कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड २१
( वहाँ की रमणियो के मुख-मंडल पर ) मंदहास उत्पन्न होते रहते हैं ; ( उनको देखकर ) कामुको के मन मे काम-वेदना उत्पन्न होती रहती है, इतना ही नही, ( उन-रमणियो के ) मृदु स्तनो पर मुक्ताहार और रक्तस्वर्ण के हार निरतर पडे रहते हैं, जिस कारण उनकी कटियाँ दिन-दिन क्षीण होती रहती हैं।
अपने-अपने स्थानो से निरंतर नशे में चूर रहनेवाले तथा मनोहर गतिवाले वाल राजहंस हैं ; कमल-पुष्प हैं , तडागो में स्थित मीन हैं; भ्रमरियो से युक्त भ्रमर हैं , पुष्प-केसरो का आस्वाद लेनेवाले मत्त गज हैं; और इनके अतिरिक्त रमणियो के नेत्र हैं।
पर्वत की समता करनेवाले मत्तगजो से, जिनके भय से आँखो से आग उगलनेवाले सिंह भी सिंहनियो के साथ पर्वत की कंदराओ मे ( छिपे ) रहते हे, त्रिविध मदजल का प्रवाह ज्यो-ज्यो बहता है, त्यो-त्यो भूमि भी गहरी होती जाती है ; उस ( मदजल ) से जो कीचड़ उत्पन्न होता है, उसमें ऊँची ध्वजावाले सुदृढ रथ भी धँस जाते हैं ।
अपने को अलंकृत करनेवाले जन अपने जिन पुष्पहारो को उतारकर फेक देते हे, वे नर्त्तनशील रमणियो के नूपुरी में उलझ जाते हैं, अपने प्रियतम के साथ विहार में मग्न होकर सुन्दरियाँ अपने स्तनो पर से जिन चन्दन आदि के लेपो को उतारकर फेंक देती हैं, उन लेपो के कारण मार्ग पर चलनेवाले लोग फिसल जाते हैं ।
अश्व, कभी न थकनेवाले अपने खुरो से धरती को कुरेदते रहते हे, जिससे धूलि उड़कर ( उन अश्वो के रत्नालंकारो और सवारी के रत्नाभरणो के ) रत्नो पर छा जाती हैं , इस प्रकार मंद पड़ी हुई रत्न-कांति को अश्वारोही पुरुषो की भुजाओ के पुष्पहारो से गिरनेवाला मधु फिर चमका देता है।
अदम्य मत्तगजों का मदजल 'वेगे' पुष्प के सदृश महँकता है ; उच्च कुल मे उत्पन्न रमणियो के मुख कुमुद-गंध से युक्त हैं , सुन्दरियो के अलक-जाल विविध पुष्पो की सुरभि से सुगंधित हैं ; और ( उस नगर-वासियो के ) आभरणो से अपार कांतिजाल छिटकता रहता है।
अनेक नगरो मे से देव-नगरी ( अमरावती ) के विषय मे क्या कहे, जो इस ( अयोध्या नगरी ) के उपमान के रूप मे बनी हुई है ? वह अमरावती तो किसी भी गुण से उसकी समता नही करती है। स्वयं अलकापुरी भी, जो इस नगर के समान सब वस्तुएँ दे सकती है, यहाँ की पण्यवीथी ( बाजार ) को देखकर परास्त हो जाती है ।
पुरुष-समाज मे मुखरित वीर-वलय शब्द करते रहते हैं ; वरछे चमकते रहते हे ; कांतिपूर्ण रत्नाभरण धूप फैलाते रहते हैं , कस्तूरी, चंदन आदि अत्यधिक सुरभि को फैलाते रहते हैं , मुक्ताएँ कौंधती रहती हैं, भ्रमर गाते रहते हैं।
( उस नगर मे ) शंखो के नाद, शृंगो के नाद, मकर-वीणा आदि वाद्यो के नाद, मर्दल का नाद, किन्नर-वाद्य का नाद, छिद्रवाले वाद्यो ( शहनाई, बाँसुरी आदि ) के नाद तथा विविध प्रकार के वाजो के नाद, इस प्रकार उमड़ते रहते हैं कि समुद्र का घोष भी उस शब्द से मंद पड़ जाता है।
( सामंत ) राजाओ के द्वारा ( उस नगर मे ) दिये जानेवाले राजस्व तथा अन्य द्रव्यो को मापकर लेने के लिए मडप बने हैं; हंस-सम मंदगतिवाली रमणियो के नृत्य