कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड १७
धरती को भेदकर जो परिखा बनाई गई है, उनके भीतर बड़े-बड़े मगर निवास करते हैं और ऊपर उठ-उठकर इस प्रकार डुबकियाँ लगाते रहते हैं, जिस प्रकार अतिगम्भीर समुद्र के मध्य, अदम्य मद से डूबे हुए हाथी हों।
वे मगर, चोखे करवालों की जैसी अपनी पूँछों को हिलाते हुए जाज्वल्यमान नेत्रों से चिनगारियाँ उगलते हुए, एक दूसरे के साथ चढ़ा-ऊपरी करते हुए, आगे बढ़ते हैं; तो ऐसा लगता है, जैसे युद्धरंग में क्रोधोन्मत्त राक्षस टूट पड़े हों।
वह परिखा चक्रवर्ती की सेना की जैसी है, क्योकि वहाँ उड़ते हुए हंस पक्षी श्वेत छत्रों के सदृश हैं; वहाँ के भयंकर मगर, ग्रहों से घिरे हुए पर्वताकार हाथियों के सदृश हैं; नालदंडों के साथ स्पंदित होनेवाले कमल-पुष्प घोड़ों के सदृश हैं; तथा वहाँ के मीन त्रिशूल, करवाल आदि शस्त्रों के सदृश हैं।
उस खाई के किनारे पर चाँदी के चबूतरे बने हैं और उन चबूतरों के मध्य फर्श पर स्वर्ण और स्फटिक-खंड बिछे हैं, इस कारण, देवताओं के लिए भी यह असम्भव है कि वे उस स्वच्छ धरती और उस खाई के स्वच्छ जल को पृथक्-पृथक् पहचान सकें।
विचार करने पर ऐसा लगता है कि उस अति विशाल तथा दीर्घ परिखा-रूपी समुद्र के निकट फैले हुए वनों को, समुद्र के निकट स्थिर होकर पड़े हुए घनीभूत अंधकार कह सकते हैं, वे उपवन उस स्वर्णमय प्राचीर की नीले रंग की साड़ी के समान हैं।
उस नगर के चारों दिशाओं से चार नगर-द्वार हैं; जो दिगंतों में रहनेवाले गजों के समान खड़े हैं, पूर्वकाल में स्वर्गलोक को नापनेवाले त्रिविक्रम के चरण से भी अधिक उन्नत होकर, समस्त सम्पत्तियों से भरी इस धरती पर रहनेवाले प्राणियों को सन्मार्ग पर चलाते रहने के कारण वे चारों नगर-द्वार चारों वेदों की समानता करते हैं।
कबूतरी के बुलाते रहने पर भी कबूतर उसके पास जाकर प्यार से उसका आलिंगन नहीं करता, किंतु वहाँ पर निर्मित एक कपोती की प्रतिमा के पास (उसे सजीव समझकर) मुग्ध हो खड़ा रहता है। यह देखकर कबूतरी रूठकर अकलंक स्वर्णमय स्वर्गलोक में स्थित, पुण्यवान् लोगों के निवासभूत कल्पक-उद्यान में जा छिपती है।
[यहाँ से तीन पद्यों में नगर के गोपुर (शिखर) का वर्णन किया गया है।]
कटे हुए पत्थरों को चुनकर भित्तियाँ बनाई गई हैं, जिनके ऊपर स्फटिक पत्थर लगाये गये हैं, उनके ऊपर चमकते हुए स्वर्ण-पत्र बिछाये गये हैं; जिनके मध्य कांति बिखेरते हुए विविध रत्न जड़े हुए हैं; उन भित्तियों के ऊपर रुचिर रजतमय आड़े की छतें रखी गई हैं, जिनके ऊपर वज्रमय स्तंभ खड़े कर दिये गये हैं।
उन खंभों के ऊपर मरकत जड़ी हुई छतें बिछाई गई हैं; उन छतों पर हीरक-पत्थर चुने गये हैं; स्वर्ण-पत्रों और विद्युत् के समान चमकते रत्नों से निर्मित सिंह की प्रतिमाएँ यत्र-तत्र रखी गई हैं, उन सिंहों के ऊपर गोमेदक की छत बिछाई गई हैं।
उस छत के ऊपर एक दूसरी मंजिल निर्मित है, इस प्रकार सात मंजिले बनी थीं; जो इस भाँति विशाल थी, मानो सत्यलो के निवासियो के रहने के लिए ही बनाई गई हों।