कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 26, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२ | कंब रामायण |
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उस देश की नारियों की छटा प्राप्तकर मयूर (गर्व से) संचरण करते हैं; उनके वक्षों पर शोभायमान रत्नाभरणों की कांति पाकर सूर्यातप (आनन्द से) सर्वत्र फैल जाता है, उनके केशों की शोभा पाकर मेघ (अभिमान से) गगन पर चढ़ जाते हैं और उनके नेत्रों की छवि प्राप्त कर जलाशयों में मीन (हर्ष से) इधर-उधर तैरते हैं।
सरोवरों में नारियाँ जब अपनी टूटती-सी सूक्ष्म कटि के साथ लहरों को उद्वेलित करती हुई गोता लगाती हैं, तब उनके रक्ताधर को देखकर कुमुद खिल पड़ते हैं, जल पर चलनेवाले हंस की-सी गतिवाली नारियों के मुख की समता करते हुए कमल खिल जाते हैं।
वहाँ की वनिताओं के कटाक्ष अपने उपमानीभूत सभी वस्तुओं का उपहास करते हैं, उनकी गति हथिनी की गति का उपहास करती है, परस्पर सटे हुए उनके उन्नत उरोज पंकज की कलियों का उपहास करते हैं, और उनके सुन्दर मुख षोडश कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा का उपहास करते हैं।
वहाँ जो रत्न बिखरे हैं, उनकी कांति सूर्य की किरणों से भी विलक्षण है, वहाँ की रमणियों के स्तन नारियल के शीतल फलों से भी विलक्षण हैं, उनके उज्ज्वल दुकूल दूध पर पड़े झाग से भी विलक्षण हैं और उनके विवाहोत्सवों में बजनेवाले नगाड़े काले बादलों (के गर्जन) से भी विलक्षण हैं।
उस देश के हरे-हरे उपवनों की समता कर सकती हैं, केवल काली घटाएँ; खेतों में लगे धान के अंबारों की समता कर सकता है, केवल पर्वत, वहाँ के बाँधों से घिरे हुए विशाल जलाशयों की समता कर सकता है, केवल अपार जलराशि समुद्र; और, अनन्त निधियों से संपन्न उस कोशल देश की समता कर सकता है, केवल देवलोक।
जो धानों की राशियाँ नहीं हैं, वे मोतियों के ढेर हैं, जो मोतियों के ढेर नहीं हैं, वे समुद्र से निकाले गये नमक के ढेर हैं, जो नमक के ढेर नहीं, वे नदियों से निकली अमूल्य वस्तुओं के समूह हैं, और, जो उन वस्तुओं के समूह नहीं हैं, वे सैकत श्रेणियाँ हैं, जहाँ रत्न बिखरे पड़े हैं।
बालिकाएँ जहाँ कन्दुक-क्रीड़ा करती हैं, वे चन्दन के बाग नहीं हैं, परन्तु चंपक-पुष्पों के उपवन हैं—(बालिकाओं के शरीर की सुगंधि पाकर चन्दन-वन भी चंपक-उपवन के समान महँक उठते हैं), मयूरवाहन सुन्दर सुब्रह्मण्यम् (कार्तिकेय) के जैसे वहाँ के बालक जहाँ धनुर्विद्या आदि कलाओं का अभ्यास करते हैं, वे नन्दन वन नहीं हैं, परन्तु मकरन्द-भरे रजनीगंधा के वन हैं—(उन बालकों के शरीर से भी रजनीगन्धा की-सी सुरभि पाकर परिजात-वन भी रजनीगन्धा की फुलवारी के समान महँकने लगता है।)
वहाँ के कोकिल उन सुन्दरियों की कण्ठध्वनि का अनुकरण करते हुए बोल उठते हैं, मयूर उनके नृत्य का अनुकरण करते हुए नाचने लगते हैं और सीप उनके दाँतों के उपमान होनेवाले मोती उगलते हैं।
(उस देश के) मद्य-विक्रेताओं के यहाँ मद्य पर्याप्त मात्रा में मौजूद रहता है, उन मद्यो का पान करनेवाले कृषकों के यहाँ खेती के उपयुक्त सभी आवश्यक साधन