कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 51, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ३७
अभीष्ट फल देनेवाले वसिष्ठ ने, जिनके लिए वेदो के यथार्थ तत्त्व हस्तामलक के समान थे, (रामचन्द्र के बाद) अवतरित दूसरे ज्योतिःपुंज का 'भरत' नाम रखा।
(जिसके उत्पन्न होते ही) वंचक (राक्षस) लोग मिट गये और देवता लोग तर गये, भूमिदेवी करोड़ो कष्टों से मुक्त हुई; उस अजेय और महाबली ज्योतिर्मय पुत्र का नाम 'लक्ष्मण' रखा।
ज्योतिःस्वरूप चौथा बालक ऐसा लगता था, मानो मोतियों के पुज के मध्य रक्त-कमल विकसा हो। शत्रुओ का नाशक समझकर कुलगुरु ने उसका 'शत्रुघ्न' नाम रखा।
भूलकर भी असत्य पर न चलनेवाले (वसिष्ठ) मुनि ने जब उत्कृष्ट वेदमंत्रो का उच्चारण करके (चारो बालको का) नामकरण किया, तब दान-नदियो ने चक्रवर्त्ती के हाथो से प्रवाहित होकर वेदशास्त्रो मे निपुण ब्राह्मणो के सत्य अर्थों से भरे हुए हृदय-रूपी समुद्र को भर दिया।
समस्त संसार पर शासन करनेवाले राजाधिराज दशरथ (अपने ज्येष्ठ) कुमार से इस प्रकार प्रेम करते थे. मानो नीलोत्पलो के मध्य विराजमान रक्तकमल जैसे अतीव सुन्दर लगनेवाले श्रीरामचन्द्र के अतिरिक्त उन्हे दूसरे प्राण एवं शरीर ही न हों।
चारो कुमार, जिनकी तोतली बोली से अमृत बरसता था, अपनी सुन्दर विकंपित गति से भूमिदेवी की शोभा बढ़ाते हुए उसी प्रकार बढ़ने लगे, जिस प्रकार अंधकार को दूर करते हुए सूर्य बढ़ता है और स्वरो की ध्वनि के साथ चारों वेद (संसार मे) बढ़ते हैं।
समय आने पर धवल चन्द्र से विभूषित शंकर समान वसिष्ठ मुनि ने यथाविधि उनके चूडाकरण तथा उपनयन-संस्कार कराये। (फिर) अमर वेदो एवं अनन्त शास्त्रो का इस प्रकार से अध्ययन कराया कि उनके ज्ञान की कोई सीमा ही नही रही।
देवताओ के एकमात्र नेता रामचन्द्र ने अपने भाइयो के साथ हाथी, रथ, घोड़े आदि सवारी तथा इसी प्रकार की अन्य (क्षत्रियोचित) विद्याओ की शिक्षा यथाविधि प्राप्त की और शत्रुओ का नाश करनेवाली सेना-संचालन कि रीति तथा धनुर्विद्या का भी अभ्यास किया।
वेदो के ज्ञाता मुनि, देवता, भूमिदेवी और उस नगर के सभी निवासी, यह सोचकर कि इन (राजकुमारो) से हमारे कष्ट एवं उनके कारण-भूत पाप और पुण्य कर्म भी मिट जायेंगे, उनके निकट से हटना नही चाहते थे।
श्रीरामचन्द्र और लक्ष्मण नदियो मे, मेघो से आवृत (ऊँचे वृक्षो से भरे) उपवनो मे और तड़ागो में साथ-साथ संचरण करते थे, जैसे ताने के साथ भरनी का सूत मिल गया हो; इससे भूमिदेवी कि तपस्याएँ प्रकट होती थी।
भरत और शत्रुघ्न एक क्षण के लिए भी एक दूसरे से अलग नही होते थे; रथ या घोड़े की सवारी करते समय या वेद-शास्त्रो का अध्ययन करते समय सदा एक साथ रहते थे। वे दोनो मेरे (लेखक के) स्वामी श्रीरामचन्द्र और लक्ष्मण के (जोड़े) जैसे रहते थे।
पराक्रमी राम और भरत अपने अनुज लक्ष्मण और शत्रुघ्न के साथ (प्रतिदिन) बड़े सबेरे नगर से बाहर सुगंध-भरे उपवनो मे दयालु मुनियो के पास (अध्ययन के लिए)