कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड १५
कर्म करते हैं, वे परलोक में आनन्द प्राप्त करते हैं'—वैसे धर्म का पालन करते हुए इस पृथ्वी पर श्रीराघव के अतिरिक्त और किन्होंने बड़ा तप किया है ? धर्म के त्राता, अनिर्वचनीय गुणों से भूषित (रामचन्द्र) ने जिस नगर में रहकर सप्त लोकों की रक्षा की, उस अयोध्या से भी बढ़कर सुखप्रद स्थान दूसरा कोई हो सकता है- ऐसा मानना भी क्या उचित है ?
महान् करुणा (भगवान् की करुणा) और धर्म की सहायता से पंचेन्द्रिय-रूपी अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके, उत्तरोत्तर बढ़नेवाली तपस्या और ज्ञान प्राप्त करनेवाले महापुरुष जिस भगवान् की शरण में जाते हैं, वह अरुण नयनवाले विष्णु इस नगर में अवतीर्ण हुए और (सीता देवी के रूप में रहनेवाली) लक्ष्मी के साथ यहाँ रहकर अनन्त काल तक लोक-पालन करते रहे, तो इस अयोध्या की समता कर सकनेवाला स्वर्णमय नगर देवलोक में भी कहाँ मिल सकता है ?
सभी राज्यों के नरेश उसी अयोध्या में एकत्र रहते हैं सभी श्रेष्ठ आभरण और दुर्लभ रत्न वहीं पर होते हैं, बड़ी जंजीरों से बँधे मत्त गज, तुरंग, रथ आदि इस संसार की सभी श्रेष्ठ वस्तुएँ वहीं पर होती हैं; मुनि, देव, यक्ष, विद्याधर आदि सब उसी नगर में जमा रहते हैं; तो उस नगर की उपमा किसके साथ हो सकती है ? ऐसे नगरी के विषय में क्या मुझ जैसा व्यक्ति कुछ कह सकता है ?
[ नीचे के छह पद्यों में नगर के प्राचीर का वर्णन है । ]
हिमावृत, अति उन्नत पर्वत-श्रेणियों में भी शिल्प-शास्त्र के अनुसार बने चतुष्कोण आकारवाले पर्वत इस सृष्टि में कहीं नहीं हैं, अतः (अयोध्या के) उस प्राचीर का उपमान भी कहीं नहीं है; वे स्वर्णमय प्राचीर उन विद्वानों के उन्नत ज्ञान के सदृश हैं, जिन्होंने बड़ी तत्परता के साथ सर्व शास्त्रों का अध्ययन किया हो ।
गंभीर ज्ञान से भी उसका स्वरूप तथा अंत नहीं जाना जा सकता, अतः वह प्राचीर वेदों के समान है, उसके अति उन्नत शिखर अपर लोक तक पहुँचते हैं, अतः वह देवी के समान है; पंचेन्द्रिय-तुल्य बलवान् यंत्रों को अपने वश में रखने के कारण वह मुनियों के समान है; रक्षा करने में वह हरिणवाहना कन्या (दुर्गा देवी) के समान है; शूलायुधों को धारण करने के कारण वह कालिका के समान है, अपनी विशालता के कारण वह सभी महान् पदार्थों के समान है; किसी के लिए भी अगम्य (पहुँच के बाहर) होने के कारण वह स्वयं भगवान् के समान है ।
ऊपर उठा हुआ वह प्राचीर अंतरिक्ष में पहुँच गया है, मानो वह देखना चाहता है कि क्या देवताओं का निवास (स्वर्गपुरी) इस अयोध्या से भी अधिक सुन्दर है; जिस नगर में मधुर-स्वरवाली ऐसी असंख्य रमणियाँ हैं, जिनके पद-नख, लाक्षा-रस से अंकित श्रेणी में रखे हुए चंद्रों के सदृश हैं; पद रक्त-कमल तुल्य हैं; कटियाँ नाल-तुल्य हैं; उरोज छोटे नारियल के समान हैं तथा जिनकी भुजाएँ लचीले कोमल बाँस के सदृश सुकुमार हैं।
वह प्राचीर उस नगर के चक्रवर्ती के ही समान है; क्योंकि वह संसार के मापदंड से युक्त है—(चक्रवर्ती वेत्रदंड से युक्त हो सारे संसार की रक्षा करता है, उसी प्रकार प्राचीर