कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड १८
पूर्ण वे प्रासाद, उस नगर के उन निवासियो के समान हैं, जो त्रुटिहीन धर्म-मार्ग पर चलनेवाले हैं और चक्रवर्ती दशरथ के ही समान गुणवाले हैं ।
वे प्रासाद; जिनमे झरनो के समान मुक्ताहार झूलते रहते हैं, विशाल मेघो के समान पताकाएँ फहरती रहती हैं, बड़े-बड़े रत्नो के समुदायों से युक्त हैं, पीतस्वर्णों से भरे हैं; सुन्दर मयूरों से निवासित हैं और पर्वतो की समानता करते हैं ।
अगरु के धूम से सम्यक् मिले हुए और मेघो से पृथक् न पहचानने योग्य जो ध्वज-पट हैं, उनके साथ खड़े हुए दीर्घ दंडों के सिरो पर स्थित त्रिशूल इस प्रकार चमकते हैं, जैसे दिन के समय काँधती हुई बिजलियो की पंक्तियाँ हों ।
उन प्रासादो मे, जहाँ डमरु-समान कटिवाली, पीन स्तनोवाली, मयूर-सदृश रमणियो के चरण-युगल में बजनेवाले नूपुरो की ध्वनि मुखरित होती रहती है; बड़ी-बड़ी ध्वजाएँ लगी हुई हैं, जिनमे मुक्ताहार लटक रहे हैं ; वह दृश्य ऐसा है, मानो कल्पवृक्ष अपने सुरभित पुष्पहारो के साथ खड़ा हो ।
उन्नत पर्वतों के मध्य-स्थित ध्वजाएँ कदली-वन के समान ग्रह-मडल तक उठी हुई फहरा रही हैं ; गगन का चन्द्रमा ( कृष्णपक्ष में ) दिन मे जो कांतिहीन होकर क्षीण होता हुआ झुकता जाता है, वह इसीलिए कि वे ध्वजाएँ उसे रगड़-रगड़कर ( क्षीण और कांतिहीन ) बना देती हैं ।
जो स्वर्ण से बनाये गये दृढ़ मंडप नही हैं, वे पुष्पो के बने कुञ्ज-भवन ही हैं · जो सभा-भवन नही हैं, वे प्रासाद ही हैं; जो क्रीडा-पर्वत नही, वे रत्नमय कुटीर ही हैं ; जो ( भवनो के ) आँगन नही, वे मुक्ता-वितान ही हैं ।
अति उज्ज्वल स्वच्छ स्वर्ण से निर्मित उस अविनश्वर श्रेष्ठ नगर ( अयोध्या ) की छाया, बिजली के समान, दीप-शिखा के समान तथा सूर्य के किरण-पुञ्ज के समान स्वर्ग-लोक पर जाकर पड़ती है , अतएव वह देवलोक भी स्वर्णनगर बन गया है ।
गगन मे प्रकाशित होनेवाला वर्तुल प्रकाश-पुञ्ज सूर्योदय-काल में अति दीर्घ हो, मध्याह्न मे अति संकुचित हो, तथा संध्या मे पुनः दीर्घ बनकर दिखाई देता है : अतः वह ( सूर्य ) वर्तुलाकार स्वर्ण-प्राचीरो तथा अग्नि-कण-सदृश माणिक्यो से सुचारु रूप मे निर्मित उस अयोध्या नगर की परछाईं जैसा ही लगता है ।
सुनिर्मित मेखला से भूषित सुन्दरियाँ वहाँ के स्वर्ण-प्रासादो मे अगरु-धूम प्रसारित करती रहती हैं; उस धूम से भरे हुए मेघ समुद्र पर छा जाते हैं, तो वह विशाल सागर भी सुगंधित हो उठता है; उन मेघो से गिरनेवाली जलधारा के विषय मे अब और क्या कहा जाये ?
उन बालिकाओ की, जिनके अलक-जाल अभी-अभी ( वेणी के ) बंधन के उपयुक्त हो रहे हैं, अस्पष्ट उच्चरित बोली, सुन्दर वेणु-नाद के समान है ; उन युवतियों की, जो अलक-जाल से सुशोभित हैं, बोली मकर-वीणा की ध्वनि के समान है और प्रौढ रमणियो की बोली, मधु बेचनेवालो के संगीत के समान है ।
आँखो से चिनगारियाँ निकालनेवाले ( मदमत्त ) गज अपने पैरो से धरती को