भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 63

बालकाण्ड ४६

कार्य भी करना आवश्यक हो जाय और आप उसे करने का आदेश दे, तो आपका वचन वेद-वाक्य मानकर करना ही मेरे लिए परम धर्म है।

स्त्री-रूप में भी अग्नि के समान भयंकर उस ताड़का ने, गंगा ( सरयू १ ) के मधुर प्रवाह से शोभित कोशल देश के राजकुमार ( रामचंद्र ) का मनोभाव जान लिया और ( अपने ) कठोर नयनों में क्रोधाग्नि प्रज्वलित करते हुए, अपने रक्तवर्ण हाथ के शूलाग्नि-रूपी तीक्ष्णाग्नि को ( रामचंद्र के ऊपर ) फेंका।

नवीन यम-स्वरूपिणी उस ताड़का ने जाज्वल्यमान तीन फलोवाले त्रिशूल-रूपी प्रलयंकर अग्नि को फेंका; वह त्रिशूल ( रामचंद्र की ओर ) इस प्रकार बढ़ा, मानो पूर्णचंद्र को ग्रसने के लिए राहु आ रहा हो।

उस क्षण विष्णु के अवतारभूत ( राम ) ने किस तरह तीर उठाकर उसका प्रयोग किया और कब अपने धनुष को झुकाया, यह किसी ने नहीं देखा। सबने इतना ही देखा कि ताड़का ने यम के हाथों से छीनकर जिस शूल को राम पर फेंका था, वह शूल दो टुकड़े होकर नीचे पड़ा है।

( इसके पश्चात् ) अंधकार तथा मेघों की समता करनेवाली, काले रंगवाली, उस ताड़का ने बड़े-बड़े पत्थरों को अपने हाथों से उठा-उठाकर इतना बरसाया कि समुद्र भी उन पत्थरों से पट जाय। पर, वीर ( राम ) ने पत्थरों की उस वर्षा को अपने धनुष से की गई शर-वर्षा से एकदम रोक दिया।

नीलवर्ण ( श्रीराम ) ने मुनि के शाप के समान अत्यन्त तीक्ष्ण तथा जलानेवाले एक शर को उस अंधकार-रूपिणी ताड़का के ऊपर ज्यों ही प्रयोग किया, त्यों ही वह तीर ताड़का के वज्र-पर्वत के समान कठोर छाती में घुसकर उसी प्रकार दूसरी ओर निकल गया; जिस प्रकार सज्जनों का उपदेश मूर्ख-जनों के हृदय को पार कर निकल जाता है।

अत्यन्त उत्तुंग स्वर्णमय मेरु पर्वत के समान गंभीर ( रामचंद्र ) के तीक्ष्ण अनी-वाले बाणों का प्रलयंकारी प्रभंजन ज्यों ही उठा, त्यों ही ताड़का इस प्रकार ( मृत हो ) गिर पड़ी, जिस प्रकार गगन में गरजते हुए तथा पत्थरों की वर्षा करते हुए प्रलयकालिक मेघ, प्रभंजन से आहत हो, अपनी बिजली के साथ पृथ्वी पर आ गिरा हो।

जब गुफा-जैसा अपना मुँह खोलकर ताड़का, जिसके बड़े-बड़े दाँतों में कई प्राणियों के मांस लगे हुए थे, नीचे गिरी, तब उसके शरीर से जो रक्त प्रवाहित हुआ, उससे वहाँ की धूल-भरी बीहड़ मरुभूमि भी सिंचित हो गई; उसका गिरना क्या था, दस सिरों पर मुकुट धारण करनेवाले ( रावण ) को उसके सर्वनाश की सूचना ही थी, मानो उस दिन उस ( रावण ) की विजय-पताका ही टूटकर धरती पर गिर गई हो।

ताड़का के कठोर वक्षःस्थल में तीर लगने से जो रक्त-प्रवाह हुआ, उससे वह सारा वन अपना रूप बदलकर समुद्र बन गया। उस वन में फैली हुई रक्त की बाढ़ देखने से ऐसा प्रतीत हुआ, मानो संध्याकालिक लालिमायुक्त गगन आधारहीन हो पृथ्वी पर गिर पड़ा हो।

सुगंधित कमल-पुष्प पर बैठनेवाले ब्रह्मा के समान मुनि ( विश्वामित्र ) की आज्ञा