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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 64

५० | कंब रामायण

का पालन करके रत्नमय स्वर्णाभरण पहननेवाले काकुत्स्थ (रामचंद्र) ने जो प्रथम युद्ध किया, उसमें यम को, जो अबतक राक्षसों का रक्त पीने की अभिलाषा रखते हुए भी खड्गादि आयुधधारी राक्षसों से भयभीत होकर रहता था, राक्षसों के रक्त का थोड़ा सा स्वाद मिला।

तब देवताओं ने मुनि (विश्वामित्र) के निकट आकर कहा कि आज हमने अपना आश्रय-स्थान वापस पा लिया है, आपको भी अब कोई बाधा नहीं रही; इसलिए अब आप चक्रवर्ती के कुमारों को दिव्य अस्त्र प्रदान करें। फिर, उन्होंने धनुर्धारी काल-मेघ सदृश (श्रीराम) पर पुष्पों की वर्षा की और उन्हें बधाइयों देकर वहाँ से विदा किया।
(१-७६)

अध्याय ८

यज्ञ पटल

जब देवताओं की पुष्पवर्षा से वह उष्ण मरुप्रदेश शीतल हो गया, तब दूसरों के लिए दुर्लभ तपस्या से संपन्न विश्वामित्र ने (राम-लक्ष्मण के साथ) बड़ी सरलता से उसे पार कर लिया, फिर उन्होंने उस महानुभाव (रामचन्द्र) को ऐसे अस्त्र दिये, जो तिरुवेण्णैयनल्लूर के निवासी तथा महान् दानी शडैयप्पवल्लल के^१ भूलोकवासियों के दारिद्र्य-रोग को दूर करनेवाले औषध-स्वरूप, वचन के समान अमोघ थे।

संयमी और त्रिकालज्ञ मुनिवर ने जो-जो अस्त्र, उनके मंत्रों को बताकर, महानुभाव (राम) को दिये, वे सब बड़ी उमंग के साथ वैसे ही उनके पास आ पहुँचे, जैसे शुद्ध मन से किये गये सत्कर्मों के फल दूसरे जन्म में स्वयं अपने कर्त्ताओं को प्राप्त हो जाते हैं।

(देवास्त्रों ने श्रीरामचन्द्र से निवेदन किया कि) हे वीर ! हम आपके आश्रय में आ पहुँचे हैं, अब आपको छोड़कर अन्यत्र नहीं जायेंगे; आप विधि के अनुसार जो भी आदेश हमें देंगे, हम उसका पालन आपके भाई लक्ष्मण के समान करेंगे। उन्होंने भी यह वचन सुनकर अपनी स्वीकृति दे दी। तब से वे देवास्त्र नीलकमल-तुल्य (श्रीराम) की सेवा में निरत हुए।

इन घटनाओं के पश्चात् वे लोग दो कोस आगे चले, वहाँ एक बड़ा शोर सुनाई पड़ा, जो क्रमशः उनके निकट आने लगा। तब उन्होंने मुनि से पूछा कि 'हे महात्मन् ! यह ध्वनि कैसी है?' तपस्या से अपने कर्मों को मिटा देनेवाले मुनि (विश्वामित्र) ने उत्तर दिया—


१ तिरुवेण्णैयनल्लूर के शडैयप्पवल्लल कवि के आश्रयदाता थे और समय-समय पर धन देकर उनकी सहायता करते थे। कवि ने स्थान-स्थान पर उनका स्मरण करके उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की है।—अनु०