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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 549 में से

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पृष्ठ 260

२५० कंब रामायण

'एक सूत्रयुगल रत्नजटित कलशो को ढो रहा हो।'—यो सूक्ष्म कटि तथा पुष्ट स्तनो से युक्त हे पुष्पलता ! इस पर्वत पर के चंदन-वृक्ष मानो आकाश-मार्ग को ही रोक रहे हैं और चन्द्रमा, जैसे इन वृक्षो के बीच में से होकर जा रहा है, यह सुन्दर दृश्य देखो।

चन्द्रकला-जैसे ( आकारवाले ) दाँतो से शोभायमान हे देवी ! हाथी, वृक्ष की शाखाओ पर लगे मधु के छत्ते पर की मक्खियो को उड़ाकर उसमे स्थित सुगंधित अरुण वर्ण मधु को उठाकर अत्यधिक प्रेम के साथ पूर्ण गर्भ से युक्त अपनी हथिनी के मुँह मे डाल देता है, यह दृश्य देखो।

सृष्टि की रक्षा करनेवाले भगवान् (विष्णु) यद्यपि माया मे छिपे रहते हैं, तथापि इंद्रियो का दमन करनेवाले योगियो के लिए अदृश्य नही रहते। उसी प्रकार, इस पर्वत पर रहनेवाले दिव्य हयग्रीव ( घोडे के जैसे मुखवाले) मानव छिप जाने पर भी यहाँ की स्फटिक शिलाओं मे ( प्रतिबिंबित होकर ) प्रकट दीख पड़ते हैं, यह देखो।

नर्त्तनशील कलापी से भी सुन्दर और कोकिल के जैसे स्वरवाली हे सीते ! यहाँ के उन किन्नरमिथुनो को देखो, जो इस प्रकार गा रहे हैं कि अपने प्रियतमो से मान करती हुई पर्वतवासी स्त्रियाँ ( उन गानो को सुनकर ) द्रवितचित्त होकर स्वय अपने प्रियतमो को खोजने लगती हैं।

किसी धनुर्वीर के धनुष के समान शोभायमान ललाटवाली ! हे कुलदीपिके ! अरण्य-निवासी, लबी जड़वाले 'कवलै' (नामक) कद को खोदकर ले जाते हैं। उनके खोदने से जो गड्ढे पड़ जाते हैं, उनको लबे बाँसो के टकराने से झरनेवाले मधु के छत्ते ( अपने मधु से ) भर देते हैं।

नारीत्व-रूपी शरीर के लिए प्राणतुल्य हे सुन्दरी ! देखो, जलाशय मे उसके साथ आनन्द से डुबकी लगानेवाली वानरी जब वानर पर पानी उछालती है, तब वह (वानर) पर्वत के दूसरे पार्श्व मे जाकर वहाँ के एक मेघ को पकड़कर हिलाने लगता हैं—(जिससे वर्षा की बूँदें बिखर पड़ती हैं।

बत्ती के बिना ही अमृत मे जलनेवाले उत्तम दीपक-सदृश हे देवी ! उन माणिक्य-मय शिलाओ को देखो, जो अपनी कांति से अंधकार को चीर डालती है और अपने स्थान से कभी न हटते हुए मंडलाकार सूर्य के समान लगती हैं।

अरुंधती ( जैसी पतिव्रता ) को भी सच्चे शील का आदर्श दिखानेवाली लक्ष्मी-तुल्य, हे सुन्दरी ! जब कालवर्ण भ्रमरो के झुण्ड 'वेंगे' वृक्ष की शाखा पर बैठते हैं तब वे शाखाएँ झुक जाती हैं। फिर, उन (भ्रमरों) के उड़ जाने पर वे ऊपर उठ जाती हैं; वे शाखाएँ ऐसी लगती हैं, जैसे अपने स्वर्णमय पुष्पो को बिखेरकर ( हमारे) चरणो पर नमस्कार कर रही हो।

उज्ज्वल ललाट तथा शोभायमान आभरणो से युक्त हे देवी ! हे पल्लवित शाखा-समान सुन्दरी ! सूर्य को छूनेवाले इस पर्वत पर 'तिनै' ( एक अनाज ) की खेती की रखवाली करनेवाली तीक्ष्ण बरछे-जैसे नयनोवाली स्त्रियाँ, फसलो पर आनेवाले पक्षियो पर