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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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३६ कम्ब रामायण

कर्कटक था, ग्रहस्थानो की परीक्षा करके देखने पर (विदित हुआ कि) ग्यारहवे गृह में चार ग्रह उच्च स्थान मे थे।

ज्योतिषियो ने श्रीरामचन्द्र की जन्म-पत्री तैयार कर दी; फिर अन्य राजकुमारों की जन्मपत्रियाँ भी उपयुक्त क्रम से परीक्षा करके, स्वर्ण-फलक पर लिखकर, अत्यन्त चतुर देवगुरु बृहस्पति की प्रशंसा करते हुए, पढ सुनाईं।

दशरथ चक्रवर्ती ने आनन्द से (सरयू नदी मं) स्नान किया; अन्न तथा वस्त्र दान दिये, फिर जब श्वेत शंख बज रहे थे, तब वसिष्ठ मुनि को भी साथ लेकर अपने श्रेष्ठ कुमारो के सुख देखे।

दशरथ महाराज ने ढिंढोरा पिटवा दिया और आज्ञा दी कि 'राज्य-भर मे सात वर्षो के लिए लगान माफ कर दिया जाय, अन्न-भंडारो के किवाड़ खोल दिये जायें, ताकि गरीब अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार अन्न उठा ले जायें।

(यह भी आज्ञा दी कि) युद्ध-कार्य बन्द हो जाये; (कारागृह मे) बंदी शत्रु- राजाओ को मुक्त कर दिया जाय और वे अपने-अपने राज्य को चले जायें; ब्राह्मणो के नियमाचरण बिना विघ्न के पूर्ण हो; (मंदिरो मे प्रतिष्ठित) देवता विशेष रीति से किये जानेवाले उत्सवो से संतुष्ट किये जाये।

देवालयो का संस्कार किया जाय, ब्राह्मणो के निवासो, चौराहो और अन्य मार्ग- सन्धियो का नव-निर्माण हो; प्रातः एव संध्या के समय (देवालयो के) देवताओ को मनोहर पुष्पहार समर्पित किये जाये।'

(चक्रवर्ती के यह) आज्ञा देत ही ढिंढोरा पीटनेवालो ने हाथियो पर बैठकर श्रुतिसुखद ढिंढोरे पीटकर सर्वत्र राजाज्ञा सुना दी, नगर-निवासी और विद्युल्लता के समान क्षीणकटि नारियाँ आनन्द-सागर मे डूब गई।

नगर-निवासी प्रेम से भरकर आनन्द-नाद कर उठे, उनके शरीर पुलकायमान हो गये ओर स्वेद-बिन्दुओ से भर गये; राजा के सामने आकर जिन-जिन ने यह शुभ समाचार सुनाया, उन सबको बहुमूल्य भेंट दी गई, कदाचित् उनके मन में यह विश्वास हो गया कि (राजकुमारो के रूप में) स्वयं विष्णु भगवान् ही अवतरित हुए हैं।

विशाल अयोध्या नगर मे नारियो के झुंड, सखियो के समुदाय, पुरुषो के संघ तथा मित्रो के दल ने अतीव आनन्द के साथ तेल, चन्दन, घी, कस्तूरी तथा अन्य सुगन्धित द्रव्य अयोध्या की वीथियो मे छिड़के।

इस प्रकार उस महानगरी के निवासियो ने बारह दिनो तक उत्सव मनाया और अपने मन मे उमड़नेवाले आनन्द के कारण अपने-आपको भूल गये, तेरहवे दिन अमर और सत्य तपस्यावाले वसिष्ठ ने (बालको का) नामकरण करने की सोची।

मगर के साथ युद्ध करते समय जब गजराज के कर ढीले पड गये, तब उसने ज्योंही आदिशेष पर शयन करनेवाले आदिमूल भगवान् विष्णु का स्मरण किया, त्योंही आकर उसकी रक्षा करनेवाले उस परमार्थभूत विष्णु भगवान् का (वसिष्ठ ने) 'श्रीराम' नाम रखा।