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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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अयोध्याकाण्ड २५१

धुँधुचियाँ फेंकती हैं। वे धुँधुचियाँ आकाश में उड़ते हुए ऐसी लगती हैं, जैसे (आकाश से) नक्षत्र ही गिर रहे हों।

दृढ धनुष को धारण करनेवाले वीरों के फरसे से कटकर गिरी हुई अगरु की लकड़ियों को जलाने से उठनेवाला धूम-समूह, ब्राह्मणों के होम-कुंड के धूम के साथ मिलकर ऐसा फैल रहा है, जैसा कोई विशाल कालवर्ण पर्वत-शिखर हो ।

नव-पुष्प, अगरु-धूम, आदि से सुगन्धित होकर निरंतर वर्षा करनेवाले मेघ-सदृश काले तथा दीर्घ केशों के भार से कंपित होनेवाली सूक्ष्म कटि से युक्त हे मयूर-तुल्य सुन्दरी ! गगन में नक्षत्रों को चमकते हुए देखकर सूखी हुई पर्वत-नदियाँ भी अपने रत्न-समुदाय को चमका रही हैं ।

अपने प्रियतमों से रूठकर चलनेवाली विद्याधर-सुन्दरियों के मनोहर, अलक्तक से अंचित छोटे-छोटे पदों के चिह्न, मेघों को छूनेवाली माणिक्यमय शिलाओं में अदृश्य हो जाते हैं और मरकतमय शिलाओं पर रक्त वर्ण दिखाई पड़ते हैं, देखो ।

रक्त स्वर्णमय गभीर नाभि से शोभायमान हे मेरी सहधर्मिणी ! निर्झरों में स्नान करने के लिए आनेवाली देवस्त्रियों के द्वारा अपने काली मिट्टी-जैसे केशों से उतारकर फेंके गये कल्पवृक्ष के पुष्प, प्रभूत रत्न-राशियों सहित झरनेवाले निर्झरों के साथ गिर रहे हैं, देखो ।

देखो, मुखरित वीर-कंकण और धनुष से युक्त किसी व्याध के द्वारा खेती की रक्षा के लिए (बजाने के उद्देश्य से) रखे हुए पटह (नामक चमड़े के बाजे) को एक वानर खड़ा होकर बजा रहा है, देखो । एक व्याघ्र-स्त्री चन्द्र को पकड़कर प्रेम से उसके कलंक को पोछ देने की चेष्टा कर रही है ।

देखो, घने माधवीलता-कुंजों में पल्लव की शय्याएँ पड़ी हैं, जिनपर देवस्त्रियाँ विश्राम करती थीं और अब उनके चिरकालिक वियोग की सूचना देती हुई-सी मुरझाकर काली पड़ी हुई हैं।

स्मरण-मात्र से अत्यधिक आनन्द प्रदान करनेवाली अमृत-समान आभरण से विभूषित सुन्दरी ! देखो, मधु से भरे 'वंग' वृक्षों में तथा 'कौंगे' वृक्षों में स्थान-स्थान पर लगे हुए हिलनेवाले झूलों पर बैठकर पहाड़ी स्त्रियाँ जब पर्वतीय रागों का आलाप करती हैं, तो उनसे आकृष्ट होकर अशुण (नामक) हरिण¹ उनके समीप आ जाते हैं ।

महुए के पुष्प तथा इन्द्रगोप के समान अधर से युक्त हे सुन्दरी ! इस पर्वत पर के निर्झरों से उठनेवाले तुषार-बिन्दुओं के समुदाय, अप्सराओं के नृत्य के समय बिखरे हुए चन्दन आदि सुगन्धित लेप, कस्तूरी-कुंकुम आदि का लेप एवं कल्पपुष्पों के मकरंद से संयुक्त हैं ।

जैसे कोई लता, इङ्गुलीक के पत्रलेखों से चित्रित उत्तम स्वर्णमय स्तम्भों से शोभायमान हो, यों शोभित होनेवाली हे सुन्दरी ! मध्याह्न काल में असहाय निरपराधता


¹ यह प्रसिद्ध है कि 'अशुण'-मृग संगीत सुनकर मुग्ध हो खड़ा रहता है और संगीत समाप्त होने पर व्याकुल होकर सद्य अपने प्राण छोड़ देता है ।