कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 52, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३८ | कंब रामायण |
|---|
जाते और सूर्यास्त के समय अपने सुन्दर नगर में लौट आते ; उस समय उनका स्वागत करने-वाले नागरिक जन आनन्द के कारण मेघों के आगमन से उल्लसित होनेवाले शस्य के समान दिखाई देते थे ।
अयोध्यापुरी की नारियाँ, वहाँ के पुरुष, जो उन नारियों के पीन स्तनों के अनुरूप ही बलिष्ठ थे, तथा उनके बंधुजन, कौसल्या एवं दशरथ के सदृश ही अपने इष्टदेवों से प्रार्थना करते कि ये कुमार चिरंजीवी हों।
वेदों के लिए अगोचर, अनन्य समान श्रीरामचन्द्र और उनके साथ सदा लगे रहनेवाले लक्ष्मण को आते देखकर लोग उपमा देते हुए कहते थे कि (रामचन्द्र को देखने से ही ऐसा प्रतीत होता है) मानो नीलसमुद्र या कालमेघ उज्ज्वल विकसित कमलपुंज से शोभायमान हो, उत्तर दिशा में स्थित मेरु पर्वत के साथ आ रहा हो ।
हमारे स्वामी रामचन्द्र अपने समक्ष आनेवाले नागरिकों को देखकर अपने मुख-कमल को विकसित कर बड़ी कृपा के साथ पूछते कि तुम्हारे कार्य क्या हैं ? कोई कष्ट तो तुम्हें नहीं है ? तुम लोगों की गृहिणियाँ एवं ज्ञानवान् संतति सुखी और स्वस्थ हैं न ?
नगर-निवासी उत्तर देते—स्वामिन् ! हम बड़े भाग्यवान् हैं , आपके समान राजा को पाने पर हमें किस बात का अभाव हो सकता है ? हमारे लिए सुखी जीवन प्राप्त करना कोई बड़ी बात नहीं, (हमारी यही कामना है कि) जबतक ब्रह्मा जीवित रहे, तबतक आप हमारी आत्माओं पर एवं सप्तद्वीप विशिष्ट भूतल पर शासन करते रहे ।
इस प्रकार, उस सुन्दर नगर के निवासियों की प्रशंसा प्राप्त करते हुए तथा अपने भाइयों के द्वारा अनुगत रहते हुए त्रिमूर्तियों के नेता श्रीरामचन्द्र जीवन बिताने लगे ।
राजाधिराज दशरथ समस्त संसार को अपने श्वेत छत्र की छाया में आश्रय देते हुए, नगाड़ों की जय-ध्वनि सुनते हुए, मुनियों के द्वारा प्रशंसित होते हुए, निःसीम आनन्द-सागर में गोते लगाते रहते। (१—१३८)
अध्याय ६
समर्पण पटल
(दशरथ चक्रवर्ती) आकाश को छूनेवाले रत्न-खचित सभा-मंडप में आये । पुष्पभार से लदे कल्पवृक्ष से सुशोभित स्वर्गलोक के निवासियों को, उस मंडप को देखकर इन्द्र के सभा-मंडप की भ्रांति हो गई ।
(मंडप में पहुँचकर महाराज दशरथ) परिशुद्ध और कोमल (गद्देदार) सिंहासन पर विराजमान हुए । (उन्हें देखकर) गगन में संचरण करनेवाली अप्सराओं को यह संदेह हो गया कि यही उनके अधिपति इन्द्र हैं, फिर (दशरथ के) हजार नयन न होने से उनका संदेह दूर हुआ ।