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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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१४ | कंब रामायण

भी नही लगा सकता ; सरयू नदी अपनी अनन्त शाखा-प्रशाखाओ से बहती हुई उस सीमा को खोज रही है, फिर भी उसे पहचान नही पाई है ।

यह कोशल देश इतना पुण्यभूयिष्ठ है कि यदि प्रभञ्जन के आघात से समुद्र की जलराशि भूमि पर चढ़ आवे, तो भी उस देश की कोई हानि नही हो सकती । ऐसे कोशल का वर्णन करने के पश्चात् अब हम अयोध्या नगर का वर्णन करेगे । ( १—६१ )


अध्याय ३

नगर पटल

अयोध्या नगरी सस्कृत भाषा के महाकवियो तथा विद्वानो द्वारा रस-भरे, सार-गर्भित, मधुर शब्दो मे वर्णित हुई है , जिस स्वर्गलोक की प्राप्ति की इच्छा से असख्य लोगो के निवासी तपस्या मे लीन रहते हैं, उस स्वर्ग के निवासी भी अयोध्या नगरी का निवास प्राप्त करने की कामना करते रहते हैं ।

क्या वह अयोध्या नगरी भूदेवी का मुख है या उसका तिलक है ? अथवा उसके नयन है ? उसके स्तनो पर सुशोभित मनोहर रत्नहार है ? अथवा उस भूदेवी के प्राणो का निवास है ?

क्या वह नगरी लक्ष्मी देवी का आवास-भूत अति सुन्दर कमल है ? या वह स्वर्णमंजूषा है, जिसके भीतर विष्णु भगवान् के वक्ष पर प्रकाशित होनेवाले कौस्तुभ मणि जैसे सुन्दर रत्न रखे हुए हैं ? अथवा वह देवलोक से भी ऊँचा वैकुण्ठधाम ही है ? कदाचित् यह वह स्थान है, जहाँ प्रलय के समय सारी सृष्टि समा जाती है । इस नगर के सम्बन्ध मे और क्या कहें ?

अपने अर्धांग मे उमा देवी को स्थापित करनेवाले (परमशिव) दो देवियो (श्री और भूमि) के पति अतुलनीय (विष्णु) भगवान् तथा क्ष्माधन देव (ब्रह्मा) ने भी इस अयोध्या की समानता करनेवाला दूसरा नगर नही देखा । चन्द्र तथा सूर्य भी इसके उपमान हो सकनेवाले एक नगर को देखने की प्रबल इच्छा से प्रेरित होकर ही निर्निमेष नयनो से अभी तक अन्तरिक्ष मे घूम रहे हैं अन्यथा उनके इस प्रकार भ्रमण करने का दूसरा कारण क्या हो सकता है ?

ब्रह्मदेव ने बहुप्रशंसित इस रमणीय अयोध्यापुरी का निर्माण करने के हेतु तीक्ष्ण वज्रायुध धारण करनेवाले (देवेन्द्र) की नगरी अमरावती एव कुबेर की राजधानी (अलकापुरी) की सृष्टि करके पहले ही नगर-निर्माण का अभ्यास कर लिया था, मय आदि देवशिल्पी भी इस नगर की शोभा देखकर लज्जित हो गये और शिल्प-कला मे अपनी हार स्वीकार कर सकल्पमात्र से सृष्टि करनेवाली अपनी शक्ति को भूल बैठे, तो मेघ-मडल को छूनेवाले उन प्रासादो का वर्णन कैसे किया जाय ?

अपरिमेय वेदो में यह अर्थ प्रतिपादित हुआ है कि (इस समाज म) 'जो पुण्य