विदेह देश के उद्यानों का वर्णन है। ]
(विदेह देश के) उद्यान कैसे हैं ? बाँध-बाँध अगरुवृक्षों के जलमार्गो से होकर जल बहता है, तो मृदंग-नाद होता है; अग्नि-सदृश अपने नवीन पुष्पों के रूप में उज्ज्वल दीप लिये खड़े हैं; ताड़ के सदृश मधु धारा बहानेवाले पुष्प-भरी लता में भ्रमर संगीत गाते हैं तथा मयूर अपने पंख फैलाकर नाचते हैं।
उद्यानों के खेतों में पदम-पुष्प के मध्य नीलकमल को देखकर कृषक भ्रांति से ... का मुख तथा नयन समझ लेते हैं और (उनसे) आकृष्ट हो उनके समीप जा ... किंतु पदम मणियों के बदले केवल पुष्प का आभास सीख उठते हैं और उन पुष्पों को उखाड़कर फेंक देते हैं। ऐसे उगाये गये पुष्प वहाँ बहुत-से पड़े हुए हैं।
उस प्रदेश की रूपवती स्त्रियाँ सरसोपमा जब मंदगति से चलती हैं, तब प्रवाल के समान उनके पाँवों में बजने वाले नूपुरों की ध्वनि को सुनकर उनके पीछे बक पड़ते हैं, वे समझती हैं कि पक्षी हमारा उपहास करते हैं, तब उनके मुखों का कुंकुम ढिग जल में मिल जाता है और जल-क्रीड़ा में उनके स्तनों के चन्दन का लेप पिघलकर बहकर छितरकर सुगन्धित करता है; तथा उस पानी में उतरने के पश्चात् स्त्रियाँ नीलकमल के समान नेत्रों तथा कमल के समान मुखों को सम्भालती हैं। वे तथा चंचल भँवरें उस समय एक-सी लगती हैं। जल में खिले हुए कमल के बिम्बों में बाल हैं, जिसे देखकर भँवरे उन मुखों को वास्तविक कमल नहीं मानते।
...
बालकाण्ड - ६५
उनके नृत्यों के साथ संगीत तथा मृदंग-ताल की ध्वनियाँ होती रहती है, जिन (शब्दों) से भड़ककर भैंसें भागकर नदियों में जा गिरती हैं, जिनके कारण (पानी में) उथल-पुथल उत्पन्न हो जाती है, जिससे मीन उछल-उछलकर तट पर के नारियल, गुवाक (सुपाड़ी) आदि वृक्षों के पत्तों पर जा गिरते हैं।
वहाँ के सरोवरों में कोमलांगी सुन्दरियाँ (जब) भाले-सदृश अपनी आँखें मीच-कर और जलमग्न होकर ऊपर उठती हैं, तब वे क्षीर-सागर के मथने के समय जल से ऊपर उठती हुई लक्ष्मी देवी का दृश्य उपस्थित करती हैं। उनके करों के श्वेत कंगन वहाँ के जल-पक्षियों के साथ बोल उठते हैं। उन सरोवरों में भ्रमर सुगंधित पुष्प की कलियों को भेदकर भीतर पहुँचते हैं तथा मधुपान करके मत्त रहते हैं।
इस प्रकार के मिथिला देश में वे तीनो जा पहुँचे और प्राचीरों से आवृत, ऊँची ध्वजाओं से अलंकृत उस मिथिला नगर के बाहर आकर ठहरे। वहाँ एक उजड़े हुए स्थान में उन्होंने एक ऊँचा प्रस्तर पड़ा देखा, जो गृहस्थ-धर्म से च्युत होकर अभिशप्त हो पड़ी रहनेवाली गौतम-पत्नी अहल्या का ही रूप था।
उस प्रस्तर पर काकुत्स्थ (श्रीरामचन्द्र) की चरण-धूलि जा लगी, तुरन्त ही वह (अहल्या देवी) प्रस्तर-रूप छोड़कर अपना पूर्व स्वरूप धारण करके उठ खड़ी हुईं, जैसे कोई नर, अविद्या-मोह को मिटानेवाला तत्त्वज्ञान पाने पर मायावृत रूप छोड़ दे और यथार्थ आत्म-स्वरूप को पहचान ले और भगवान् के चरणों को प्राप्त हो जाय। महामुनि (विश्वामित्र) कहने लगे—
गगन से भूतल पर गंगा को ले आनेवाले भगीरथ के वंश में उत्पन्न (रामचन्द्र) ! यह विद्युत्-समान नारी, जो अत्यन्त आनन्द के साथ एक ओर खड़ी है, उस गौतम मुनि की पत्नी अहल्या है, जिस (मुनि) ने पापकर्म करनेवाले देवेन्द्र को सहस्र रक्त-वर्ण नेत्र दिये थे।
सुनहली जटावाले (विश्वामित्र) का कथन सुनकर, पंकज पर विद्युत्-द्युति के साथ आसीन लक्ष्मी के वल्लभ (रामचन्द्र) ने आश्चर्य से कहा—इस संसार की भी कैसी प्रकृति है ? इस प्रकार की घटनाएँ क्यों होती हैं ? क्या ये पूर्वजन्मों के कर्मों का परिणाम हैं अथवा उन कर्मों के अतिरिक्त कोई और भी कारण है ? संसार की माता-सदृश अहल्या की ऐसी दशा क्यों हुई ?
रामचन्द्र की बात सुनकर ज्ञानी (विश्वामित्र) ने कहा—शुभाश्रय ! सुनो, पुराने समय में वज्रधारी इन्द्र कभी दुर्गुण-रहित संयमी गौतम महर्षि की मृग के समान नयनोंवाली पत्नी अहल्या के सौंदर्य पर मुग्ध हुआ और उसके स्तनों का स्पर्श प्राप्त करना चाहा।
अहल्या के नयन-रूपी भाले तथा मन्मथ के बाण इन्द्र को पीड़ित करने लगे। उसने सोचा, किसी भी उपाय से अहल्या की संगति प्राप्त करनी चाहिए ; एक दिन उसने कामांध होकर गौतम मुनि से अहल्या को पृथक् किया और सत्य-स्वरूप गौतम का वेष धारण कर उसके पास जा पहुँचा।
६६ | कंब रामायण
वह अहल्या की संगति में सुगंधित नवमधु का महान् आनन्द पा रहा था, उसी समय अहल्या को अनुभव हुआ कि यह इन्द्र है, तो भी उसने उसे अनुचित कृत्य मानकर दूर नहीं किया उसी समय त्रिनेत्र (शिवजी) के समान सर्व-शक्तिमान् गौतम मुनि भी शीघ्र वहाँ लौट आये।
गौतम धनुर्वाण नहीं चला सकते थे, किन्तु प्रतिकार-रहित शाप देने में अत्यन्त समर्थ थे। उनको देखकर अमिट अपयश पाई हुई (अहल्या) भयभीत हो खड़ी रही, इन्द्र काँपता हुआ बिल्ली के जैसे वहाँ से धीरे-धीरे खिसकने लगा।
सदा तटस्थ दशा में रहनेवाले परिशुद्ध गौतम महर्षि ने अग्नि उगलती हुई आँखों से देखा वे सारी घटनाएँ समझ गये और तुम्हारे (राम के) वाणों के समान तीक्ष्ण वचन (इन्द्र के प्रति) कहे—'तुम्हारे शरीर में एक हजार नारियों के चिह्न-रूप अवयव उत्पन्न हों।' क्षण-मात्र में इन्द्र का शरीर उन अवयवों से भर गया।
इन्द्र सभी का उपहास-पात्र हो गया। अमिट अपयश लेकर वह लज्जित हुआ और वहाँ से चला गया। तब गौतम ने सुकुमारी अहल्या को देखकर कहा–'वारनारी के सदृश आचरण करनेवाली तुम पत्थर बन जाओ।' अहल्या पत्थर बनकर गिरने लगी।
(उस समय) उसने गौतम से प्रार्थना की कि हे अग्निमय रुद्र-समान मुनिवर! (छोटों के) अपराधों को क्षमा करना महान् व्यक्तियों का स्वभाव होता है। अतः, मुझे क्षमा करो और मेरे शाप का अंत कब होगा, बताओ।
तब गौतम ने कहा—भ्रमरों से घिरे पुष्पहार धारण करनेवाले दशरथ-पुत्र (श्रीरामचन्द्र) जब इस स्थान पर आयेंगे तब उनकी पद-रज का स्पर्श होते ही तुम्हारा उद्धार होगा।
शाप से विकृतांग इन्द्र को देखकर सभी देवता ब्रह्मा को अपने साथ लेकर गौतम मुनि के पास आये और उनसे प्रार्थना करने लगे। देवताओं की प्रार्थना सुनकर तपस्वी गौतम शांत हुए और इन्द्र के शरीर पर के सहस्र स्त्री-चिह्नों को सहस्र नयन बना दिये। अहल्या प्रस्तर के रूप में पड़ी रही।
हे मेघ-समान कांतियुक्त (रामचन्द्र)! प्राचीन काल में ऐसी घटना घटी थी। अब जब तुम भूतल पर अवतीर्ण हो गये हो इसलिए आगे सभी प्राणियों का उद्धार होगा, फिर क्या उनकी दुर्गति कभी संभव हो सकती है? कदापि नहीं।' यहाँ अंजन पर्वत की जैसी कान्ति से युक्त, जो युद्ध किया उसमें तुम्हारा हस्त-कौशल कैसा था, उस बाण चलाने वालों का श्रेष्ठ शिरोमणि है।
बालकाण्ड ६७
करुणा उत्पन्न हो। बीच में आये कष्टों को स्मरण करके दुःखी मत होओ। अब तुम अपने पति के आश्रम में जाओ। यों कहकर अहल्या के चरणों की वन्दना की।
आगे चलकर वे सब गौतम मुनि के आश्रम में जा पहुँचे; गौतम उन अतिथियों के आगमन से अत्यन्त हर्षित हुए और आगे बढ़कर आदर के साथ उनका स्वागत किया और सब प्रकार से उनका सत्कार किया। तब गाधिपुत्र ने उन तपस्वियों से कहा --
अंजनवर्ण (रामचन्द्र) की चरण-धूलि लगी नहीं कि अहल्या अपने पूर्व स्वरूप में खड़ी हो गईं; उसने अपने मन से कोई पाप नहीं किया था, अतः अब तुम उसे स्वीकार करो। गाधिपुत्र के ऐसा कहने पर ब्रह्मदेव के समान उन (गौतम) ने अहल्या को स्वीकार कर लिया।
सकल सद्गुणों से पूरित (रामचन्द्र) ने गौतम की परिक्रमा करके उनके चरण-कमलों को प्रणाम किया और अहल्या को उन्हें सौंप दिया। फिर, तपस्वी (विश्वामित्र) के साथ मिथिला नगरी के निकट जा पहुँचे और उसके मणिमय प्राचीर को देखा। (१--८६)
अध्याय १०
मिथिला-दर्शन पटल
प्रहरियों से सुरक्षित वह मिथिला नगरी अपनी ऊँची और मनोहर ध्वजा-रूपी हाथों को ऊँचा उठाये हुए है, मानो उस कमल-नयन (रामचन्द्र) को यह कहकर आह्वान कर रही हो कि 'सुनहली आभावाली लक्ष्मी मेरी तपस्या के प्रभाव से अपना निवास कमल-पुष्प को छोड़कर यहाँ अवतीर्ण हुई हैं, अतः आप शीघ्र आइए।'
उन्होंने देखा कि उस नगर के ऊँचे-ऊँचे प्रासादों पर सुंदर ध्वजाओं की पंक्तियाँ नृत्य कर रही हैं, वे ऐसी लगती हैं, मानो धर्मरूपी दूत से संदेश पाकर, अनुपम सुन्दरी जानकी का पाणिग्रहण करने के लिए योग्य वर (रामचन्द्र) को आते हुए देखकर, गगन-तल में अप्सराएँ आनन्द से नाच रही हों।
उस नगर में कहीं दो मत्त गज आपस में टकरा रहे हैं, जो दो पहाड़ों के जैसे दीखते हैं, जिनके बड़े-बड़े श्वेत दंत वज्र के समान हैं और जिनकी आँखों से कोपाग्नि निकल रही है, मानों प्रेमी दंपति मन्मथ के बाणों से विद्ध होकर (एक दूसरे से) मिलने चले हों और इतने में प्रणय-कलह में लग गये हों।
उन्होंने देखा कि जब सूर्य अस्तंगत होने लगता है, तब वहाँ का आकाश क्षीर-सागर के जैसा दीख पड़ता है, ऊँचे प्रासादों पर उड़नेवाली ध्वजाएँ मेघों का स्पर्श करती हुई गीली होती रहती हैं और साथ-साथ मेघों के समान ही फैले हुए अगरु धूम के स्पर्श से सूखती भी रहती हैं।
मन्मथ सीता देवी का चित्र खींचना चाहता है और अमृत में अपनी लेखनी
६८ कम्ब रामायण
डुबोता है, लेकिन वह बेचारा सीताजी के अवयवों के सौंदर्य को अंकित करने में सर्वथा असमर्थ हो हारकर रह जाता है; ऐसी अनुपम सुंदरी को अपने अंक में पाकर मिथिला नगरी अपने स्वर्णमय प्राचीरों के साथ ऐसी शोभायमान है, जैसे लक्ष्मी का निवासभूत कमल-पुष्प ही हो। ऐसी उस नगरी में वे तीनों प्रविष्ट हुए।
वे तीनों मिथिला की विशाल वीथियों से होकर जाने लगे, जहाँ चन्द्रोपम ललाट-वाली नारियों एवं पुरुषों के रत्नमय आभरण बिखरे पड़े रहते थे (समागम-काल में वे उन आभरणों को बाधाजनक पाकर उतारकर फेंक देते हैं), वे वीथियाँ देखने में ऐसी लगती थी, जैसे तमिल-भाषा के पिता (अगस्त्य) मुनिवर के पी जाने पर रत्नमय समुद्र का तल हो; या रात्रि के समय घने नक्षत्रों से जड़ा हुआ आकाश हो।
वे लोग वहाँ की वीथियों में जाने लगे, जहाँ लोहे के अंकुशों को भी तोड़ देने-वाले पर्वत-सदृश मत्तगज मद जल बहाते थे, जब उस मद-जल की धारा बह चलती थी, तब लगाम में रहनेवाले घोड़ों के मुँह से जो झाग गिरता था, उसके मिलने से उस धारा का रूप बदल जाता था। फिर, रथों के निरंतर दौड़ने से कीचड़ बनता था और अनन्तर (उनके सूखने के बाद) धूल फैल जाती थी। यों उन वीथियों की आकृति क्षण-क्षण में परिवर्तित होती रहती थी।
वे तीनों मिथिला की उन विशाल वीथियों में जाने लगे, जहाँ रति की वेला में मधुरभाषी रमणियों ने अपने पुष्प-हार फेंक दिये थे, जिन से मधु-धारा बह रही थी और जिनपर भ्रमर मँडरा रहे थे। वे मुरझाई हुई पुष्पमालाएँ उन कोमलांगी नारियों की जैसी ही लगती थीं, जो निरंतर तुल्यानुराग-भरे अपने प्रेमियों के साथ काम-समर कर चुकने पर अत्यंत श्रांत हो पड़ी रहती हैं।
उन्होंने मिथिला नगर की स्वर्णमय नृत्यशालाएँ देखीं, जिनमें 'याक्'१ (वीणा के जैसा एक तंत्री वाद्य) के घृत-मधुर तारों के नाद, मधुर कंठ से गाये हुए गीत, उँगली से छेड़े जानेवाली 'मकरवीणा' की ध्वनि — ये सब एक दूसरे में एकश्रुति होकर गुंजित होते थे और जहाँ अस्ति और नास्ति का संदेह उत्पन्न करनेवाली सूक्ष्म-कटि रमणियाँ नृत्य करती थीं, जिनके हाथों के मार्ग पर उनके नयन चलते तथा उनके नयनों के मार्ग पर उनके मन (के भाव) चलते थे।
उन्होंने देखा — मरकत-सदृश गुवाक (सुपारी) के वृक्षों में शुद्ध प्रवाल जैसे फल लगे हैं, उन वृक्षों में झूले लगे हैं, उन में सुन्दर नारियाँ झूल रही हैं, झूले बार-बार इधर से उधर और उधर से इधर आते जाते रहते हैं और यह स्मरण दिलाते हैं कि पापी जन भी इसी प्रकार पुन:-पुन: इस संसार में आते-जाते रहते हैं। उन रमणियों के पुष्पहारों पर से उड़े हुए भ्रमर गुंजार भरते हैं, मानो उनकी लचकती हुई सूक्ष्म कटियों पर दया उत्पन्न होने से वे चिल्ला उठे हों।
१ प्राचीन तमिल-साहित्य में चार प्रकार के याक्-वाद्य प्रसिद्ध हैं। उनके नाम हैं— (१) पेरियाक् (२) कमऱ्याक , (३) गोडयाक , (४) शगोडयाक , जिनमें क्रमश २१, १६, १४ और ७ तन्त्रियाँ होती थीं।—अनु०
बालकाण्ड ६१
उन तीनो ने मिथिला नगर की पण्यवीथि (बाजार) देखी, जहाँ दोनो ओर अपार रत्न, स्वर्ण, मोती, कवरी मृग के केश, अरण्य मे उत्पन्न अगुरु की लकड़ी, मयूर-पंख, हाथी के दाँत—इनके अवार लगे थे। वह हाट ऐसी लगती थी, जैसे कावेरी नदी हो, जिसके दोनों तटो पर कूपको ने मोती, अगुरु आदि एकत्र कर उनकी राशियाँ बना दी हो ।
उस नगर में रमणियाँ नुकीले और छोटे नाखूनवाले अपने कोमल कर-पल्लवों को दुखाती हुई वीणा की खूँटियो को घुमाती थी और प्रवहमाण मधु-धारा सदृश तन्त्रियो को कसती थी , वे अपने हाथ की उँगलियो के साथ मन को भी संलग्न करके. उज्ज्वल मदहास विखेरती हुई विस्पष्ट स्वर-युक्त संगीत-रूपी स्वच्छ मधु को पान कराती थी , उस संगीत का पान करते हुए वे तीनो आनंद से आगे बढ़ चले ।
कही उन्होने अतिवेग से दौड़ने हुए घोड़ो की पंक्ति देखी, जो कुम्हार के द्वारा घुमाये गये चाक के समान वर्त्तुल आकार में दौड़ रही थी। (वह पंक्ति) महा-पुरुषो की मित्रता के ही समान अटूट गतिवाली थी तथा ज्ञानियो की बुद्धि के सदृश एकाग्र थी । वे घोड़े ऐसे दौड़ते थे कि उनका आकार स्पष्ट नही दिखाई पड़ता था।
उन्होने ऊँचे प्रासादों के झरोखो में अनेक उदीयमान पूर्णचंद्र देखे, जो पने भाले-मन्मथ का धनुष, भ्रमर-कुल से संकुल नील केशों का जूड़ा—इनसे शोभायमान थे तथा दीर्घकाल का कलंक भी जिनसे मिट गया था।
उन्होने अनेक मनोहर कमल भी देखे, जो स्फटिक-चषको में भरे नवसुरभित मद्य का पान करके हास प्रकट करते हुए मस्ती से अर्थहीन वचन वकते थे और अपने प्रियतमो के प्रति मान करने जाकर हँस पडते थे।
[ उपर्युक्त दोनों पद्यों मे वारनारियो का वर्णन है । ]
वारनारियाँ गेंद खेल रही थी। शारीरिक सुख के साथ ही धन भी प्राप्त करने-वाली, सर्पफन-तुल्य जघनवाली वेश्याओ के मन के जैसे ही स्फटिकवर्णवाले, कंदुक भी अपना स्वाभाविक रंग छिपाते थे । वे ( कंदुक ) उनकी कज्जलांकित आँखों की छाया पड़ने से काले तथा उनकी लाल हथेलियो की छाया से लाल होते रहते थे ।
उन्होंने कई द्यूतशालाएँ भी देखी, जहाँ भाले-जैसी नुकीली आँखोवाली सुन्दर वेश्याएँ चौसर खेलती थी। वे अपने हाथ के कगन, कर्णाभरण, रत्नहार, कलिंगदेश की वनी अमूल्य चादर, मकरवीणा आदि को भी दाँव पर रख देती थी। (खेलते-खेलते थक जाने से) उनके पुष्पांलंकृत केशपाश शिथिल हो जाते थे और स्फटिक के बने कुत्ते के आकार की मुहरें उनकी हथेली की छाया से लाल दिखाई देती थी।
उस नगर में कई वावलियाँ भी थी, जिनमे अनुपम अंगोवाली सुन्दरियाँ आनंद से स्नान करती थी। उस समय वहाँ के कमल, नीलकमल, रक्तकुमुद, जल पर फैली हुई 'वल्लै' लता के पत्ते, नीलोत्पल, लाल-लाल 'किडै' (नामक पौधे), तरंगे, मीन आदि जलचरी वस्तुएँ (उनके अंगो की सुन्दरता देख) लज्जित हो, दुःख अनुभव करती थी।
कही तरुण पुरुष खड्ग चलाने का अभ्यास करते थे। उनकी भुजाओ पर चंदन-
७० कम्ब रामायण
लेप तथा पीनस्तनी नारियों के आलिंगन से उत्पन्न चिह्न अंकित थे। उनका खड्ग-प्रयोग यह स्मरण दिलाता था कि मनुष्य का मन भी विषयभागी इंद्रियों के द्वारा आकृष्ट होकर मोह-ग्रस्त हो इसी प्रकार भटकता रहता है।
उन्होंने यत्र-तत्र युवक-समूह भी देखे, जिनका शरीर सूर्य के समान उज्ज्वल था, जिनका मन इतना उदार था कि वे माँगने पर कोई भी अभीष्ट वस्तु दे देते थे, जिनके लाल करों में धनुष थे और जिनके केश, अपनी मानिनी प्रेयसियों के चरणों पर झुकने से महावर लगकर लाल हो गये थे। उन्हें देखने से ऐसा लगता था, मानो स्वयं मन्मथ शिवजी के नेत्र से बचकर भूतल पर आ गया हो।
उन्होंने मिथिला नगर की फुलवारियों को देखा और वहाँ पुष्प-चयन करती हुई मयूर की समानता करनेवाली तरुणियों को भी देखा। वे तरुणियाँ तोतों से चाशनी जैसी मीठी बोली में संभाषण कर रही थीं। उनके सौंदर्य से अप्सराएँ भी लजा जाती थीं। उनकी गति की कमनीयता से हंस भी परास्त हो जाते थे और भ्रमर उन तरुणियों की विजय पर हर्षनाद कर उठते थे।
उन्होंने चतुरंगिनी सेना-विशिष्ट जनक महाराज के स्वर्णमय प्रासाद के चारों ओर एक विशाल खाई देखी, जिसमें देवों के निवास-योग्य उन्नत अट्टालिकाओं की परछाईं पड़ती रहती थी और जहाँ देवनगर अमरावती की सुन्दरता उत्पन्न हो रही थी। तरंगायमान वह खाई उमड़ती हुई गंगा नदी के समान गंभीर थी।
वे तीनों राजप्रासाद में कन्यागृह की अट्टालिका के अग्रभाग को देखकर वहीं खड़े हो गये, उस अट्टालिका में हंस और हंसिनियाँ इस प्रकार परस्पर मिलकर विचर रहे थे, जैसे स्वर्ण और उसकी आभा, पुष्प और उसकी सुवास, भ्रमरों का भोज्य मधु और उसकी मिष्टता तथा सुगुम्फित कवि-वचन तथा उसकी रसमयता।
अब हम सीताजी का वर्णन करना चाहते हैं, किन्तु कैसे करें ? कमलासन ब्रह्मदेव से लेकर सभी (व्यक्ति), किसी नारी का उपमान देते समय लक्ष्मी का उल्लेख करते हैं : वही लक्ष्मी स्वयं सीता का रूप लेकर अवतीर्ण हुई हैं, तो उनका उपमान कहाँ से और कैसे ढूँढा जाय ?
पार्वती प्रभृति देवियाँ भी सिर पर कर जोड़कर, सकल सद्गुण-संपन्न सीता को प्रणाम करती हैं। वैसी सीता को जो भी देखते हैं, वे कभी उस सुन्दरता का पार नहीं पाते हैं, मानव समझते हैं, हाय ! हम देवताओं के समान निर्निमेष दृष्टि से नहीं देख सकते, और, देवता लोग समझते हैं कि हम अपनी इन दो आँखों से सीता के सौंदर्य को कैसे देख सकते हैं (अर्थात्, इसके लिए दो आँखें पर्याप्त नहीं हैं) ?
सीताजी के वे चंचल नयन हरिण को भी अपने सौंदर्य-गुण से मात करते हैं। विजयशील भाला और तलवार भी उन नयनों की छटा से परास्त हो जाते हैं, अन्य नारियों के नयनों के उपमान-भूत 'कयल' मीन भी उनसे डरते हैं। उस समय (रामचन्द्र के लिए) सीताजी, मंदर पर्वत के मथने से कल्लोलित समुद्र से उत्पन्न अमृत नहीं, परन्तु उस कन्यागृह के उस प्रासाद से उत्पन्न अमृत थीं।