कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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कव रामायण
भी अपने भीतर दंडो से युक्त है ); वह शत्रुओं के मुकुटधारी शिरो को काट देता है— ( राजा अपने शस्त्रो से और प्राचीर अपने भीतर लगे हुए यंत्रो से शत्रु का शिर छेदन करता है।), वह मानव-शास्त्र के अनुसार स्थित है—( राजा मनु के प्रतिपादित धर्म पर चलते हैं और प्राचीर मानवो के शिल्प-शास्त्र के अनुसार बनता है), वह इस प्रकार (नगर की) सुरक्षा करता है कि कोई (शत्रु) आँख उठाकर भी उसे देख नही सकता, वह अत्यन्त बलिष्ठ है, वहाँ धनुष, तलवार आदि का अभ्यास होता रहता है, वहाँ कठोर तन्त्र—( राजतंत्र तथा सेना का प्रबंध ) रहता है, वह शत्रुओं के लिए दुर्जय है, महा औन्नत्य (ऊँचाई) से युक्त है तथा चक्र—(शासन-चक्र तथा यंत्र) चलाता रहता है ।
उस प्राचीर मे निष्ठुर त्रिशूल, प्राणघातक खड्ग, धनुष, फरसा, गदा, चक्र, तोमर, मूसल, मेघ के गर्जन के सदृश भयंकर 'कवण्कल' (पत्थर फेंकनेवाला यन्त्र) इत्यादि अनेक कल-पुरजे और यन्त्र लगे हैं, जो मशको को, पक्षिराज (गरुड) को, तीव्रगामी हवा को, अहित विचारवाले के मन को भी भग्न करनेवाले हैं ।
अष्ट दिशाओ में भी अंधकार को हटाकर सुन्दर रूप में प्रकाश फैलानेवाले सूर्य के कुल में उत्पन्न जो राजा हैं, वे आभरणों की अपेक्षा यश को ही उत्कृष्ट (आभर आभरण) माननेवाले हैं, अतः वे अच्छे चरित्रवाले बनकर संसार के प्राणियो की रक्षा में निरत रहते हैं, उनका शासन-चक्र, अनुपम वेत्रदंड तथा आज्ञा, अष्ट दिशाओ मे तथा ऊपर के लोको मे भी फैलकर रक्षा करते हैं। इसलिए, उस नगर के चारो ओर जो प्राचीर बनाई गई है, वह अलंकार-मात्र है।
[ नीचे के आठ पद्यों मे परिखा (खाई) का वर्णन है । ]
अब हम जिस परिखा (खाई) का वर्णन करने लगे हैं, वह उस उन्नत प्राचीर को इस प्रकार घेरे हुए पडी है, जिस प्रकार उन्नत चक्रवाल पर्वत को घेरकर उत्तुंग तरंगो से भरा सागर पडा रहता है। वह (परिखा) वारनारी के मन के समान गहरी, असत्कविता के समान स्वच्छता-हीन ( गदी ), कुलीन कन्याओ के जघन-तट के समान किसी के लिए भी अगम्य होकर सुरक्षित, तथा ऐसे मगरो से भरी है, जो (लोगो को) सन्मार्ग से हटाकर बुरे मार्ग पर खींच ले चलनेवाली इंद्रियों के समान प्रबल हैं ।
गगन मे संचरण करनेवाला मेघ-समुदाय, उस विशाल तथा पाताल तक गंभीर परिखा को देखकर समझता है कि यही भयंकर समुद्र है, और वहाँ उतरकर जल भर लेता है, फिर ऊपर उठकर उस प्राचीर को देखकर समझता है कि यह कोई गगनोन्नत पर्वत है और वही पर अपनी जलधाराएँ बरसाने लगता है ।
ऊँचे प्राचीर के बाहर स्थित विशाल परिखा मे अपनी सुरभि को चारो ओर फेंकता हुआ पकज-वन खिला हुआ है; वह ऐसा लगता है, मानो मानिनियो के उज्ज्वल वदनो से जो कमल पहले परास्त हो गये थे, वे अब अपने समस्त बल को एकत्र करके युद्ध करने के लिए आ जुटे हों और उस प्राचीर को घेरकर पडे हों ।
बडी कुशलता के साथ लगाये गये यंत्रो से शोभित उस प्राचीर के चारो ओर